महावीर सिंह : कालापानी की कोठरी में बुझी वह लौ, जिसने अंग्रेजी हुकूमत को दी थी चुनौती
राजेंद्र कुमार विशेष संवाददाता।
वर्ल्ड खबर एक्सप्रेस- भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास केवल उन क्रांतिकारियों के नामों तक सीमित नहीं है, जिन्हें देश आज बड़े सम्मान से याद करता है। इसके पन्नों में ऐसे अनेक युवा भी हैं, जिन्होंने अपना जीवन और प्राण देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर दिए, लेकिन समय के साथ उनकी स्मृति अपेक्षाकृत पीछे छूट गई। महावीर सिंह ऐसे ही क्रांतिकारी थे, जिनकी शहादत कालापानी की सेल्युलर जेल में हुई। उन्होंने अंग्रेजी शासन की जेल व्यवस्था के सामने झुकने के बजाय अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
महावीर सिंह का जन्म 16 सितंबर 1904 को शाहपुर टहला में हुआ था, जो उस समय एटा जिले का हिस्सा था। बचपन और युवावस्था ऐसे समय में बीती, जब देश में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध असंतोष लगातार बढ़ रहा था। शिक्षा के लिए वे कानपुर आए और वर्ष 1925 में डीएवी कॉलेज, कानपुर में अध्ययन किया। उस समय कानपुर केवल औद्योगिक शहर नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय आंदोलन और क्रांतिकारी गतिविधियों का भी महत्वपूर्ण केंद्र था।
डीएवी कॉलेज में पढ़ाई के दौरान उनका संपर्क ऐसे युवाओं से हुआ, जो देश की स्वतंत्रता को केवल राजनीतिक लक्ष्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सम्मान और आत्मसम्मान का प्रश्न मानते थे। इसी दौर में उनका परिचय शिव वर्मा और जयदेव कपूर जैसे क्रांतिकारियों से हुआ और आगे चलकर भगत सिंह तथा उनके साथियों से भी उनके संबंध बने। वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन और बाद में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े। क्रांतिकारी गतिविधियों में उनका नाम ‘प्रताप’ के रूप में भी सामने आता है।
महावीर सिंह के लिए आजादी का अर्थ केवल अंग्रेजी शासन को हटाना नहीं था। वे ऐसा भारत चाहते थे, जिसमें मनुष्य को सम्मान मिले और देश अपने निर्णय स्वयं ले सके। यही विचार उन्हें उस रास्ते पर ले गया, जहां गिरफ्तारी और मौत का भय भी उनके संकल्प को कमजोर नहीं कर सका। लाहौर षड्यंत्र मामले में उन्हें गिरफ्तार किया गया। इस मामले में भगत सिंह और उनके अनेक साथी भी अभियुक्त बनाए गए थे। अंग्रेजी सरकार के मुकदमों का उद्देश्य क्रांतिकारी गतिविधियों को दबाना था, लेकिन अदालतों और जेलों में भी इन युवाओं का विरोध जारी रहा। महावीर सिंह को आजीवन कारावास की सजा दी गई। इसके बाद उन्हें अलग-अलग जेलों में रखा गया और अंततः जनवरी 1933 में अंडमान की सेल्युलर जेल भेज दिया गया।
सेल्युलर जेल उस समय अंग्रेजी शासन की कठोर जेल व्यवस्था का प्रतीक थी। वहां बंदियों को कठिन श्रम करना पड़ता था। भोजन की गुणवत्ता, साफ-सफाई, कपड़ों, चिकित्सा और अन्य सुविधाओं की स्थिति भी संतोषजनक नहीं थी।
राजनीतिक बंदियों को सामान्य अपराधियों की तरह रखने की कोशिश की जाती थी, जिसका क्रांतिकारी लगातार विरोध करते थे।
उनकी मांग थी कि उन्हें सामान्य अपराधियों की तरह न रखा जाए और राजनीतिक बंदियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार हो। हथकड़ी-बेड़ियों जैसे दंड का भी वे विरोध करते थे। वे बेहतर भोजन, साफ-सफाई, पढ़ने-लिखने की सुविधा, चिकित्सा सुविधा और मानवीय व्यवहार चाहते थे। वे यह भी चाहते थे कि राजनीतिक बंदियों को मुख्य भूमि की जेलों में वापस भेजा जाए, ताकि वे देश और अपने परिवारों से पूरी तरह अलग-थलग न रहें।
इन्हीं मांगों को लेकर राजनीतिक बंदियों ने भूख हड़ताल का रास्ता अपनाया। यह केवल भोजन की शिकायत नहीं थी, बल्कि जेल में राजनीतिक बंदियों की गरिमा और अधिकारों की मांग का गंभीर विरोध था। 12 मई 1933 को सेल्युलर जेल में राजनीतिक बंदियों ने भूख हड़ताल शुरू की। अंग्रेजी जेल प्रशासन ने इसे दबाने के लिए जबरन भोजन कराने का रास्ता अपनाया।
जबरन भोजन कराने के दौरान बंदी के नाक के रास्ते एक नली डालकर तरल पदार्थ पेट तक पहुंचाने की कोशिश की जाती थी। यह प्रक्रिया अत्यंत कष्टदायक थी। 17 मई 1933 को महावीर सिंह को भी जबरन दूध पिलाने का प्रयास किया गया। बताया जाता है कि नली पेट की जगह फेफड़ों की ओर चली गई और दूध फेफड़ों में पहुंच गया। इसके बाद उनकी हालत बिगड़ गई और उसी दिन उनका निधन हो गया। सरकारी विवरणों में उनकी मृत्यु का कारण ‘शॉक’ दर्ज किया गया।
महावीर सिंह की शहादत से जुड़ा एक मार्मिक प्रसंग डॉ. गया प्रसाद कटियार के परिवार की स्मृतियों में आज भी सुरक्षित है। डॉ. गया प्रसाद कटियार भी लाहौर षड्यंत्र मामले में आजीवन कारावास की सजा पाकर अंडमान भेजे गए थे। वे चिकित्सक थे और सेल्युलर जेल में बंद राजनीतिक कैदियों के बीच भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी।
डॉ. कटियार के पुत्र क्रांति कुमार कटियार ने बताया कि सेल्युलर जेल में उनके पिता की कोठरी संख्या 67 थी और उसके ठीक बगल में महावीर सिंह की कोठरी संख्या 68 थी। जब महावीर सिंह की हालत गंभीर हुई तो डॉ. कटियार ने जेल अधिकारियों से उन्हें देखने और इलाज करने की अनुमति मांगी, लेकिन अनुमति नहीं दी गई।
जब महावीर सिंह को स्ट्रेचर पर ले जाया जा रहा था, तब उन्होंने डॉ. गया प्रसाद कटियार की ओर हाथ जोड़कर अंतिम अभिवादन किया और उन्हें संबोधित किया। यह प्रसंग किसी सरकारी दस्तावेज की तरह नहीं, बल्कि परिवार की स्मृति के रूप में सामने आता है। लेकिन यह स्मृति उस समय के दो क्रांतिकारियों के बीच के संबंध और उस वातावरण की गंभीरता को समझने में मदद करती है।
महावीर सिंह की मृत्यु के बाद उनके पार्थिव शरीर के साथ भी सामान्य मानवीय व्यवहार नहीं किया गया। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों में उल्लेख मिलता है कि अंग्रेजों ने उनके शव को पत्थरों से बांधकर समुद्र में फेंक दिया था। भारत सरकार के एक प्रकाशन में भी इसे ‘कहा जाता है’ के रूप में दर्ज किया गया है। अन्य ऐतिहासिक विवरणों में भी शव को पत्थरों से भारी किए गए बोरे में डालकर समुद्र में फेंकने का उल्लेख मिलता है।
ऐसा कहा जाता है कि इसका उद्देश्य यह था कि शव समुद्र के किनारे वापस न आ सके और उसके आसपास सार्वजनिक रूप से अंतिम संस्कार या श्रद्धांजलि का अवसर न बने। जिस युवक ने देश के लिए अपना जीवन दिया, उसे मृत्यु के बाद भी अपने परिवार और साथियों के बीच अंतिम विदाई नहीं मिल सकी।
महावीर सिंह अकेले ऐसे शहीद नहीं थे, जिन्होंने सेल्युलर जेल की भूख हड़ताल में अपने प्राण गंवाए। मोहित मोइत्रा और मोहन किशोर नामदास ने भी इसी संघर्ष में अपने प्राण दिए। यह भूख हड़ताल 46 दिनों तक चली। इन शहादतों ने यह स्पष्ट कर दिया कि अंग्रेजी जेल की दीवारें क्रांतिकारियों के शरीर को कैद कर सकती थीं, लेकिन उनके विचारों और आत्मसम्मान को नहीं।
इतिहास की विडंबना देखिए कि जिस समुद्र में एक क्रांतिकारी का शव गुम कर देने की कोशिश की गई, उसी अंडमान की धरती पर आज उनकी स्मृति सम्मान के साथ जीवित है। 30 दिसंबर 1997 को राष्ट्रपति के. आर. नारायणन ने सेल्युलर जेल परिसर में छह क्रांतिकारी शहीदों की आदमकद प्रतिमाओं का अनावरण किया था। इनमें महावीर सिंह के साथ मोहन किशोर नामदास और मोहित मोइत्रा की प्रतिमाएं भी शामिल थीं।
महावीर सिंह की कहानी को केवल भगत सिंह के एक साथी की कहानी के रूप में देखना उनके व्यक्तित्व को सीमित करना होगा। वे स्वयं एक प्रतिबद्ध क्रांतिकारी थे। कानपुर में शिक्षा के दौरान जिस राष्ट्रीय चेतना ने उन्हें प्रभावित किया, उसने आगे चलकर उन्हें उस संघर्ष तक पहुंचाया, जहां जीवन और मृत्यु के बीच उन्होंने अपने विचारों को प्राथमिकता दी।
उनकी भूख हड़ताल को केवल जेल में भोजन की खराब व्यवस्था के विरोध के रूप में देखना भी उचित नहीं होगा। इसके पीछे राजनीतिक बंदियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार, मानवीय परिस्थितियां, पढ़ने-लिखने की सुविधा, चिकित्सा, कठोर दंड और हथकड़ी-बेड़ियों जैसी व्यवस्थाओं का विरोध तथा राजनीतिक बंदियों की गरिमा का प्रश्न जुड़ा हुआ था।
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की यही विशेषता थी कि इसमें अनेक धाराएं और अनेक प्रकार के संघर्ष एक साथ चल रहे थे। कोई सत्याग्रह और अहिंसक आंदोलन के माध्यम से संघर्ष कर रहा था, तो कोई क्रांतिकारी रास्ते पर आगे बढ़ रहा था। इन सभी प्रयासों का लक्ष्य अंग्रेजी शासन से स्वतंत्रता प्राप्त करना था। महावीर सिंह उसी क्रांतिकारी धारा के ऐसे युवा थे, जिन्होंने अपने हिस्से का संघर्ष पूरी निष्ठा से किया।
कानपुर के संदर्भ में महावीर सिंह की स्मृति और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। जिस शहर में उन्होंने शिक्षा पाई, वहीं उनके भीतर राष्ट्रीय चेतना ने आकार लिया। डीएवी कॉलेज का उनका छात्र जीवन उनके व्यक्तित्व के निर्माण का महत्वपूर्ण चरण था। आज जब हम स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं, तब उन युवाओं को याद करना आवश्यक है जिन्होंने स्वतंत्रता को केवल एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य माना था। 17 मई 1933 को महावीर सिंह का जीवन समाप्त हुआ, लेकिन उनका संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। समुद्र ने उनका शरीर अपने भीतर समा लिया, पर उनकी स्मृति को इतिहास मिटा नहीं सका। सेल्युलर जेल में उनकी प्रतिमा आज भी आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाती है कि स्वतंत्रता की कीमत केवल युद्धभूमि में नहीं, बल्कि जेल की अंधेरी कोठरियों में भी चुकाई गई थी।
महावीर सिंह की शहादत हमें यह समझने का अवसर देती है कि स्वतंत्रता केवल सत्ता परिवर्तन का नाम नहीं है। उसके भीतर मनुष्य की गरिमा, सम्मान, अधिकार और आत्मसम्मान भी शामिल हैं। महावीर सिंह ने अपने अंतिम समय में इन्हीं मूल्यों के लिए संघर्ष किया। इसलिए वे केवल भगत सिंह के साथी नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व और विचार वाले क्रांतिकारी शहीद हैं।
इतिहास में कुछ दीपक बहुत कम समय तक जलते हैं, लेकिन उनका प्रकाश बहुत दूर तक जाता है। महावीर सिंह का जीवन भी ऐसा ही दीपक था। कालापानी की कोठरी में उनका शरीर भले ही टूट गया, लेकिन उनके साहस और आत्मसम्मान की लौ आज भी बुझी नहीं है। (राजेंद्र कुमार ऐतिहासिक और सामायिक विषयों पर लगातार लिखते रहते हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं।)

