बेटी की अस्मिता पर भीड़ का पहरा नहीं, कानून का राज चाहिए
बिहार के जमुई में नाबालिग छात्रा और उसके साथी के साथ हुई कथित बदसलूकी ने समाज की उस सोच पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, जिसमें कुछ लोग खुद को कानून से ऊपर समझने लगते हैं। कोचिंग से लौट रहे दोनों नाबालिगों को रास्ते में रोकना, उनके साथ मारपीट करना और छात्रा के साथ कथित अभद्रता करना किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं हो सकता। मामला सामने आने के बाद पुलिस ने कार्रवाई शुरू की और जांच के लिए विशेष टीम गठित की।
इस घटना को केवल एक आपराधिक वारदात मानकर आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे छिपी मानसिकता पर भी विचार करना होगा। आखिर किसी किशोर-किशोरी को साथ देखकर किसी दूसरे व्यक्ति को यह अधिकार किसने दे दिया कि वह उनके रिश्ते, चरित्र या व्यवहार पर फैसला सुनाए? यदि किसी को किसी गतिविधि पर आपत्ति थी या उसे अपराध का संदेह था, तो पुलिस को सूचना देना उसका अधिकार और जिम्मेदारी थी। लेकिन किसी को रोककर मारपीट करना, धमकाना या अपमानित करना कानून अपने हाथ में लेना है।
नैतिकता के नाम पर हिंसा क्यों?
समाज में नैतिकता और संस्कारों का अपना महत्व है, लेकिन नैतिकता के नाम पर हिंसा को सही नहीं ठहराया जा सकता। किसी व्यक्ति के निजी जीवन को लेकर असहमति हो सकती है, लेकिन असहमति का समाधान मारपीट या सार्वजनिक अपमान नहीं है। आज जरूरत इस बात की है कि हम बच्चों और युवाओं के प्रति अपनी सोच बदलें। किसी लड़के और लड़की को साथ देखकर तुरंत उनके चरित्र पर सवाल खड़ा करना न तो उचित है और न ही सभ्य समाज की निशानी। यदि किसी परिस्थिति में अपराध हुआ है तो उसकी जांच कानून करेगा और दोषी पाए जाने पर अदालत सजा तय करेगी। सड़क पर खड़ी भीड़ को न तो जांच का अधिकार है और न सजा सुनाने का।
नाबालिगों की पहचान और गरिमा की रक्षा जरूरी
इस मामले का एक और बेहद गंभीर पहलू घटना का वीडियो बनाकर उसे सोशल मीडिया पर प्रसारित करना है। आज मोबाइल फोन हर व्यक्ति के हाथ में है और किसी घटना का वीडियो कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच जाता है। लेकिन हर वीडियो को साझा करना जरूरी नहीं है। जब मामला नाबालिगों से जुड़ा हो तो जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। पीड़ित की तस्वीर, वीडियो या पहचान सार्वजनिक करना उसके लिए दूसरी पीड़ा पैदा कर सकता है। जिस घटना से वह पहले ही मानसिक और सामाजिक परेशानी से गुजर रहा है, उसी घटना को बार-बार सोशल मीडिया पर फैलाया जाना उसकी निजता और गरिमा को और चोट पहुंचाता है। सोशल मीडिया पर किसी संवेदनशील घटना को साझा करने से पहले यह सोचना जरूरी है कि हमारी एक पोस्ट या शेयर किसी पीड़ित बच्चे के जीवन पर कितना बड़ा असर डाल सकता है।
अपराध का वीडियो सबूत हो सकता है, तमाशा नहीं
समाज को यह अंतर समझना होगा कि किसी घटना की जानकारी पुलिस तक पहुंचाना और उसी घटना का वीडियो वायरल करना दो अलग बातें हैं। यदि किसी व्यक्ति के पास अपराध का वीडियो है तो उसे जांच एजेंसी तक पहुंचाना उपयोगी हो सकता है। लेकिन उसे मनोरंजन या सनसनी के लिए सार्वजनिक करना किसी जिम्मेदार नागरिक का व्यवहार नहीं है।
विशेषकर नाबालिगों से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता सबसे जरूरी है। पीड़ित की पहचान छिपाना केवल कानूनी आवश्यकता नहीं, बल्कि मानवीय जिम्मेदारी भी है।
गिरफ्तारी से आगे भी है न्याय की प्रक्रिया
मामले में पुलिस ने आरोपियों की गिरफ्तारी की कार्रवाई की है और जांच के लिए विशेष जांच दल गठित किया गया है। पुलिस के अनुसार मुख्य आरोपी बताए गए एक व्यक्ति को पकड़ने के दौरान उसके पैर में गोली लगी और बाद में उसे गिरफ्तार किया गया। मामले में अन्य लोगों की भूमिका की भी जांच की जा रही है। लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि गिरफ्तारी न्याय का अंतिम चरण नहीं है। गिरफ्तारी जांच का एक हिस्सा है। इसके बाद साक्ष्य जुटाए जाते हैं, आरोपों की जांच होती है और अदालत में सुनवाई होती है। दोष सिद्ध होने के बाद ही कानून के अनुसार दंड दिया जाता है। इसलिए इस मामले में भी जांच निष्पक्ष होनी चाहिए। जिस व्यक्ति की जो भूमिका है, वह साक्ष्यों के आधार पर सामने आनी चाहिए। किसी निर्दोष को केवल भीड़ की धारणा या सोशल मीडिया पर चल रही चर्चा के आधार पर आरोपी नहीं बनाया जाना चाहिए और दोषी को भी कानून की प्रक्रिया से बचने नहीं दिया जाना चाहिए।
बेटी के कपड़ों और समय पर सवाल क्यों?
ऐसी घटनाओं के बाद अक्सर समाज में बहस शुरू हो जाती है कि लड़की वहां क्यों गई थी, किसके साथ गई थी, उसने क्या पहना था या वह कितनी देर तक बाहर थी। ये सवाल अपराध की जिम्मेदारी को पीड़ित की ओर मोड़ने का माध्यम नहीं बनने चाहिए। किसी लड़की का किसी स्थान पर जाना या किसी मित्र के साथ होना किसी दूसरे व्यक्ति को उसके साथ अपराध करने का अधिकार नहीं देता। सुरक्षा का अर्थ यह नहीं कि लड़कियों के आने-जाने पर पहरा बैठा दिया जाए। सुरक्षा का अर्थ यह है कि यदि कोई अपराध करे तो उसके खिलाफ कानून प्रभावी ढंग से कार्रवाई करे।
अभिभावकों की चिंता भी समझनी होगी
इसका अर्थ यह नहीं कि बच्चों को लेकर अभिभावकों की चिंता महत्वहीन है। बच्चों को सुरक्षित रहने के तरीके बताना, अनजान लोगों से सावधान करना और खतरे की स्थिति में तुरंत मदद मांगने के लिए प्रेरित करना परिवार की जिम्मेदारी है। लेकिन अभिभावकीय चिंता और सामाजिक नियंत्रण के बीच अंतर करना भी जरूरी है। बच्चों को डराकर नहीं, समझाकर सुरक्षित बनाया जा सकता है। उन्हें यह विश्वास दिलाना होगा कि यदि उनके साथ कोई गलत घटना होती है तो वे बिना डर के माता-पिता, शिक्षक या पुलिस को इसकी जानकारी दे सकते हैं।
कानून से ऊपर कोई नहीं
- जमुई की घटना का सबसे बड़ा संदेश यही है कि कानून से ऊपर कोई नहीं हो सकता। न अपराधी, न प्रभावशाली व्यक्ति और न ही भीड़।
- यदि किसी को अपराध दिखाई देता है तो पुलिस को सूचना देना चाहिए। यदि पुलिस कार्रवाई से असंतोष है तो कानूनी रास्ते उपलब्ध हैं। लेकिन सड़क पर किसी को पकड़कर सजा देना किसी भी स्थिति में न्याय नहीं हो सकता।
- भीड़ का न्याय हमेशा खतरनाक होता है, क्योंकि भीड़ के पास न पूरी जानकारी होती है, न निष्पक्ष जांच की व्यवस्था और न ही किसी व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर।
समाज को अपनी भूमिका तय करनी होगी
समाज का काम अपराध को रोकने में मदद करना है, अपराधी बनना नहीं। किसी घटना को देखकर पुलिस को सूचना देना, पीड़ित की मदद करना, जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय सहायता दिलाना और संवेदनशील जानकारी को सार्वजनिक न करना—यही जिम्मेदार नागरिक का व्यवहार है। यदि समाज वास्तव में बेटियों की सुरक्षा चाहता है तो उसे ऐसी संस्कृति विकसित करनी होगी जिसमें लड़की के चरित्र पर सवाल उठाने से पहले अपराध करने वाले से सवाल पूछा जाए।
असली सुरक्षा कानून के भरोसे से आएगी
- किसी बेटी की सुरक्षा उसके कपड़ों, दोस्तों, समय या स्थान पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। उसकी सुरक्षा का आधार ऐसा कानून होना चाहिए जो अपराध होने पर तेजी से कार्रवाई करे और पीड़ित को न्याय का भरोसा दे।
- जमुई की घटना हमें यह सोचने के लिए मजबूर करती है कि हम किस तरह का समाज बनाना चाहते हैं। ऐसा समाज जहां हर व्यक्ति दूसरे के निजी जीवन का पहरेदार बन जाए या ऐसा समाज जहां नागरिक कानून पर भरोसा करें और पुलिस-प्रशासन अपनी जिम्मेदारी निभाए।
- बेटी की अस्मिता की रक्षा भीड़ के पहरे से नहीं हो सकती। इसके लिए मजबूत कानून, संवेदनशील पुलिस व्यवस्था, जिम्मेदार समाज और न्यायपूर्ण प्रक्रिया जरूरी है।
- किसी बेटी को सुरक्षित रखने के नाम पर उसकी आजादी पर पहरा बैठाना समाधान नहीं है। समाधान यह है कि उसे ऐसा समाज मिले जहां कोई उसकी गरिमा पर हाथ डालने से पहले कानून के डर को महसूस करे।
- यही कानून के राज की असली ताकत है और यही सभ्य समाज की पहचान भी।

