भारतवंशी नवनीतम पिल्लै को शांति का नोबेल पुरस्कार
पेशे से जज, दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ लड़ने में नेल्सन मंडेला की मदद की
उन्हें युद्ध अपराध और नरसंहार के दोषियों को सजा दिलाने और अंतरराष्ट्रीय कानून मजबूत करने के लिए यह सम्मान दिया जाएगा। समिति ने कहा कि दुनिया में बढ़ते युद्धों और संघर्षों के बीच शांति बनाए रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन बेहद जरूरी है। पिल्लै को दिसंबर में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में सम्मानित किया जाएगा। उन्हें मेडल, डिप्लोमा और पुरस्कार राशि दी जाएगी। 2026 में नोबेल पुरस्कार की राशि करीब 11.5 करोड़ रुपए है।
नवनीतम नवी पिल्लै का जन्म 23 सितंबर 1941 को दक्षिण अफ्रीका के डरबन में हुआ था। उनका परिवार भारतीय तमिल मूल का है। उनके दादा 1890 के दशक में भारत से बंधुआ मजदूर बनकर दक्षिण अफ्रीका गए थे। वहां वे चीनी के बागानों में काम करते थे। एक हादसे में उनके दोनों हाथ चले गए।
परिवार की आर्थिक हालत खराब होने के कारण उनके दादा ने अपने बेटे नारायणसामी नायडू को 8 साल की उम्र में ही स्कूल छुड़ाकर काम पर लगा दिया।
नारायणसामी ने जीवनभर बस ड्राइवर के रूप में काम किया। उनकी पत्नी संथमा घर संभालती थीं। परिवार डरबन के क्लेयरवुड इलाके में गरीबी में रहता था, लेकिन माता-पिता ने बच्चों की पढ़ाई नहीं रुकने दी।
रंगभेद के दौर में वकालत की शुरुआत की
नवी पिल्लै ने डरबन विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई की। उन्होंने 1963 में ग्रेजुएशन और 1965 में कानून की डिग्री हासिल की। इसके बाद अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से मास्टर और डॉक्टरेट की पढ़ाई की।
1967 में उन्होंने नेटाल प्रांत में अपनी लॉ फर्म शुरू की। रंगभेद के दौर में कोई भी फर्म उन्हें नौकरी देने को तैयार नहीं थी। ऐसे में उन्होंने खुद की फर्म खोलकर वकालत शुरू की। वह ऐसा करने वाली पहली महिला बनीं।

मंडेला समेत राजनीतिक कैदियों की मदद की
पिल्लै ने रंगभेद का विरोध करने वाले कई कार्यकर्ताओं के मुकदमे लड़े। उन्होंने अदालत से राजनीतिक कैदियों को वकील से मिलने का अधिकार दिलाने में अहम भूमिका निभाई। इससे नेल्सन मंडेला समेत रोबेन द्वीप की जेल में बंद कैदियों को फायदा मिला।
उन्होंने पुलिस की अवैध पूछताछ के खिलाफ भी कानूनी लड़ाई लड़ी और इसे रोकने के लिए अदालत से आदेश हासिल किया। उनके पति को भी एक बार गिरफ्तार किया गया था।
दक्षिण अफ्रीका की हाई कोर्ट में पहली गैर-श्वेत महिला जज बनीं
1995 में पिल्लै दक्षिण अफ्रीका की हाई कोर्ट में जज बनीं। वह इस पद पर पहुंचने वाली पहली गैर-श्वेत महिला थीं। इसके बाद उन्होंने रवांडा में नरसंहार से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाले अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण में काम किया और बाद में इसकी अध्यक्ष भी बनीं।
रवांडा के एक ऐतिहासिक मुकदमे में अदालत ने माना कि बलात्कार और यौन हिंसा को मानवता के खिलाफ अपराध और नरसंहार का हिस्सा माना जा सकता है। इसी मामले में प्रचार के जरिए नरसंहार के लिए उकसाने को भी अपराध माना गया।
संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार प्रमुख भी रहीं
पिल्लै अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय में भी जज रहीं। 2008 से 2014 तक उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त के रूप में काम किया। इस दौरान उनकी जिम्मेदारी दुनिया भर में मानवाधिकारों की रक्षा से जुड़े मामलों पर काम करना था।
वह फिलिस्तीनी क्षेत्र से जुड़े मामलों की जांच करने वाले संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र आयोग की अध्यक्षता भी कर चुकी हैं। नोबेल समिति की घोषणा के मुताबिक, वह अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में म्यांमार पर नरसंहार के आरोपों से जुड़े मामले में भी जज हैं।
पिल्लै के 5 अहम काम….
1. रंगभेद के खिलाफ लड़ाई: दक्षिण अफ्रीका में वकील रहते हुए उन्होंने रंगभेद की नीति का विरोध करने वाले कार्यकर्ताओं का बचाव किया। उन्होंने राजनीतिक कैदियों के अधिकारों के लिए भी काम किया।
2. महिलाओं के अधिकारों के लिए काम: 1985 में उन्होंने इक्वैलिटी नाऊ नाम के अंतरराष्ट्रीय संगठन की सह-स्थापना की। यह संगठन महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों के लिए काम करता है।
3. अंतरराष्ट्रीय अपराधों पर सुनवाई: 2003 में वे अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) की जज बनीं। यहां नरसंहार, युद्ध अपराध और मानवता के खिलाफ अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई होती है।
4. संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकारों की रक्षा: 2008 से 2014 तक उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार प्रमुख के तौर पर काम किया। इस दौरान उन्होंने दुनिया भर में मानवाधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ आवाज उठाने और दोषियों की जवाबदेही तय करने पर जोर दिया।
5. दक्षिण अफ्रीका में इतिहास रचा: 1967 में वे नटाल प्रांत में वकालत शुरू करने वाली पहली महिला बनीं। बाद में वे दक्षिण अफ्रीका के हाई कोर्ट में जज बनने वाली पहली अश्वेत महिला भी बनीं
शांति का नोबेल स्वीडन की बजाय नॉर्वे में क्यों?
नोबेल के बाकी पुरस्कार स्वीडन में दिए जाते हैं, लेकिन शांति का नोबेल नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में दिया जाता है। इसकी वजह करीब 130 साल पुरानी है। यह व्यवस्था खुद अल्फ्रेड नोबेल ने अपनी वसीयत में तय की थी।
1895 में लिखी अपनी वसीयत में नोबेल ने तय किया था कि शांति पुरस्कार का फैसला नॉर्वे की संसद द्वारा चुनी गई समिति करेगी। उस समय स्वीडन और नॉर्वे एक ही राजा के अधीन थे, हालांकि दोनों की अपनी संसद और अलग राजनीतिक व्यवस्था थी।
नोबेल ने यह नहीं बताया था कि शांति पुरस्कार के लिए उन्होंने नॉर्वे को ही क्यों चुना। नोबेल की 1896 में मौत हुई और 1901 से पुरस्कार दिए जाने लगे। उस समय स्वीडन और नॉर्वे एक संघ में थे।
1905 में दोनों देश अलग हो गए, लेकिन नोबेल की वसीयत में शांति पुरस्कार के लिए नॉर्वे को दी गई जिम्मेदारी जारी रही। इसी वजह से आज भी फिजिक्स, केमिस्ट्री, मेडिसिन, साहित्य और अर्थशास्त्र के नोबेल स्वीडन में, जबकि शांति का नोबेल नॉर्वे में दिया जाता है।

