डेढ़ सदी की आस्था का प्रतीक कानपुर की परेड रामलीला, 1877 से चली आ रही परंपरा

डेढ़ सदी की आस्था का प्रतीक कानपुर की परेड रामलीला, 1877 से चली आ रही परंपरा

अंग्रेजों के शासनकाल में हुई थी शुरुआत, विजयादशमी पर रावण वध देखने उमड़ता है जनसैलाब; रामलीला के मंचन से जीवंत होते हैं रामायण के प्रसंग

कानपुर नगर। औद्योगिक नगरी कानपुर की पहचान केवल अपने उद्योगों और ऐतिहासिक बाजारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं भी शहर को विशिष्ट पहचान देती हैं। इन्हीं परंपराओं में परेड की ऐतिहासिक रामलीला का विशेष स्थान है। लगभग डेढ़ सदी से चली आ रही यह रामलीला धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक सहभागिता का प्रतीक बनी हुई है। हर वर्ष शारदीय नवरात्र में रामायण के प्रसंगों का मंचन देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। विजयादशमी पर रावण वध और दशहरा मेले के आयोजन के साथ यह उत्सव अपने चरम पर पहुंच जाता है।

1877 में हुई थी परेड रामलीला की शुरुआत

ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, कानपुर की परेड रामलीला की शुरुआत वर्ष 1877 में हुई थी। इसका श्रेय महाराज प्रयाग नारायण तिवारी को दिया जाता है, जिन्होंने परेड रामलीला सोसाइटी का गठन कर यहां रामलीला मंचन की परंपरा शुरू कराई। अंग्रेजों के शासनकाल में शुरू हुआ यह धार्मिक आयोजन समय के साथ कानपुर की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

उस दौर में धार्मिक आयोजनों के माध्यम से समाज को एकजुट करने और भारतीय परंपराओं को जीवित रखने में रामलीलाओं की अहम भूमिका रही। परेड रामलीला भी इसी सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा बनी। पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस आयोजन से लोगों का जुड़ाव बना रहा और आज भी यह शहर के प्रमुख दशहरा आयोजनों में गिनी जाती है।

वर्ष 2026 में इस रामलीला का 150वां स्थापना वर्ष बताया जा रहा है। इस लिहाज से इस वर्ष का आयोजन ऐतिहासिक महत्व रखता है।

रामायण के प्रसंगों से जीवंत होता है मंच

परेड रामलीला में भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़े विभिन्न प्रसंगों का मंचन किया जाता है। राम जन्म, सीता स्वयंवर, वनवास, सीता हरण, हनुमान जी की लंका यात्रा, लंका दहन और राम-रावण युद्ध जैसे प्रसंगों के माध्यम से दर्शकों को रामायण की कथा से जोड़ा जाता है।

मंचन के दौरान कलाकार अपने अभिनय और संवादों के जरिए धर्म, मर्यादा, कर्तव्य, त्याग और सत्य के महत्व को प्रस्तुत करते हैं। रामलीला केवल धार्मिक मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि इसके जरिए नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति और आदर्शों से परिचित कराने का प्रयास भी किया जाता है।

मथुरा की रामलीला मंडली से जुड़ी है मंचन की परंपरा

परेड रामलीला की विशेषताओं में इसकी मंचन परंपरा भी शामिल है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, यहां भगवान के स्वरूप में बच्चों को तैयार कर रामलीला प्रस्तुत करने की परंपरा वर्ष 1975 तक चली। इसके बाद मथुरा की रामलीला मंडली इस परंपरा को आगे बढ़ाती रही है।

रामलीला भवन में आयोजन से जुड़ी कुछ पुरानी धार्मिक वस्तुओं के सुरक्षित रखे होने का भी उल्लेख मिलता है। इनमें महाराज प्रयाग नारायण तिवारी से संबंधित कुछ मुखौटे, चांदी के सिंहासन और हनुमान जी का मुकुट शामिल बताए जाते हैं। आयोजन शुरू होने से पहले इन वस्तुओं का विधि-विधान से पूजन किए जाने की परंपरा भी बताई जाती है।

ये वस्तुएं केवल धार्मिक महत्व ही नहीं रखतीं, बल्कि आयोजन के लंबे इतिहास और उससे जुड़ी स्मृतियों की भी प्रतीक हैं।

विजयादशमी पर रावण वध बना मुख्य आकर्षण

परेड रामलीला का सबसे बड़ा आकर्षण विजयादशमी पर होने वाला रावण वध है। इस अवसर पर रावण के पुतले के दहन के साथ बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है। दशहरा मेले में परिवारों और बच्चों की भागीदारी से पूरा क्षेत्र उत्सवमय हो उठता है।

वर्ष 2026 में परेड मैदान में रावण वध एवं दशहरा मेले का आयोजन 20 अक्टूबर को निर्धारित है। आयोजन के दौरान श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए यातायात पुलिस ने भी विशेष व्यवस्था की है। 20 अक्टूबर को शाम पांच बजे से कार्यक्रम समाप्त होने तक परेड और आसपास के कई प्रमुख मार्गों पर यातायात डायवर्जन लागू रहेगा।

प्रशासन और यातायात पुलिस की ओर से लोगों को निर्धारित मार्गों का पालन करने तथा वाहनों को तय पार्किंग स्थलों पर खड़ा करने की सलाह दी गई है, ताकि आयोजन के दौरान यातायात व्यवस्था सुचारु बनी रहे।

सामाजिक सद्भाव की परंपरा भी है खास

परेड रामलीला की पहचान धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक सहभागिता से भी जुड़ी है। कानपुर की सांस्कृतिक विविधता के बीच ऐसे आयोजन विभिन्न समुदायों के लोगों को एक साथ आने का अवसर देते हैं। रावण और अन्य पात्रों के पुतले तैयार करने में अलग-अलग समुदायों के कारीगरों की भागीदारी का उल्लेख भी इस आयोजन से जुड़े सांस्कृतिक विवरणों में मिलता है।

यह परंपरा बताती है कि धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव समाज के विभिन्न वर्गों के बीच सहयोग और आपसी जुड़ाव को मजबूत करने का माध्यम बन सकते हैं।

नई पीढ़ी तक पहुंच रही सांस्कृतिक विरासत

समय के साथ शहर का स्वरूप बदला है, आबादी बढ़ी है और मनोरंजन के साधन भी बदल गए हैं, लेकिन परेड रामलीला के प्रति लोगों की आस्था आज भी बनी हुई है। बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक, अनेक परिवार इस आयोजन को अपनी सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा मानते हैं।रामलीला के संवाद, मंचन, धार्मिक अनुष्ठान और विजयादशमी का उत्सव लोगों को भारतीय परंपराओं से जोड़ते हैं। यही वजह है कि परेड रामलीला को केवल एक वार्षिक आयोजन नहीं, बल्कि कानपुर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के रूप में देखा जाता है।लगभग 150 वर्षों की यात्रा पूरी करने की ओर बढ़ रही यह रामलीला आज भी भगवान श्रीराम के आदर्शों और सत्य की विजय का संदेश दे रही है। बदलते समय के बीच इसकी निरंतरता इस बात का प्रमाण है कि धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपराएं समाज की सामूहिक स्मृति को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

Pankaj

worldkhabarexpress.com

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