दीपावली का पर्व हमें अंधकार से प्रकाश और अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है : डॉ. शिवदत्त तिवारी (गुरुजी)

दीपावली का पर्व हमें अंधकार से प्रकाश और अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है : डॉ. शिवदत्त तिवारी (गुरुजी)

वैदिक शिक्षा, संस्कृत भाषा और भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए गुरुकुल के माध्यम से नई पीढ़ी को संस्कारवान बनाने का प्रयास

बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ वैदिक ज्ञान और नैतिक संस्कार देना भी जरूरी

विशेष । दीपावली का पर्व भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। यह त्योहार केवल घरों को दीपों और रोशनी से सजाने तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन में ज्ञान, सदाचार, सकारात्मकता और मानवता का प्रकाश फैलाने का संदेश भी देता है। दीपावली हमें सिखाती है कि जिस प्रकार एक छोटा-सा दीपक घने अंधकार को दूर करने की क्षमता रखता है, उसी प्रकार ज्ञान, संस्कार और अच्छे विचार मनुष्य के जीवन को नई दिशा प्रदान कर सकते हैं। इस पर्व का वास्तविक उद्देश्य तभी सार्थक होगा, जब हम अपने जीवन में भगवान श्रीराम के आदर्शों, सत्य, धर्म, सेवा और मर्यादा को अपनाने का संकल्प लें।

यह विचार ब्रह्मदेव आश्रम, रमईपुर के पीठाधीश्वर एवं शिव शक्ति अखाड़ा के प्रदेश संरक्षक डॉ. शिवदत्त तिवारी (गुरुजी) ने दीपावली के पावन अवसर पर व्यक्त किए। उन्होंने समस्त क्षेत्रवासियों एवं देशवासियों को दीपावली की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि भारतीय पर्व और त्योहार हमारी संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं। इनके माध्यम से हमारी आने वाली पीढ़ियां अपनी परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी रहती हैं। इसलिए जरूरी है कि हम त्योहारों को केवल परंपरा के रूप में न मनाएं, बल्कि उनके पीछे छिपे जीवनोपयोगी संदेशों को भी समझें और अपने व्यवहार में उतारें।

वैदिक शिक्षा और संस्कृत के प्रचार-प्रसार पर विशेष जोर

डॉ. शिवदत्त तिवारी (गुरुजी) का कहना है कि वर्तमान समय में शिक्षा के क्षेत्र में तेजी से बदलाव हो रहे हैं। बच्चे आधुनिक शिक्षा प्राप्त कर विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ रहे हैं, जो समाज और देश के विकास के लिए आवश्यक है। लेकिन आधुनिक शिक्षा के साथ भारतीय संस्कृति, वैदिक ज्ञान, संस्कृत भाषा और नैतिक मूल्यों की शिक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। शिक्षा का उद्देश्य केवल किताबी ज्ञान देना या भविष्य में रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना नहीं होना चाहिए, बल्कि बच्चों के अंदर अच्छे संस्कार, अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा, विनम्रता और समाज के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित करना भी होना चाहिए।

इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए उनके द्वारा गुरुकुल का संचालन किया जा रहा है। यहां बच्चों को वैदिक शिक्षा के साथ संस्कृत भाषा का अध्ययन कराया जाता है। गुरुकुल के माध्यम से विद्यार्थियों को भारतीय ज्ञान परंपरा, वैदिक विचारों और संस्कारों से परिचित कराने का प्रयास किया जा रहा है। उनका मानना है कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन ज्ञान-विज्ञान और आध्यात्मिक परंपरा की महत्वपूर्ण संवाहक है। वेदों, उपनिषदों और प्राचीन ग्रंथों में जीवन को बेहतर बनाने के लिए अनेक महत्वपूर्ण विचार और शिक्षाएं समाहित हैं।

संस्कारवान पीढ़ी से ही मजबूत समाज का निर्माण

गुरुजी के अनुसार किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी युवा पीढ़ी और उसके संस्कारों में निहित होती है। यदि बच्चों को बचपन से ही सत्य बोलने, बड़ों का सम्मान करने, माता-पिता की सेवा करने, जरूरतमंदों की सहायता करने और अपने कर्तव्यों का पालन करने की सीख दी जाए तो वे भविष्य में जिम्मेदार नागरिक बन सकते हैं। गुरुकुल शिक्षा पद्धति में ज्ञान के साथ अनुशासन और जीवन मूल्यों को भी महत्व दिया जाता है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए बच्चों को अपनी जड़ों और भारतीय सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि परिवार, समाज और शैक्षणिक संस्थान मिलकर बच्चों के चरित्र निर्माण पर ध्यान दें। अभिभावकों को भी चाहिए कि वे बच्चों को केवल अच्छे अंक लाने के लिए प्रेरित न करें, बल्कि उन्हें मानवीय मूल्यों, सेवा भाव और सामाजिक जिम्मेदारियों का महत्व भी समझाएं। जब शिक्षा के साथ संस्कार जुड़ते हैं, तभी एक बेहतर समाज की नींव तैयार होती है।

दीपावली का वास्तविक संदेश है सेवा, सद्भाव और मानवता

डॉ. शिवदत्त तिवारी ने कहा कि दीपावली भगवान श्रीराम के वनवास से अयोध्या लौटने की स्मृति में मनाया जाने वाला पावन पर्व है। यह पर्व सत्य की असत्य पर और धर्म की अधर्म पर विजय का संदेश देता है। भगवान श्रीराम का जीवन त्याग, मर्यादा, कर्तव्य और आदर्श आचरण की प्रेरणा देता है। हमें उनके जीवन से सीख लेकर अपने परिवार और समाज के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि दीपावली के अवसर पर हमें अपने घरों को रोशन करने के साथ-साथ उन लोगों के जीवन में भी खुशियां लाने का प्रयास करना चाहिए, जो किसी कारणवश अभाव में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। जरूरतमंदों की सहायता करना, गरीब परिवारों के साथ खुशियां बांटना, आपसी मतभेद भुलाकर प्रेम और भाईचारे को बढ़ावा देना ही त्योहारों की सच्ची भावना है। समाज में जब एक-दूसरे के प्रति सम्मान, सहयोग और सद्भाव की भावना मजबूत होगी, तभी पर्वों का वास्तविक महत्व सामने आएगा।

भारतीय संस्कृति और परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी

उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति और परंपराएं केवल इतिहास का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वे हमारे जीवन को सही दिशा देने वाली धरोहर हैं। आज की पीढ़ी को अपनी भाषा, संस्कृति, धर्म और आध्यात्मिक विरासत के बारे में जानकारी देना समय की आवश्यकता है। इसके लिए गुरुकुल जैसी शिक्षा व्यवस्था महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। बच्चों को वैदिक शिक्षा और संस्कृत का ज्ञान देकर उन्हें अपनी प्राचीन परंपराओं से परिचित कराया जा सकता है।

डॉ. शिवदत्त तिवारी (गुरुजी) ने कहा कि उनका प्रयास है कि गुरुकुल के माध्यम से बच्चों में शिक्षा के साथ संस्कार, अनुशासन और भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान की भावना विकसित हो। समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार शिक्षा, संस्कार और सामाजिक सेवा के कार्यों में योगदान देना चाहिए, जिससे आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक पहचान को समझते हुए देश और समाज के विकास में सकारात्मक भूमिका निभा सकें।

अंत में उन्होंने सभी क्षेत्रवासियों, श्रद्धालुओं, अभिभावकों, विद्यार्थियों और देशवासियों को दीपावली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दीं। उन्होंने मां लक्ष्मी और भगवान श्रीगणेश से सभी के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और खुशहाली बनाए रखने की प्रार्थना करते हुए कहा कि दीपावली का यह पावन पर्व प्रत्येक परिवार के जीवन में नई उम्मीद, नई ऊर्जा और सकारात्मकता का प्रकाश लेकर आए। साथ ही समाज में प्रेम, एकता, सद्भाव और सेवा की भावना निरंतर मजबूत होती रहे।

Pankaj

worldkhabarexpress.com

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