पूस की एक रात जैसी जिंदगी जी रहे कठुई के किसान, फसल बचाने के लिए रातभर खेतों में पहरा

पूस की एक रात जैसी जिंदगी जी रहे कठुई के किसान, फसल बचाने के लिए रातभर खेतों में पहरा

हाथों में टॉर्च, आंखों में नींद और मन में फसल बर्बाद होने का डर; अन्ना मवेशियों से खेत बचाने के लिए रात-रात भर जाग रहे किसान


रिपोर्ट:- सत्यम शुक्ला

कानपुर। रात का सन्नाटा, चारों तरफ अंधेरा और खेतों की मेड़ों पर टॉर्च की रोशनी में पहरा देते किसान। कहीं खेत के एक छोर पर कोई किसान खड़ा है तो कहीं दूसरे छोर पर कोई अपनी फसल की निगरानी कर रहा है। टॉर्च की रोशनी बार-बार खेतों के बीच घूमती है। दूर से किसी मवेशी की आहट सुनाई पड़ते ही किसान सतर्क हो जाते हैं। उन्हें डर है कि कहीं अन्ना मवेशियों का झुंड खेत में घुसकर उनकी महीनों की मेहनत पर पानी न फेर दे। यह दृश्य कानपुर जनपद के बिधनू ब्लॉक के कठुई गांव का है, जहां किसान दिन में खेती-किसानी का काम करने के बाद रातभर अपनी फसलों की रखवाली करने को मजबूर हैं।

हिंदी साहित्य के महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद की कालजयी कहानी ‘पूस की एक रात’ में हल्कू नाम का किसान ठंड भरी रात में अपनी फसल की रखवाली करता है। गरीबी, मजबूरी और खेती से जुड़ी उसकी पीड़ा उस दौर के किसानों की जिंदगी को सामने लाती है। कठुई गांव के खेतों में रात के अंधेरे के बीच पहरा देते किसानों का दृश्य भी उसी कहानी की याद दिलाता है। समय बदल गया, खेती के तौर-तरीकों में बदलाव आया, लेकिन किसान की मुश्किलें आज भी कम नहीं हुईं। यहां किसानों के सामने भी अपनी मेहनत से तैयार हो रही फसल को बचाने की चुनौती है। अंतर बस इतना है कि अब खेतों की रखवाली में अन्ना मवेशियों से फसल को बचाने की चिंता भी शामिल हो गई है।

 रात होते ही खेतों की ओर निकल पड़ते हैं किसान

बिधनू ब्लॉक के कठुई गांव में किसानों के लिए रात का समय आराम करने के बजाय फसल की निगरानी करने का समय बन गया है। दिनभर खेतों में काम करने के बाद जब लोग अपने घरों में आराम करने चले जाते हैं, तब किसानों की दूसरी पारी शुरू होती है। हाथ में टॉर्च लेकर वे खेतों की तरफ निकल पड़ते हैं। खेतों के अलग-अलग छोर पर खड़े होकर निगरानी करते हैं, ताकि अन्ना मवेशियों को खेतों में प्रवेश करने से रोका जा सके।

अंधेरे में खेत की हर मेड़ पर नजर रखना आसान नहीं होता। टॉर्च की रोशनी जहां तक पहुंचती है, किसान वहां तक फसल को देखने की कोशिश करते हैं। कई बार खेत के एक हिस्से पर नजर रखते हुए दूसरे हिस्से की चिंता बनी रहती है। ऐसे में किसानों को लगातार चौकन्ना रहना पड़ता है। रात जितनी गहरी होती जाती है, खेतों में सन्नाटा उतना ही बढ़ता है, लेकिन किसानों की निगरानी जारी रहती है।

महीनों की मेहनत पर मवेशियों के झुंड का खतरा

किसान के लिए खेत में खड़ी फसल उसकी मेहनत, उम्मीद और परिवार के भविष्य से जुड़ी होती है। फसल तैयार करने के लिए उसे खेत की जुताई, बुआई, सिंचाई और खाद समेत कई कामों में समय और पैसा लगाना पड़ता है। मौसम की अनिश्चितता और खेती की बढ़ती लागत के बीच किसान पहले ही कई तरह की चुनौतियों से जूझता है। ऐसे में फसल को अन्ना मवेशियों से बचाना भी उसकी चिंता का बड़ा कारण बन जाता है।

किसानों को आशंका रहती है कि अगर मवेशियों का झुंड खेत में घुस गया तो देखते ही देखते फसल को नुकसान पहुंच सकता है। इसी आशंका के कारण वे रातभर खेतों के आसपास निगरानी करते हैं। उनके लिए थोड़ी देर की लापरवाही भी भारी पड़ सकती है। यही वजह है कि वे नींद आने के बावजूद खेत छोड़कर जाने का जोखिम नहीं लेना चाहते।

 दिन में खेती, रात में पहरेदारी

खेती का काम केवल दिन के उजाले तक सीमित नहीं है, लेकिन कठुई गांव के किसानों के लिए अब रातें भी खेतों के नाम हो रही हैं। दिन में खेतों में मेहनत करने के बाद रात में पहरा देना उनके आराम और दिनचर्या को प्रभावित करता है। शरीर को विश्राम की जरूरत होती है, लेकिन फसल की सुरक्षा की चिंता उन्हें चैन से सोने नहीं देती।

रात के समय हाथों में टॉर्च लेकर खेत के अलग-अलग छोर पर खड़े किसान इस बात का इंतजार करते हैं कि कब सुबह हो और वे निश्चिंत होकर घर लौट सकें। उनके सामने एक ओर परिवार और खेती की जिम्मेदारियां हैं, तो दूसरी ओर फसल को नुकसान से बचाने की मजबूरी। किसान के लिए रात काटना केवल समय गुजारना नहीं, बल्कि अपनी मेहनत की रक्षा करने की जद्दोजहद बन गया है।

खेतों की मेड़ों पर दिखती है किसानों की बेबसी

कठुई गांव के खेतों में टॉर्च की रोशनी में पहरा देते किसानों की तस्वीर ग्रामीण जीवन की उस हकीकत को सामने लाती है, जिसमें अन्नदाता को अपनी फसल बचाने के लिए खुद ही रातभर चौकीदार बनना पड़ रहा है। जिस किसान से पूरे समाज की खाद्यान्न जरूरतें पूरी होने की उम्मीद की जाती है, वही किसान अपनी फसल की सुरक्षा को लेकर चिंतित है।

खेतों के अलग-अलग छोर पर खड़े किसानों की निगाहें लगातार आसपास घूमती रहती हैं। उनके लिए रात का हर पहर महत्वपूर्ण है। सुबह होने पर भले ही खेत सुरक्षित दिखाई दें, लेकिन अगली रात फिर वही चिंता उनके सामने खड़ी हो जाती है। इस तरह फसल की रखवाली का यह सिलसिला किसानों की दिनचर्या का हिस्सा बनता जा रहा है।

‘पूस की एक रात’ की याद दिलाता दृश्य

प्रेमचंद की कहानी ‘पूस की एक रात’ में हल्कू की मजबूरी केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि किसान के संघर्ष और उसकी सीमित परिस्थितियों का प्रतीक है। कठुई गांव के किसानों की स्थिति भी उसी ग्रामीण यथार्थ की याद दिलाती है। खेत में खड़ी फसल को बचाने के लिए रातभर जागना यह बताता है कि खेती केवल बीज बोने और फसल काटने तक सीमित नहीं है। इसके साथ ऐसी जिम्मेदारियां भी जुड़ी हैं, जिनका असर किसान की नींद, आराम और पारिवारिक जीवन तक पड़ता है।

आज कठुई गांव के खेतों में टॉर्च की रोशनी में घूमती निगाहें मानो यही सवाल पूछ रही हैं कि आखिर किसान कब चैन की नींद सो पाएगा? दिनभर मेहनत करने के बाद अगर उसे रातभर अपनी फसल की रखवाली करनी पड़े, तो उसकी परेशानी को समझना जरूरी है।

 समाधान की उम्मीद में किसान

अन्ना मवेशियों से फसल की सुरक्षा की समस्या का स्थायी समाधान किसानों के लिए बड़ी राहत साबित हो सकता है। खेतों की सुरक्षा के लिए प्रभावी व्यवस्था, मवेशियों के प्रबंधन और संबंधित स्तर पर जरूरी कदम उठाए जाने से किसानों की परेशानी कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि कठुई गांव में इस संबंध में प्रशासनिक स्तर पर क्या व्यवस्था है और किसानों की ओर से कोई शिकायत की गई है या नहीं, इसकी जानकारी मिलने पर समस्या की पूरी तस्वीर सामने आ सकेगी।

फिलहाल कठुई गांव के किसानों की रातें खेतों की निगरानी में गुजर रही हैं। हाथों में टॉर्च, सामने फसल और चारों ओर अंधेरा। हर रात उनके सामने एक ही चुनौती होती है—सुबह होने तक अपनी मेहनत को सुरक्षित रखना।

*पूस की एक रात में हल्कू की फसल और उसकी मजबूरी कहानी का हिस्सा थी, लेकिन कठुई गांव के किसानों के लिए फसल बचाने की यह जद्दोजहद आज की हकीकत है।* खेतों की मेड़ों पर जागते इन किसानों की आंखों में नींद भले ही हो, लेकिन फसल सुरक्षित रखने की उम्मीद उन्हें रातभर जगाए रखती है।

Pankaj

worldkhabarexpress.com

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