मुंशीगंज गोलीकांड : भारत के किसान संघर्ष का भूला हुआ जलियांवाला बाग

मुंशीगंज गोलीकांड : भारत के किसान संघर्ष का भूला हुआ जलियांवाला बाग

राजेंद्र कुमार
विशेष संवाददाता, वर्ल्ड खबर एक्सप्रेस, कानपुर
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास केवल बड़े नेताओं, कांग्रेस अधिवेशनों और जेल यात्राओं का इतिहास नहीं है। यह उन किसानों की भी कहानी है जिनकी पीड़ा, भूख, अपमान और संघर्ष ने अंग्रेजी शासन की जड़ों को हिलाने का काम किया। उत्तर प्रदेश के रायबरेली जनपद का मुंशीगंज ऐसा ही एक ऐतिहासिक स्थल है, जहाँ 7 जनवरी 1921 को किसानों पर चली गोलियों ने पूरे देश को झकझोर दिया था।
दुर्भाग्य यह है कि उत्तर प्रदेश की पाठ्य पुस्तकों और सामान्य इतिहास लेखन में मुंशीगंज गोलीकांड को वह स्थान कभी नहीं मिला, जिसका वह वास्तविक अधिकारी था। जिस प्रकार जलियांवाला बाग हत्याकांड राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बना, उसी प्रकार अवध का मुंशीगंज भी किसान चेतना और औपनिवेशिक क्रूरता का बड़ा प्रतीक था।
मुंशीगंज गोलीकांड की तुलना जलियांवाला बाग कांड से किए जाने का ऐतिहासिक संदर्भ भी महत्वपूर्ण है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी ने रायबरेली की इस घटना को जलियांवाला बाग कांड की गंभीरता के संदर्भ में देखा था। रायबरेली के ऐतिहासिक विवरणों में भी इस संदर्भ का उल्लेख मिलता है। यही कारण है कि मुंशीगंज को लंबे समय से उत्तर प्रदेश का जलियांवाला बाग कहा जाता रहा है।
दोनों घटनाओं में एक भयावह समानता थी—निहत्थी जनता पर सत्ता की गोलियाँ। अंतर केवल इतना था कि जलियांवाला बाग राष्ट्रीय विमर्श का स्थायी हिस्सा बन गया, जबकि मुंशीगंज धीरे-धीरे इतिहास की धूल में दबता चला गया।
लेकिन इतिहास की सच्चाई यह है कि मुंशीगंज केवल रायबरेली का कस्बा नहीं, बल्कि भारतीय किसान संघर्ष, जनप्रतिरोध और लोकतांत्रिक चेतना की राष्ट्रीय धरोहर है।
उस समय भारत अंग्रेजी शासन के अधीन था। किसानों की हालत अत्यंत दयनीय थी। अवध क्षेत्र के किसान दोहरी मार झेल रहे थे—एक ओर अंग्रेजी सत्ता और दूसरी ओर जमींदारों तथा तालुकेदारों का अत्याचार।
किसानों से भारी लगान वसूला जाता था। फसल खराब होने पर भी राहत नहीं मिलती थी। गरीब किसान कर्ज में डूबते जा रहे थे। कई बार उन्हें अपनी उपज का बड़ा हिस्सा जमींदारों को देना पड़ता था।
सबसे अमानवीय व्यवस्था थी बेगार प्रथा।
बेगार का अर्थ था बिना मजदूरी किसानों से जबरन काम कराना। तालुकेदार किसानों को निजी कामों, निर्माण कार्यों और खेतों में मुफ्त श्रम करने को मजबूर करते थे। विरोध करने पर पिटाई, जुर्माना और जमीन से बेदखली का भय रहता था।
गाँवों में किसान केवल आर्थिक शोषण नहीं झेल रहा था, बल्कि उसका आत्मसम्मान भी कुचला जा रहा था। यही कारण था कि धीरे-धीरे किसानों के भीतर विद्रोह की चेतना जन्म लेने लगी।
अंग्रेजी शासन ने अवध के अनेक तालुकेदारों को केवल भूमि और अधिकार ही नहीं दिए थे, बल्कि उन्हें हथियारबंद प्रभाव और प्रशासनिक संरक्षण भी प्रदान किया था। कई बड़े तालुकेदारों के पास बंदूकधारी कारिंदे और निजी सशस्त्र शक्ति मौजूद रहती थी।
सामान्य किसान निहत्था था, जबकि सामंती ताकतें बंदूक और शासन—दोनों के सहारे खड़ी थीं। यही असमानता आगे चलकर मुंशीगंज जैसे रक्तरंजित घटनाक्रमों का कारण बनी।
1857 के भारतीय विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने अवध में ऐसी नीति अपनाई थी जिसमें बड़े तालुकेदारों को अपने पक्ष में रखना आवश्यक माना गया। बदले में यही सामंती वर्ग गाँवों में अंग्रेजी सत्ता की पकड़ मजबूत करता था। किसानों के आंदोलनों को दबाने में भी कई बार यही शक्तियाँ प्रशासन के साथ खड़ी दिखाई देती थीं।
इसी दौर में अवध किसान आंदोलन का उदय हुआ।
इस आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण नेता बाबा रामचंद्र थे। उनका वास्तविक नाम रामचंद्र पांडुरंग था। वे मूलतः महाराष्ट्र के निवासी थे। युवावस्था में रोज़गार की तलाश में वे फिजी तक गए थे, जहाँ उन्होंने गिरमिटिया भारतीय मजदूरों की पीड़ा और अंग्रेजी शोषण को बहुत करीब से देखा।
फिजी में भारतीय मजदूरों से कठोर श्रम कराया जाता था। उनके साथ अपमानजनक व्यवहार होता था। बाबा रामचंद्र ने वहाँ शोषण की उस व्यवस्था को देखा जिसमें गरीब भारतीय केवल श्रम का साधन बनकर रह गया था।
फिजी से लौटने के बाद जब वे उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र में पहुँचे तो उन्हें लगा कि यहाँ का किसान भी किसी बंधुआ मजदूर से कम नहीं है। खेत किसान जोत रहा था, लेकिन अधिकार जमींदारों के पास था। किसान अनाज उगा रहा था, लेकिन उसका अपना घर भूख और अभाव से भरा था।
बाबा रामचंद्र गाँव-गाँव घूमने लगे। वे किसानों के बीच बैठते, उनकी समस्याएँ सुनते और उन्हें संगठित होने के लिए प्रेरित करते। वे रामायण की चौपाइयाँ सुनाकर किसानों में आत्मविश्वास जगाते थे। इसी कारण ग्रामीण जनता उन्हें अपना नेता ही नहीं, बल्कि अपना आदमी मानने लगी थी।
धीरे-धीरे अवध किसान सभा का विस्तार होने लगा। हजारों किसान आंदोलन से जुड़ने लगे। किसान अब खुलकर अपनी समस्याएँ उठाने लगे थे। यही जागरूकता अंग्रेजी शासन और सामंती ताकतों को असहज कर रही थी।
1920 के अंतिम महीनों तक रायबरेली और आसपास के क्षेत्रों में किसान आंदोलन तेजी से फैल चुका था। जगह-जगह सभाएँ हो रही थीं। किसान बेगार बंद करने, लगान घटाने और अत्याचार रोकने की मांग कर रहे थे।
लेकिन सत्ता संवाद नहीं चाहती थी।
जनवरी 1921 में कई किसान नेताओं की गिरफ्तारी ने किसानों के भीतर भारी आक्रोश पैदा कर दिया। गाँवों से हजारों किसान रायबरेली की ओर आने लगे। वे अपने नेताओं की रिहाई और न्याय की मांग कर रहे थे।
7 जनवरी 1921 को बड़ी संख्या में किसान मुंशीगंज क्षेत्र में सई नदी के पुल के पास एकत्र हुए। किसानों के पास आधुनिक हथियार नहीं थे। वे अपनी पीड़ा कहने आए थे।
लेकिन प्रशासन पहले से भयभीत था। अंग्रेज अधिकारियों और स्थानीय तालुकेदारों को लग रहा था कि यदि यह आंदोलन और फैल गया तो ग्रामीण इलाकों में उनका नियंत्रण कमजोर पड़ जाएगा।
इसी तनाव के बीच हालात अचानक बिगड़ गए।
इतिहास के कई विवरण बताते हैं कि पहले स्थानीय तालुकेदार पक्ष से गोली चली। इसके बाद पुलिस और प्रशासन ने भी अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी।
देखते ही देखते सई नदी का किनारा चीखों और भगदड़ से भर गया। किसान इधर-उधर भागने लगे। कई लोग नदी की ओर दौड़े। कई वहीं गिर पड़े।
गोलियाँ निहत्थे किसानों के शरीर चीरती चली गईं।
इस घटना के बाद जनस्मृति में यह बात फैल गई कि किसानों के रक्त से सई नदी का पानी लाल हो गया था। यह वर्णन प्रतीकात्मक हो सकता है, लेकिन घटना की भयावहता को समझने के लिए इतना ही पर्याप्त है कि आज एक सदी बाद भी यह स्मृति लोगों के भीतर जीवित है।
मृतकों की वास्तविक संख्या आज भी विवाद का विषय है। अंग्रेजी सरकार ने कम संख्या बताई। सरकारी अभिलेखों में लगभग 13 लोगों के मारे जाने का उल्लेख मिलता है।
लेकिन स्थानीय लोगों, आंदोलनकारियों और स्वतंत्र स्रोतों का मानना था कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक थी। कुछ विवरणों में दर्जनों और कुछ में सैकड़ों किसानों के मारे जाने की बात कही गई।
औपनिवेशिक शासन पर उस समय भी आरोप लगे कि उसने वास्तविक आंकड़ों को छिपाने का प्रयास किया।
मुंशीगंज गोलीकांड की गूंज पूरे देश में सुनाई दी।
उस समय युवा जवाहरलाल नेहरू अवध के किसान आंदोलनों में सक्रिय रुचि ले रहे थे। किसानों की दुर्दशा ने उन्हें भीतर तक प्रभावित किया था।
जब रायबरेली की स्थिति गंभीर हुई तो नेहरू वहाँ पहुँचे। उन्होंने किसानों से संवाद करने और हालात समझने का प्रयास किया। लेकिन अंग्रेजी प्रशासन उनके सक्रिय हस्तक्षेप से असहज था।
ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि प्रशासन ने नेहरू की गतिविधियों को सीमित करने की कोशिश की। उन्हें स्वतंत्र रूप से किसानों के बीच काम नहीं करने दिया गया।
नेहरू ने बाद में अपने लेखों और संस्मरणों में रायबरेली और अवध किसान आंदोलन का उल्लेख किया। उन्होंने इस घटना को अत्यंत दुखद बताया और ब्रिटिश शासन की कठोर आलोचना की।
मुंशीगंज गोलीकांड ने राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई दिशा दी। इससे यह स्पष्ट हो गया कि भारत की आजादी की लड़ाई केवल शहरों तक सीमित नहीं है। गाँवों और खेतों का भारत भी अब जाग चुका है।
कहा जाता है कि मुंशीगंज ने अंग्रेजी शासन को यह एहसास करा दिया कि किसानों की समस्याओं को अब अनदेखा नहीं किया जा सकता। किसानों का यह विद्रोह केवल स्थानीय असंतोष नहीं था, बल्कि भारतीय समाज के भीतर जमा हो चुके आक्रोश का विस्फोट था।
इसी कारण कई इतिहासकार मुंशीगंज को भारतीय किसान आंदोलनों का निर्णायक मोड़ मानते हैं।
आजादी के बाद मुंशीगंज में इस घटना की स्मृति में स्मारक स्थापित किया गया। शहीद किसानों को श्रद्धांजलि दी जाती है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस घटना ने अवध और उत्तर भारत की किसान चेतना को झकझोरा, वह आज भी राष्ट्रीय स्तर पर वैसी पहचान नहीं पा सकी जिसकी वह अधिकारी थी।
रायबरेली के वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व ब्यूरो चीफ हिंदुस्तान गौरव अवस्थी बताते हैं कि मुंशीगंज में शहीद किसानों की स्मृति में स्मारक तो बना है, लेकिन आज उसकी सुध लेने वाला शायद ही कोई है। उनके अनुसार यह उत्तर प्रदेश का जलियांवाला बाग है, पर विडंबना यह है कि हम स्वयं अपने इतिहास को भूलते जा रहे हैं। जिस धरती ने किसान संघर्ष और बलिदान का इतना बड़ा अध्याय देखा, वह आज राष्ट्रीय स्मृति में वह स्थान नहीं पा सकी जिसकी वह वास्तविक अधिकारी है।
यह भी एक ऐतिहासिक विडंबना है कि मुंशीगंज गोलीकांड जैसा बड़ा किसान नरसंहार उत्तर प्रदेश की पाठ्य पुस्तकों में प्रमुखता से दर्ज नहीं हो सका। नई पीढ़ी के बहुत से छात्र जलियांवाला बाग के बारे में जानते हैं, लेकिन मुंशीगंज का नाम तक नहीं सुन पाते।
जबकि सच्चाई यह है कि मुंशीगंज केवल एक स्थानीय घटना नहीं, बल्कि भारतीय किसान संघर्ष और औपनिवेशिक दमन का राष्ट्रीय दस्तावेज है।
यह वह स्थान है जहाँ भारतीय किसान ने पहली बार इतने बड़े स्तर पर संगठित होकर अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाई और सत्ता ने उसका उत्तर गोलियों से दिया।
मुंशीगंज की धरती हमें याद दिलाती है कि भारत की स्वतंत्रता केवल राजनीतिक समझौतों से नहीं मिली थी। उसके पीछे खेतों में पसीना बहाने वाले किसानों का रक्त भी शामिल था।
आज जब देश किसान आंदोलनों, ग्रामीण संकट और सामाजिक न्याय की बात करता है, तब मुंशीगंज का इतिहास और भी प्रासंगिक हो उठता है।
यह घटना हमें यह भी सिखाती है कि जब समाज की पीड़ा को लंबे समय तक दबाया जाता है, तब इतिहास किसी न किसी मोड़ पर विस्फोट बनकर सामने आता है।
सई नदी आज भी बहती है। मुंशीगंज आज भी वहीं है। समय बदल गया, शासन बदल गया, लेकिन इतिहास की स्मृति में वह दिन अब भी जीवित है जब किसानों के अधिकारों की मांग का उत्तर गोलियों से दिया गया था।
और शायद इसी कारण मुंशीगंज केवल एक कस्बा नहीं, बल्कि भारतीय किसान संघर्ष, जनप्रतिरोध और लोकतांत्रिक चेतना की राष्ट्रीय धरोहर बन चुका है।
राजेंद्र कुमार
ऐतिहासिक और सामायिक विषयों पर लगातार लिखते रहते हैं।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)

Pankaj

worldkhabarexpress.com

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