वर्दी का फर्ज निभाते हुए बुझ गया एक घर का चिराग, आखिर कब रुकेगा अपराधियों का यह दुस्साहस?

एक मां की गोद उजड़ गई, पत्नी का सुहाग छिन गया और दो बच्चों के सिर से पिता का साया उठ गया। जिस बेटे को मां ने इस उम्मीद से पाला था कि बुढ़ापे की लाठी बनेगा, वही बेटा तिरंगे में लिपटकर घर लौटा। थाना प्रभारी दिलीप कुमार पुरी की मौत सिर्फ एक पुलिस अधिकारी की शहादत नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के सामने खड़ा एक गंभीर सवाल है, जहां कर्तव्य निभाने वालों को अपनी जान की कीमत चुकानी पड़ रही है।
किसी मां के लिए इससे बड़ा दुख क्या होगा कि जिस बेटे को उसने अपनी आंखों के सामने बड़ा होते देखा, जिसकी सलामती के लिए हर दिन दुआ मांगी, एक दिन उसी बेटे का पार्थिव शरीर उसके सामने रख दिया जाए। मां की ममता उस वक्त शायद सारे शब्द भूल जाती है। वह बस अपने बेटे को पुकारती है, उसे सीने से लगाती है और बार-बार यही महसूस करना चाहती है कि शायद उसका बेटा अभी जिंदा है। मध्य प्रदेश के देवास जिले के खातेगांव में अवैध शराब से भरे ट्रक को पकड़ने के दौरान जान गंवाने वाले थाना प्रभारी दिलीप कुमार पुरी के पैतृक गांव बरमंडल में यही हृदयविदारक दृश्य देखने को मिला।
दिलीप का पार्थिव शरीर जब गांव पहुंचा तो मां खुद को संभाल नहीं सकीं। बेटे के शव से लिपटकर उनकी चीखें निकल पड़ीं। पत्नी की आंखों में उजड़ चुकी दुनिया का दर्द था तो बच्चों के सामने जिंदगी का सबसे बड़ा खालीपन। जिस पिता की उंगली पकड़कर उन्होंने चलना सीखा होगा, अब वही पिता कभी लौटकर नहीं आएगा। गांव का बाजार बंद रहा। पूरा गांव अपने बेटे के गम में डूबा था। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस परिवार के आंसू किसी व्यवस्था को झकझोर पाएंगे?
दिलीप पुरी अपनी ड्यूटी निभा रहे थे। उन्हें सूचना मिली कि अवैध शराब से भरा ट्रक जा रहा है। वह पुलिस टीम के साथ उसे रोकने पहुंचे। कानून का पालन कराने की जिम्मेदारी निभाते हुए उन्होंने वाहन चालक को रुकने का इशारा किया, लेकिन जवाब में ट्रक की रफ्तार बढ़ा दी गई। आरोप है कि चालक ने उन्हें कुचल दिया। जिस वर्दी को पहनकर उन्होंने अपराध के खिलाफ कार्रवाई करने की शपथ ली थी, उसी वर्दी में उनका जीवन समाप्त हो गया।
यह घटना केवल एक सड़क हादसा मानकर भुला देने वाली नहीं है। यह उस बढ़ते दुस्साहस का संकेत है, जहां अवैध कारोबार में शामिल लोग कानून के सामने झुकने के बजाय कानून के रखवालों को ही कुचलने से नहीं हिचकते। सवाल सिर्फ एक ट्रक चालक का नहीं, बल्कि उस पूरे तंत्र का है, जिसके सहारे अवैध शराब का कारोबार चलता है। आखिर इतनी बड़ी मात्रा में शराब लेकर वाहन सड़कों पर कैसे दौड़ रहे हैं? इनके पीछे कौन लोग हैं? इन्हें संरक्षण कौन देता है? और जब पुलिस इन्हें रोकने पहुंचती है तो उन्हें जान बचाने के लिए भी संघर्ष क्यों करना पड़ता है?
शराब तस्करी का कारोबार केवल राजस्व की चोरी या कानून का उल्लंघन भर नहीं है। इसके पीछे संगठित नेटवर्क, आर्थिक हित और कई स्तरों पर सक्रिय लोग हो सकते हैं। ऐसे नेटवर्क पर कार्रवाई केवल वाहन पकड़ने या कुछ लोगों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। शराब कहां से आई, कहां पहुंचाई जानी थी, इसके पीछे कौन लोग हैं और किसकी मिलीभगत से यह कारोबार फल-फूल रहा है, इसकी तह तक जाना जरूरी है। किसी एक चालक को गिरफ्तार कर लेने से उस व्यवस्था का अंत नहीं हो जाता, जो ऐसे अपराधों को जन्म देती है।
दिलीप पुरी की मौत ने पुलिसकर्मियों की सुरक्षा पर भी बड़ा सवाल खड़ा किया है। अपराधियों का सामना करने के लिए पुलिसकर्मियों को आधुनिक संसाधन, पर्याप्त सुरक्षा उपकरण और बेहतर रणनीति की जरूरत है। आखिर ड्यूटी पर तैनात एक पुलिस अधिकारी को किसी संदिग्ध वाहन को रोकते समय अपनी जान जोखिम में डालने की नौबत क्यों आए? क्या ऐसे अभियानों के लिए पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम हैं? क्या पुलिसकर्मियों को इस तरह की परिस्थितियों से निपटने के लिए जरूरी प्रशिक्षण और संसाधन उपलब्ध हैं? इन सवालों के जवाब तलाशना अब जरूरी है।
मुख्यमंत्री की ओर से पीड़ित परिवार को एक करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता और पत्नी को अनुकंपा नियुक्ति के तहत सब इंस्पेक्टर बनाने की घोषणा संवेदनशील कदम है। इससे परिवार को आर्थिक सहारा मिल सकता है, लेकिन क्या कोई सहायता राशि उस मां की गोद भर सकती है? क्या कोई सरकारी नौकरी बच्चों को उनके पिता का प्यार लौटा सकती है? क्या पत्नी के जीवन से वह खालीपन मिटा सकती है, जो एक झटके में हमेशा के लिए पैदा हो गया? आर्थिक मदद जरूरी है, लेकिन न्याय और सुरक्षा उससे कहीं अधिक जरूरी हैं।
दिलीप के पिता ने सीबीआई जांच की मांग उठाई है। परिवार की इस पीड़ा को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। घटना की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए, जो कानून के प्रति उनके दुस्साहस का जवाब बने। साथ ही अवैध शराब के पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करने की कार्रवाई होनी चाहिए। जांच का दायरा केवल उस ट्रक और उसके चालक तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
दिलीप पुरी अब लौटकर नहीं आएंगे। बरमंडल गांव में उनके घर का दरवाजा जरूर खुलेगा, लेकिन उस दरवाजे से वर्दी पहने उनका बेटा कभी अंदर नहीं आएगा। मां शायद हर आहट पर बेटे के लौटने का इंतजार करेंगी। पत्नी को हर मुश्किल में उनकी कमी महसूस होगी और बच्चे बड़े होते हुए अपने पिता की तस्वीर में उनका चेहरा तलाशेंगे।
किसी भी पुलिसकर्मी की सबसे बड़ी जिम्मेदारी कानून की रक्षा करना है, लेकिन उसकी जिंदगी की रक्षा करना भी सरकार और व्यवस्था का उतना ही बड़ा दायित्व है। दिलीप पुरी की शहादत को केवल श्रद्धांजलि देकर भुला देना उनके बलिदान के साथ अन्याय होगा। असली श्रद्धांजलि तब होगी, जब अवैध शराब के नेटवर्क पर निर्णायक प्रहार होगा, अपराधियों के मन से कानून का भय खत्म नहीं होने दिया जाएगा और वर्दी पहनकर ड्यूटी करने वाला हर जवान यह भरोसा महसूस करेगा कि उसके पीछे एक मजबूत व्यवस्था खड़ी है।
क्योंकि देश की रक्षा करने वाले जवानों और कानून की रक्षा करने वाले पुलिसकर्मियों को सम्मान के साथ-साथ सुरक्षित जीवन का अधिकार भी है। किसी मां की गोद दोबारा इस तरह उजड़ने नहीं दी जानी चाहिए


