35 साल पुराने कथित फर्जी एनकाउंटर में 12 पुलिसकर्मियों पर FIR, कागजों में 10 घंटे का अंतर बना अहम साक्ष्य
कानपुर। महाराजपुर में 35 साल पहले हुई कथित फर्जी पुलिस मुठभेड़ के मामले में सीबीसीआईडी की ओर से प्राथमिकी दर्ज कराए जाने के बाद तत्कालीन पुलिस कार्रवाई के दस्तावेजों पर सवाल खड़े हो गए हैं। पुलिस रिकॉर्ड में मुठभेड़ का समय रात एक बजे दर्ज था, जबकि मामले में गवाह बनाए गए डीसीएम चालक उमाशंकर और क्लीनर बृजेंद्र सिंह के हस्ताक्षर अगले दिन सुबह 11 बजे कराए जाने का उल्लेख है। मुठभेड़ और गवाही के समय में करीब 10 घंटे का अंतर जांच का अहम बिंदु बना। आरोप है कि दोनों गवाहों से जबरन कागजों पर हस्ताक्षर कराए गए थे।
इस मामले में सीबीसीआईडी ने 16 अक्टूबर को तत्कालीन महाराजपुर थाने के 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई। आरोप है कि वर्ष 1991 में 12 निर्दोष लोगों को फर्जी मुठभेड़ दिखाकर आपराधिक मामलों में फंसाया गया था। हालांकि, आरोपों की पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।
गवाही के समय में अंतर से उठे सवाल
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, मुठभेड़ की घटना रात एक बजे की दिखाई गई थी, जबकि डीसीएम चालक उमाशंकर और क्लीनर बृजेंद्र सिंह से संबंधित कागजात पर अगले दिन सुबह 11 बजे हस्ताक्षर कराए गए। दोनों ने मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज कराए गए बयान में कथित तौर पर बताया था कि पुलिस ने उनसे जबरन दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराए थे।
जांच से जुड़े लोगों के मुताबिक, किसी घटना और गवाह के बयान या हस्ताक्षर के समय में अंतर की परिस्थितियों की जांच जरूरी होती है। इस मामले में करीब 10 घंटे का अंतर सामने आने के बाद तत्कालीन पुलिस कार्रवाई और दस्तावेजों की पड़ताल की गई। इसी जांच के बाद मामला प्राथमिकी दर्ज होने तक पहुंचा।
लूटपाट और मुठभेड़ का किया गया था दावा
पुलिस सूत्रों के अनुसार, 22 अगस्त 1991 की रात जीटी रोड पर कानपुर-प्रयागराज हाईवे के पास वाहनों से लूटपाट करने वाले बदमाशों के साथ मुठभेड़ होने का दावा किया गया था। इस मामले में गांधीग्राम निवासी राकेश पाठक और उनके 11 साथियों को गिरफ्तार दिखाया गया था। पुलिस ने उनके कब्जे से अवैध असलहे और विस्फोटक पदार्थ बरामद होने का दावा भी किया था।
तत्कालीन थानाध्यक्ष विद्यासागर त्रिपाठी की तहरीर पर लूट, हत्या के प्रयास तथा शस्त्र और विस्फोटक पदार्थ से संबंधित कानूनों के तहत दो प्राथमिकी दर्ज की गई थीं। इसके बाद सभी आरोपियों को जेल भेज दिया गया था। अब सीबीसीआईडी की जांच में तत्कालीन पुलिस कार्रवाई और बरामदगी के दावों की सत्यता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
पीड़ित परिवार ने भी उठाए थे सवाल

मामले के मुख्य पीड़ित राकेश पाठक के बड़े भाई देव प्रसाद पाठक ने आरोप लगाया कि मुठभेड़ को सही साबित करने के लिए पुलिस उनके घर से उनके पिता के नाम पर दर्ज लाइसेंसी डबल बैरल बंदूक और राइफल जबरन ले गई थी। परिवार की ओर से बरामदगी के दावों पर भी सवाल उठाए गए हैं। उनका कहना है कि जब घर से लाइसेंसी हथियार ले जाए गए थे, तो पुलिस ने विस्फोटक पदार्थ कहां से बरामद किए थे, इसकी भी जांच होनी चाहिए।
12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ जांच
पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने बताया कि प्राथमिकी महाराजपुर थाने में दर्ज कराई गई है, लेकिन मामले की विवेचना सीबीसीआईडी ही करेगी। उन्होंने कहा कि प्राथमिकी में इस संबंध में स्पष्ट किया गया है। पुलिस कमिश्नर के मुताबिक, 12 आरोपी पुलिसकर्मियों में से 10 सेवानिवृत्त हो चुके हैं और पेंशन प्राप्त कर रहे हैं। शेष दो पुलिसकर्मियों की स्थिति का पता लगाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि प्राथमिकी दर्ज होने के बाद आगे की कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई होगी। पेंशन पर कार्रवाई के संबंध में भी आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल होने के बाद ही प्रक्रिया आगे बढ़ने की बात कही गई है। करीब साढ़े तीन दशक पुराने इस मामले में अब तत्कालीन पुलिसकर्मियों की भूमिका, गवाहों के बयानों और बरामदगी से जुड़े दावों की जांच अहम होगी। सीबीसीआईडी की विवेचना में सामने आने वाले तथ्यों से ही मामले की आगे की दिशा तय होगी।


