दुधवा के दरवाजे खुले, अब प्रकृति और वन्यजीवों की सुरक्षा की भी हो परीक्षा

दुधवा के दरवाजे खुले, अब प्रकृति और वन्यजीवों की सुरक्षा की भी हो परीक्षा

पर्यटन के साथ संरक्षण का संतुलन जरूरी, जंगल की खूबसूरती को सोशल मीडिया की रील नहीं, संवेदनशील नजरों से देखने की जरूरत

तराई की धरती पर फैला दुधवा का जंगल केवल पेड़-पौधों, बाघों और गैंडों का आशियाना नहीं है, बल्कि प्रकृति की अनमोल विरासत है। यहां की जैव विविधता, विशाल घास के मैदान, दलदली क्षेत्र और दुर्लभ वन्यजीव उत्तर प्रदेश को प्राकृतिक संपदा के मामले में विशिष्ट पहचान देते हैं। एक नवंबर से दुधवा नेशनल पार्क के नए पर्यटन सत्र की शुरुआत इस विरासत को करीब से जानने और समझने का अवसर लेकर आई है। मानसून के बाद जंगल के दरवाजे खुलना पर्यटन के लिहाज से निश्चित रूप से उत्साहजनक है, लेकिन इसके साथ कुछ सवाल भी खड़े होते हैं। क्या हम जंगल को केवल घूमने-फिरने की जगह मानते हैं या उसकी संवेदनशीलता और संरक्षण की जिम्मेदारी भी समझते हैं?

दुधवा का नाम आते ही आंखों के सामने बाघ की अठखेलियां, खुले मैदानों में विचरण करते बारहसिंगा और अपने प्राकृतिक आवास में घूमते गैंडे की तस्वीर उभरती है। यहां 53 गैंडों की मौजूदगी वन्यजीव संरक्षण के प्रयासों की अहम उपलब्धि है। यह उपलब्धि बताती है कि यदि इच्छाशक्ति, संसाधन और निरंतर प्रयास हों तो विलुप्ति के खतरे से जूझ रहे वन्यजीवों को भी सुरक्षित भविष्य दिया जा सकता है। लेकिन वन्यजीव संरक्षण किसी एक मौसम या अभियान तक सीमित नहीं रह सकता। इसके लिए सालभर निगरानी, जंगल के प्राकृतिक आवास की सुरक्षा और अवैध गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण जरूरी है।

इस बार वन विभाग ने सफारी के दौरान मोबाइल फोन ले जाने और जंगल के भीतर वीडियो या रील बनाने पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया है। पहली नजर में यह फैसला कुछ पर्यटकों को असुविधाजनक लग सकता है। आज के दौर में लोग पर्यटन स्थल पर पहुंचते ही कैमरे और मोबाइल के जरिए हर पल को रिकॉर्ड करना चाहते हैं। सोशल मीडिया पर तस्वीरें और वीडियो साझा करना पर्यटन का हिस्सा बन चुका है। लेकिन जंगल कोई फिल्मी सेट नहीं है, जहां वन्यजीव पर्यटकों की इच्छानुसार अपनी मौजूदगी दर्ज कराएं। जंगल उनका घर है और इंसान वहां केवल मेहमान है। मोबाइल की घंटियां, लगातार वीडियो रिकॉर्डिंग और वन्यजीवों के करीब पहुंचने की कोशिश उनके स्वाभाविक व्यवहार को प्रभावित कर सकती है। इसलिए इस प्रतिबंध को पर्यटकों की स्वतंत्रता पर रोक के बजाय वन्यजीवों के प्रति हमारी जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए।

दुधवा के सामने एक दूसरी बड़ी चुनौती पर्यटन और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखने की है। हर साल हजारों पर्यटक यहां पहुंचते हैं। इससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है, होटल, परिवहन, सफारी और गाइड से जुड़े कारोबार को गति मिलती है। थारू समुदाय सहित आसपास के ग्रामीण परिवारों की आजीविका भी पर्यटन से जुड़ी है। ऐसे में पर्यटन का विस्तार जरूरी है, लेकिन यह विस्तार जंगल की क्षमता और पर्यावरणीय संतुलन को नुकसान पहुंचाकर नहीं होना चाहिए। सफारी वाहनों की संख्या, उनकी आवाजाही, पर्यटकों के व्यवहार और जंगल के भीतर मानवीय गतिविधियों पर नियंत्रण आवश्यक है।

इस बार बारिश और जलभराव ने भी वन विभाग के सामने चुनौती खड़ी की है। मुख्य प्रभाग के रास्तों में पानी और क्षति के कारण सफारी को लेकर सावधानी बरतना जरूरी है। ऐसे में पर्यटकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए वैकल्पिक व्यवस्था करना उचित कदम है। पर्यटन शुरू करने की जल्दबाजी में किसी की जान जोखिम में डालना समझदारी नहीं होगी। जंगल के रास्तों को दुरुस्त करने के साथ प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था को भी बेहतर बनाने की जरूरत है, ताकि हर वर्ष मानसून के बाद ऐसी समस्याओं का प्रभाव कम किया जा सके।

दुधवा की असली पहचान केवल बाघों की संख्या या पर्यटकों की भीड़ से नहीं बनती। उसकी पहचान इस बात से बनेगी कि आने वाली पीढ़ियों के लिए यहां का जंगल कितना सुरक्षित बचा है। वन विभाग को वन्यजीवों की सुरक्षा के साथ शिकारियों पर निगरानी, जंगलों में आग की रोकथाम, अवैध कटान पर नियंत्रण और आसपास के गांवों में जागरूकता अभियान को भी प्राथमिकता देनी होगी। स्थानीय ग्रामीणों को संरक्षण की प्रक्रिया से जोड़ना भी उतना ही जरूरी है। जब जंगल के आसपास रहने वाला व्यक्ति वन्यजीवों को अपनी प्राकृतिक विरासत और आजीविका का आधार समझेगा, तभी संरक्षण का प्रयास स्थायी हो सकेगा।

सरकार और वन विभाग को दुधवा के पर्यटन ढांचे को आधुनिक बनाने के साथ पर्यावरण के अनुकूल सुविधाओं पर भी ध्यान देना चाहिए। प्रशिक्षित गाइड, सुरक्षित सफारी वाहन, बेहतर ठहरने की व्यवस्था और पर्यटकों को वन्यजीवों के प्रति संवेदनशील बनाने वाले कार्यक्रम पर्यटन अनुभव को बेहतर बना सकते हैं। पर्यटकों को भी यह समझना होगा कि जंगल में शोर मचाना, वन्यजीवों को परेशान करना या नियमों का उल्लंघन करना रोमांच नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति असम्मान है।

दुधवा के दरवाजे खुलना केवल पर्यटन सत्र की शुरुआत नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ हमारे रिश्ते को फिर से समझने का अवसर है। 53 गैंडों, बाघों और बारहसिंगों को देखने की उत्सुकता स्वाभाविक है, लेकिन उससे भी बड़ी जिम्मेदारी उनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखने की है। पर्यटन से राजस्व और रोजगार मिलना चाहिए, मगर जंगल की कीमत पर नहीं। याद रखना होगा कि दुधवा की असली सफलता इस बात में नहीं है कि कितने पर्यटक यहां आए, कितनी सफारी चलीं या कितनी तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा हुईं। उसकी असली सफलता तब होगी, जब पर्यटकों की वापसी के बाद भी जंगल उतना ही शांत, सुरक्षित और समृद्ध बना रहे। प्रकृति को देखने का आनंद तभी सार्थक है, जब हम उसे बचाने की जिम्मेदारी भी निभाएं।

Pankaj

worldkhabarexpress.com

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