मास्टरदा सूर्य सेन : बंगाल का वह क्रांतिकारी जिसे भुलाया नहीं जा सकता
राजेंद्र कुमार विशेष संवाददाता।
वर्ल्ड खबर एक्सप्रेस– आज जब देश में ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने पर चर्चा हो रही है, तब बंगाल की धरती से जुड़े उस इतिहास को याद करना जरूरी है, जिसमें ‘वंदे मातरम्’ केवल गीत नहीं था, बल्कि आजादी की लड़ाई में लोगों के भीतर देश के लिए कुछ कर गुजरने का हौसला पैदा करने वाली आवाज भी था। इसी बंगाल की धरती ने ऐसे कई क्रांतिकारियों को जन्म दिया, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी। इनमें एक नाम मास्टरदा सूर्य सेन का है, जिनकी कहानी आज भी देश के स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे साहसिक कहानियों में गिनी जाती है।
सूर्य सेन का जन्म 22 मार्च 1894 को चटगांव के नोआपाड़ा क्षेत्र में हुआ था। उस समय यह इलाका ब्रिटिश भारत का हिस्सा था और आज बांग्लादेश में है। वे पेशे से शिक्षक थे। इसी कारण उनके साथियों और आसपास के लोग उन्हें प्यार से ‘मास्टरदा’ कहने लगे। लेकिन शिक्षक के रूप में बच्चों को पढ़ाने वाला यह व्यक्ति धीरे-धीरे अंग्रेजी शासन के खिलाफ चल रहे क्रांतिकारी आंदोलन का एक बड़ा चेहरा बन गया।
सूर्य सेन का मानना था कि केवल भाषण देने या अंग्रेजी सरकार से मांग करने से देश आजाद नहीं होगा। वे चाहते थे कि युवाओं को संगठित किया जाए, उन्हें देश की आजादी के लिए तैयार किया जाए और जरूरत पड़ने पर अंग्रेजी शासन को सीधी चुनौती दी जाए। वे कांग्रेस के असहयोग आंदोलन से भी जुड़े और जेल गए। 1926 से 1928 के बीच उन्होंने जेल में समय बिताया। जेल से बाहर आने के बाद उनका ध्यान फिर क्रांतिकारी गतिविधियों की ओर गया।
उस समय बंगाल और चटगांव में अंग्रेजी शासन के खिलाफ युवाओं में बेचैनी बढ़ रही थी। देश के अलग-अलग हिस्सों में क्रांतिकारी संगठन काम कर रहे थे। इन संगठनों का उद्देश्य अंग्रेजी शासन को कमजोर करना और अंततः देश को आजाद कराना था। चटगांव में भी सूर्य सेन ने ऐसे युवाओं को एक साथ लाना शुरू किया, जो देश की आजादी के लिए जोखिम उठाने को तैयार थे।
इसी प्रयास से आगे चलकर ‘इंडियन रिपब्लिकन आर्मी, चटगांव शाखा’ का गठन हुआ। इसका गठन करीब 1929 के आसपास हुआ माना जाता है। इसका नाम सुनने में भले ही बड़ा लगे, लेकिन इसके पास कोई बड़ी सेना नहीं थी। इसमें शिक्षक, विद्यार्थी, युवा और ऐसे सामान्य लोग थे, जो देश की आजादी के लिए अपने जीवन तक को दांव पर लगाने को तैयार थे। सूर्य सेन इसके प्रमुख नेता थे। उनके साथ अंबिका चक्रवर्ती, निर्मल सेन, अनंत सिंह, गणेश घोष, लोकेनाथ बल, हरिगोपाल बल, तारकेश्वर दस्तिदार और दूसरे कई युवा जुड़े। बाद में प्रीतिलता वाडेदार और कल्पना दत्ता जैसी महिला क्रांतिकारी भी इस आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनीं।
यह समझना जरूरी है कि उस समय ऐसा संगठन क्यों बनाया गया। अंग्रेजी सरकार ने भारत में अपने शासन को मजबूत करने के लिए पुलिस, सेना, अदालत और सरकारी व्यवस्था का बड़ा जाल खड़ा कर रखा था। आम लोगों के पास हथियार नहीं थे और अंग्रेजों के पास हथियारों के साथ प्रशिक्षित सैनिक भी थे। ऐसे माहौल में क्रांतिकारियों को लगता था कि अगर अंग्रेजी शासन को चुनौती देनी है तो युवाओं को संगठित करना होगा, उन्हें शारीरिक प्रशिक्षण देना होगा और जरूरत पड़ने पर अंग्रेजी सरकार के हथियारों तथा उसकी व्यवस्था को नुकसान पहुंचाना होगा।
सूर्य सेन और उनके साथियों ने युवाओं को शारीरिक अभ्यास और हथियार चलाने की ट्रेनिंग भी दी। वे छोटे-छोटे समूहों में काम करते थे। संगठन की बातें बाहर न जाएं, इसका विशेष ध्यान रखा जाता था। अंग्रेजी पुलिस को भी धीरे-धीरे पता चलने लगा था कि चटगांव में युवाओं का एक ऐसा समूह तैयार हो रहा है, जो सामान्य राजनीतिक आंदोलन से आगे जाकर अंग्रेजी शासन को सीधी चुनौती देना चाहता है।
सूर्य सेन के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि इतने सीमित साधनों के साथ अंग्रेजी सरकार जैसी मजबूत व्यवस्था का सामना कैसे किया जाए। इसी सोच से एक ऐसी योजना बनी, जिसने चटगांव का नाम इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज कर दिया।
18 अप्रैल 1930 की रात चटगांव में क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी सरकार के हथियारों के ठिकानों पर हमला करने की योजना को अंजाम दिया। इसे चटगांव शस्त्रागार कांड या चटगांव आर्मरी रेड के नाम से जाना जाता है। इसमें करीब 60 से 65 क्रांतिकारी शामिल थे। योजना केवल हथियार लेने तक सीमित नहीं थी। अंग्रेजों की फोन-तार व्यवस्था को काटना, रेलवे संपर्क को रोकना और पुलिस तथा सहायक सेना के हथियारों के ठिकानों पर कब्जा करना भी योजना का हिस्सा था।
क्रांतिकारियों ने पुलिस के हथियारों के गोदाम और सहायक सेना के हथियारों के ठिकाने पर धावा बोला। उन्होंने हथियार हासिल किए, लेकिन उनकी सबसे बड़ी परेशानी यह रही कि उन्हें पर्याप्त मात्रा में गोलियां नहीं मिल सकीं। हथियार हाथ लग जाने के बाद भी उनके पास लंबी लड़ाई लड़ने के लिए जरूरी गोला-बारूद नहीं था।
इसके बावजूद उस रात चटगांव में जो हुआ, उसका अंग्रेजी सरकार पर गहरा असर पड़ा। क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी शासन को यह संदेश दे दिया था कि हथियार और सरकारी ताकत होने के बावजूद अंग्रेजों को चुनौती दी जा सकती है। सूर्य सेन ने अपने साथियों के साथ राष्ट्रीय ध्वज फहराया और एक अस्थायी क्रांतिकारी सरकार की घोषणा की।
यह घटना केवल एक हथियारों के गोदाम पर हमला नहीं थी। इसका उद्देश्य अंग्रेजी सरकार को यह दिखाना था कि भारत में ऐसे लोग मौजूद हैं, जो उसके शासन को चुनौती देने के लिए तैयार हैं। चटगांव में कुछ समय के लिए अंग्रेजी सरकार की व्यवस्था हिल गई थी।
लेकिन अंग्रेजी सरकार चुप नहीं बैठी। उसने बड़ी संख्या में सैनिकों और पुलिस को क्रांतिकारियों की तलाश में लगा दिया। सूर्य सेन और उनके साथी चटगांव से निकलकर जलालाबाद की पहाड़ियों की ओर चले गए। कुछ ही समय बाद वहां अंग्रेजी सैनिकों और क्रांतिकारियों के बीच मुठभेड़ हुई। जलालाबाद की लड़ाई में कई युवा क्रांतिकारी मारे गए। उपलब्ध सरकारी और ऐतिहासिक विवरणों में 12 क्रांतिकारियों की मौत का उल्लेख मिलता है। इसके बाद क्रांतिकारी अलग-अलग छोटे समूहों में बंट गए। अंग्रेजी पुलिस ने उन्हें पकड़ने के लिए बड़े स्तर पर तलाश शुरू कर दी।
यहीं से सूर्य सेन के जीवन का एक और कठिन दौर शुरू हुआ। वे करीब तीन साल तक अंग्रेजी पुलिस की नजर से बचते रहे। कभी किसी गांव में छिपते, कभी किसी दूसरे स्थान पर चले जाते और कभी आम आदमी की तरह जीवन बिताते। उनके कई साथी पकड़े जा चुके थे, लेकिन सूर्य सेन लगातार पुलिस से बचते रहे। इस दौरान चटगांव में क्रांतिकारी गतिविधियां पूरी तरह खत्म नहीं हुईं। प्रीतिलता वाडेदार और कल्पना दत्ता जैसी युवतियों ने भी आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रीतिलता ने पहाड़तली यूरोपियन क्लब पर हमले में हिस्सा लिया। इस क्लब के बाहर अंग्रेजों के लिए अपमानजनक शब्दों वाला बोर्ड लगा होने की बात उस समय के विवरणों में मिलती है। अंग्रेजों के खिलाफ बढ़ते गुस्से का यह भी एक कारण था।
सूर्य सेन के आंदोलन की खास बात यह थी कि इसमें केवल पुरुष ही नहीं थे। महिलाओं ने भी अपनी भूमिका निभाई। उस समय जब महिलाओं के लिए घर से बाहर निकलकर इस तरह के आंदोलन में शामिल होना आसान नहीं था, तब प्रीतिलता और कल्पना जैसी युवतियों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ अपने साहस का परिचय दिया।
लेकिन अंग्रेजी सरकार लगातार सूर्य सेन तक पहुंचने की कोशिश करती रही। आखिरकार 16 फरवरी 1933 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उनकी गिरफ्तारी एक मुखबिर की सूचना के आधार पर हुई थी। उनकी गिरफ्तारी के बाद अंग्रेजी सरकार ने उन्हें मुकदमे में पेश किया और उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। सूर्य सेन की गिरफ्तारी के बाद उनके साथ किए गए अत्याचारों की चर्चा कई प्रकाशित विवरणों और बाद की यादों में मिलती है। इन विवरणों में कहा गया है कि जेल में उन्हें बहुत बुरी तरह पीटा गया और उनके शरीर पर गंभीर चोटें पहुंचाई गईं। कुछ विवरणों में उनके दांत तोड़ने, हड्डियों और जोड़ों को चोट पहुंचाने तथा उनके नाखून तक खींचकर निकालने की बात कही गई है। बाद के कई लेखों में यह भी बताया गया कि फांसी के लिए ले जाते समय उनकी हालत बहुत खराब थी। हालांकि इन सभी भयानक विवरणों की स्वतंत्र पुष्टि समकालीन सरकारी दस्तावेजों से समान रूप से नहीं होती, इसलिए इन्हें प्रकाशित विवरणों और बाद की यादों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
14 अगस्त 1933 को अदालत ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई। बाद में उनकी अपील भी खारिज हो गई। 12 जनवरी 1934 को चटगांव जेल में सूर्य सेन को फांसी दे दी गई। उनके साथ तारकेश्वर दस्तिदार को भी फांसी दी गई। सूर्य सेन उस समय केवल 39 वर्ष के थे।
फांसी से एक दिन पहले लिखे गए उनके अंतिम पत्र का उल्लेख आज भी उनके जीवन के सबसे भावुक हिस्सों में किया जाता है। उसमें उन्होंने देश की आजादी के अपने सपने और आने वाली पीढ़ियों के लिए अपने विश्वास की बात कही थी। उनका जीवन भले ही जेल की चारदीवारी के भीतर समाप्त कर दिया गया, लेकिन उनके विचार और साहस की कहानी वहीं समाप्त नहीं हुई।
सूर्य सेन की कहानी को केवल चटगांव के एक हथियारों के गोदाम पर हुए हमले तक सीमित करके देखना सही नहीं होगा। उनके आंदोलन ने यह दिखाया कि आजादी की लड़ाई केवल बड़े शहरों या बड़े नेताओं तक सीमित नहीं थी। छोटे शहरों, कस्बों और गांवों के शिक्षक, विद्यार्थी और सामान्य परिवारों के युवा भी इसमें अपनी भूमिका निभा रहे थे।
सूर्य सेन खुद कोई बड़े सैनिक अधिकारी नहीं थे। वे एक शिक्षक थे। उनके पास बड़ी सेना नहीं थी। उनके पास आधुनिक हथियार नहीं थे। उनके साथ ऐसे युवा थे, जिनमें से कई के पास युद्ध का अनुभव भी नहीं था। फिर भी उन्होंने अंग्रेजी सरकार को ऐसी चुनौती दी, जिसे लंबे समय तक याद रखा गया।
उनकी कहानी का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि उन्होंने युवाओं को केवल भाषण सुनने वाला समूह नहीं माना। वे उन्हें देश की आजादी के लिए जिम्मेदारी लेने वाला वर्ग बनाना चाहते थे। वे शारीरिक प्रशिक्षण, अनुशासन और संगठन पर जोर देते थे। यही कारण था कि उनके आसपास विद्यार्थी और युवा बड़ी संख्या में जुड़े।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भारत की आजादी केवल एक रास्ते से नहीं मिली। महात्मा गांधी के नेतृत्व में अहिंसक आंदोलन चला। कांग्रेस ने जन आंदोलन खड़े किए। दूसरी ओर भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, सूर्य सेन और अनेक दूसरे क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ हथियारबंद संघर्ष का रास्ता अपनाया। इन सभी धाराओं ने अलग-अलग तरीके से अंग्रेजी शासन को चुनौती दी।
सूर्य सेन का रास्ता अलग था, लेकिन उनका लक्ष्य वही था—एक आजाद भारत। उनके आंदोलन में देश के लिए अपना जीवन देने का भाव सबसे ऊपर था। यही वजह है कि उनका नाम स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में आज भी सम्मान के साथ लिया जाता है। आज जब ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने पर देश भर में चर्चा हो रही है, तब सूर्य सेन की कहानी को फिर से याद करना और भी जरूरी हो जाता है। ‘वंदे मातरम्’ ने जिस दौर में देश के लोगों के भीतर देश के लिए गर्व और आजादी की भावना जगाई, उसी दौर की आगे की पीढ़ियों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ अलग-अलग रास्तों पर संघर्ष किया। सूर्य सेन इसी लंबी यात्रा की एक महत्वपूर्ण कड़ी थे।
आजादी मिलने के बाद इतिहास की किताबों में कुछ नाम बहुत बड़े अक्षरों में दर्ज हुए और कुछ नाम धीरे-धीरे पीछे छूट गए। सूर्य सेन उन नामों में हैं, जिन्हें नई पीढ़ी तक बार-बार पहुंचाने की जरूरत है। इसका कारण केवल यह नहीं है कि उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाए। असली कारण यह है कि उन्होंने अपने समय के युवाओं में देश के लिए कुछ करने का साहस पैदा किया।
सूर्य सेन की कहानी यह भी बताती है कि इतिहास केवल दिल्ली, मुंबई, कोलकाता या लखनऊ की बड़ी घटनाओं से नहीं बनता। चटगांव जैसे स्थानों पर हुई घटनाओं ने भी भारत की आजादी की पूरी कहानी को आकार दिया। आज चटगांव भले ही भारत की सीमा से बाहर बांग्लादेश में है, लेकिन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में उसकी भूमिका को भारत की कहानी से अलग नहीं किया जा सकता।
सूर्य सेन के जीवन को याद करते समय हमें उनके साहस के साथ-साथ उस दौर की कठिनाइयों को भी समझना चाहिए। अंग्रेजी सरकार के खिलाफ आवाज उठाना आसान नहीं था। गिरफ्तारी का डर था, जेल का डर था, परिवार से अलग होने का डर था और मौत का खतरा हर समय सामने था। इसके बावजूद सूर्य सेन और उनके साथी पीछे नहीं हटे।
उनकी सबसे बड़ी ताकत शायद यही थी कि उन्होंने आजादी को केवल भविष्य का सपना नहीं माना। उन्होंने उसे अपने वर्तमान जीवन का उद्देश्य बना लिया। उन्होंने अपने साथियों को यह विश्वास दिलाया कि अंग्रेजी शासन हमेशा नहीं रहेगा और एक दिन भारत स्वतंत्र होगा।
आजादी मिलने के करीब तेरह साल पहले सूर्य सेन को फांसी दे दी गई थी। वे उस दिन को देखने के लिए जीवित नहीं रहे, लेकिन जिस आजाद भारत का सपना उन्होंने देखा था, वह 1947 में सामने आया। यही किसी भी क्रांतिकारी के जीवन की सबसे बड़ी विडंबना और सबसे बड़ी सफलता दोनों है जिस आजादी के लिए उसने जीवन दिया, उसे देखने के लिए वह खुद मौजूद नहीं था।
आज जब हम स्वतंत्र भारत में खुलकर अपने विचार रखते हैं, अपने अधिकारों की बात करते हैं और देश के भविष्य पर चर्चा करते हैं, तब हमें उन लोगों को भी याद करना चाहिए, जिन्होंने इन अधिकारों की कीमत अपने जीवन से चुकाई।
मास्टरदा सूर्य सेन की कहानी केवल अतीत की कहानी नहीं है। यह हमें बताती है कि देश का इतिहास अनेक लोगों के त्याग से बनता है। कुछ लोग इतिहास की किताबों में बड़े अक्षरों में लिखे जाते हैं और कुछ लोगों का नाम धीरे-धीरे कम सुनाई देता है। लेकिन देश की आजादी की पूरी कहानी तब तक अधूरी रहेगी, जब तक इन गुमनाम या कम चर्चित नायकों को भी याद नहीं किया जाएगा।
सूर्य सेन का नाम इसलिए याद किया जाना चाहिए कि उन्होंने अपने समय की सबसे ताकतवर सरकार को चुनौती दी। इसलिए भी कि उन्होंने युवाओं को संगठित किया। और सबसे बढ़कर इसलिए कि उन्होंने अपने जीवन से यह दिखाया कि किसी बड़े लक्ष्य के लिए खड़े होने के लिए हमेशा बड़ी ताकत या बड़े साधनों की जरूरत नहीं होती। मजबूत इरादा, साथियों का भरोसा और देश के लिए कुछ करने की इच्छा भी इतिहास की दिशा बदल सकती है। बंगाल की धरती पर जन्मे मास्टरदा सूर्य सेन आज भारत की स्वतंत्रता की उस कहानी के महत्वपूर्ण पात्र हैं, जिसमें शिक्षक क्रांतिकारी बना, युवाओं ने हथियार उठाए, महिलाओं ने भी संघर्ष में हिस्सा लिया और एक छोटे से शहर ने अंग्रेजी शासन को खुली चुनौती दी।
इसलिए ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने के इस दौर में जब हम देश की आजादी के इतिहास को याद कर रहे हैं, तब मास्टरदा सूर्य सेन को याद करना केवल अतीत को याद करना नहीं है। यह उस पीढ़ी को याद करना है, जिसने आजादी को अपनी जिंदगी से बड़ा माना और उस सपने के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया। इतिहास की ऐसी कहानियां नई पीढ़ी को केवल गौरव नहीं देतीं, बल्कि यह भी समझाती हैं कि आजादी कितनी बड़ी कीमत चुकाकर मिली थी। मास्टरदा सूर्य सेन उसी कीमत की एक ऐसी कहानी हैं, जिसे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास से कभी अलग नहीं किया जा सकता।
राजेंद्र कुमार ऐतिहासिक और सामयिक विषयों पर लगातार लिखते रहते हैं।

