कानपुर नगर निगम टेंडर घोटाला: बिना नोटिस कंपनियों को ब्लैकलिस्ट करने पर हाईकोर्ट सख्त, पांच फर्मों को मिली राहत
19 नवंबर तक ब्लैकलिस्टिंग पर रोक, मुख्य अभियंता से मांगा व्यक्तिगत हलफनामा; नोटिस की तामील का प्रमाण नहीं मिलने पर कोर्ट ने उठाए सवाल
कानपुर नगर। कानपुर नगर निगम के टेंडर घोटाले के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पांच ठेकेदार फर्मों को ब्लैकलिस्ट करने की कार्रवाई पर रोक लगा दी है। अदालत ने प्रथम दृष्टया कार्रवाई को अवैध बताते हुए नगर निगम के मुख्य अभियंता से व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करने को कहा है कि आखिर किन परिस्थितियों में कंपनी को नोटिस जारी किए बिना ही ब्लैकलिस्ट कर दिया गया। कोर्ट ने 24 अगस्त को जारी ब्लैकलिस्टिंग आदेश पर तत्काल रोक लगा दी है। साथ ही निर्देश दिया है कि आदेश का पालन नहीं होने पर मुख्य अभियंता को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना पड़ सकता है।
न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने मेसर्स कैला देवी कंस्ट्रक्शन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व दो अन्य मामले में 12 अक्टूबर को यह आदेश पारित किया। इस मामले में याचिकाकर्ता कंपनी की ओर से अधिवक्ता आशीष कुमार चौरसिया ने अदालत में पक्ष रखा।
बिना नोटिस ब्लैकलिस्ट करने का आरोप
याचिकाकर्ता कंपनी की ओर से अदालत को बताया गया कि कानपुर नगर निगम के मुख्य अभियंता ने बिना उचित कारण बताए, कंपनी का पक्ष सुने बिना और नोटिस की विधिवत तामील किए बगैर ही ब्लैकलिस्ट करने की कार्रवाई कर दी। कंपनी का कहना था कि उसे अपना पक्ष रखने और बचाव करने का उचित अवसर नहीं दिया गया।
वहीं, नगर निगम की ओर से अधिवक्ता अभिनव कृष्ण श्रीवास्तव ने दलील दी कि ब्लैकलिस्ट करने से पहले मुख्य अभियंता की ओर से 23 अगस्त को नोटिस तामील कराई गई थी। नोटिस के माध्यम से कंपनी को 24 घंटे के भीतर अपना पक्ष रखने के लिए कहा गया था।
नोटिस की तामील का प्रमाण नहीं मिला
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने प्रस्तुत नोटिस का परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि 23 अगस्त को निरीक्षण किया गया था और कंपनी से 24 घंटे के भीतर जवाब मांगे जाने की बात कही गई थी। हालांकि, अदालत के सामने ऐसा कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि नोटिस वास्तव में कंपनी को तामील कराई गई थी। नोटिस की व्यक्तिगत तामील का प्रमाण उपलब्ध नहीं होने पर अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि कंपनी को अपना पक्ष रखने और बचाव का उचित अवसर नहीं दिया गया। कोर्ट ने यह भी पाया कि मुख्य अभियंता की ओर से कंपनी को स्थायी रूप से ब्लैकलिस्ट कर दिया गया था। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए पीठ ने ब्लैकलिस्टिंग के आदेश को प्रथम दृष्टया अवैध माना और 24 अगस्त को जारी आदेश पर तत्काल रोक लगा दी।
टेंडर घोटाले में पांच कंपनियों पर हुई थी कार्रवाई
नगर निगम के टेंडर घोटाले के मामले में 23 अगस्त को पांच ठेकेदारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के साथ ही उनकी कंपनियों को ब्लैकलिस्ट करने की कार्रवाई की गई थी। इस कार्रवाई में दिलीप बाजपेई एंटरप्राइजेज, अजय एंटरप्राइजेज, पारसनाथ बिल्डर, तिरुपति और मेसर्स कैला देवी कंस्ट्रक्शन शामिल थीं। मामले में ठेकेदार संदीप जैन और रज्जन बाजपेई को गिरफ्तार किए जाने का उल्लेख है, जबकि कथित सरगना गोविंद शर्मा को हाईकोर्ट से गिरफ्तारी पर रोक मिलने की बात सामने आई थी। मेसर्स कैला देवी कंस्ट्रक्शन को गोविंद शर्मा की कंपनी बताया गया है।
एक याचिका से पांचों कंपनियों को मिली राहत
मामले में याचिका मेसर्स कैला देवी कंस्ट्रक्शन की ओर से दायर की गई थी। कंपनी ने ब्लैकलिस्ट किए जाने की कार्रवाई को चुनौती दी थी। हालांकि, हाईकोर्ट के आदेश का लाभ अन्य चार कंपनियों को भी मिला है। अदालत के आदेश के बाद पांचों कंपनियों को अगली सुनवाई यानी 19 नवंबर तक ब्लैकलिस्टिंग की कार्रवाई से राहत मिल गई है। इस अवधि में कंपनियां टेंडर प्रक्रिया में भाग लेने के लिए भी पात्र हो सकती हैं, बशर्ते वे अन्य लागू नियमों और शर्तों को पूरा करती हों तथा किसी अन्य प्रभावी प्रतिबंध के अधीन न हों।
मुख्य अभियंता के हलफनामे पर टिकी निगाहें
हाईकोर्ट ने मुख्य अभियंता से व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर यह बताने को कहा है कि कंपनी को नोटिस जारी किए बिना ब्लैकलिस्ट करने की कार्रवाई किन परिस्थितियों में की गई। अदालत के निर्देशों का पालन नहीं होने की स्थिति में मुख्य अभियंता को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना पड़ सकता है। अब इस मामले में 19 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अदालत के समक्ष मुख्य अभियंता का जवाब और नोटिस की तामील से जुड़े तथ्य सामने आने के बाद मामले की आगे की कानूनी स्थिति स्पष्ट होगी। फिलहाल, हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश से पांचों कंपनियों को राहत मिली है। हालांकि, ब्लैकलिस्टिंग पर लगी रोक को अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। मामले में अंतिम निर्णय अदालत की आगे की सुनवाई और प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर होगा।


