गड्ढों में तब्दील हाईवे, सवालों में व्यवस्था

गड्ढों में तब्दील हाईवे, सवालों में व्यवस्था

कानपुर-सागर हाईवे पर 70 किलोमीटर में करीब तीन हजार गड्ढे

—यह आंकड़ा केवल सड़क की बदहाली नहीं बताता, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है, जिसके जिम्मे लोगों को सुरक्षित और सुगम आवागमन उपलब्ध कराना है।

कानपुर। सड़क किसी भी क्षेत्र के विकास की सबसे बुनियादी जरूरत होती है। अच्छी सड़क का मतलब केवल बेहतर सफर नहीं होता, बल्कि इससे व्यापार, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति मिलती है। लेकिन जब यही सड़क गड्ढों में बदल जाए तो विकास की रफ्तार भी प्रभावित होती है और आम आदमी की जिंदगी भी जोखिम में पड़ जाती है।

कानपुर-सागर हाईवे की मौजूदा तस्वीर चिंताजनक है। करीब 70 किलोमीटर के मार्ग पर जगह-जगह गहरे गड्ढे हैं। कहीं सड़क की ऊपरी परत उखड़ चुकी है तो कहीं बड़े-बड़े गड्ढों ने वाहन चालकों के सामने अचानक खतरा पैदा कर दिया है। सामान्य परिस्थितियों में डेढ़ घंटे के आसपास पूरा होने वाला सफर ढाई घंटे तक पहुंच रहा है। इसका सीधा असर उन लोगों पर पड़ रहा है जिन्हें रोज इस मार्ग से काम, नौकरी, कारोबार या अन्य जरूरी कार्यों के लिए आना-जाना पड़ता है।

बारिश बनी बहाना नहीं, चेतावनी है

अक्सर सड़कों की खराब हालत के लिए बारिश को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है। यह सही है कि लगातार बारिश से सड़कें क्षतिग्रस्त होती हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या बारिश अचानक आई थी? क्या हर साल बारिश का मौसम नहीं आता? अगर सड़क निर्माण और रखरखाव की व्यवस्था वैज्ञानिक तरीके से की जाए तो बारिश के बाद सड़क कुछ दिनों में ही इस कदर जर्जर नहीं होनी चाहिए।

बारिश सड़क की कमजोरी को उजागर जरूर करती है, लेकिन सड़क की कमजोरी पैदा नहीं करती। यदि सड़क की गुणवत्ता बेहतर हो, जल निकासी की व्यवस्था ठीक हो और समय रहते मरम्मत होती रहे तो स्थिति इतनी भयावह नहीं हो सकती।

ब्लैक स्पॉट पहले से चिन्हित, फिर भी खतरा क्यों?

  • सबसे गंभीर प्रश्न उन 26 ब्लैक स्पॉट को लेकर है जिन्हें हाईवे पर पहले ही चिन्हित किया जा चुका है। जब विभाग को पता है कि ये स्थान हादसों के लिहाज से संवेदनशील हैं, तो वहां सड़क की स्थिति को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
  • ब्लैक स्पॉट का मतलब ही है कि वहां सावधानी और निगरानी की अतिरिक्त जरूरत है। लेकिन यदि ऐसे स्थानों पर ही गड्ढे बढ़ते जाएं तो यह व्यवस्था की विफलता को दर्शाता है। सड़क हादसा होने के बाद जांच, मुआवजा और कार्रवाई अपनी जगह है, लेकिन उससे कहीं बेहतर है कि हादसा होने ही न दिया जाए।
  • एक गड्ढा किसी के लिए सड़क की खराबी हो सकता है, लेकिन किसी परिवार के लिए वही गड्ढा जिंदगी भर का दुख बन सकता है।

सबसे ज्यादा खतरे में दोपहिया वाहन चालक

  1. हाईवे पर बड़े वाहन किसी तरह गड्ढों से निकल भी जाते हैं, लेकिन दोपहिया वाहन चालकों के लिए स्थिति बेहद खतरनाक है। अचानक सामने आए गड्ढे से बचने के प्रयास में बाइक का संतुलन बिगड़ सकता है। पीछे से आ रहा वाहन दुर्घटना का कारण बन सकता है।
  2. दिन में गड्ढे किसी तरह दिखाई भी दे जाएं, लेकिन रात के समय यह खतरा कई गुना बढ़ जाता है। पानी से भरे गड्ढे की गहराई का अंदाजा लगाना मुश्किल होता है। ऐसे में सड़क की खराब स्थिति केवल यातायात को धीमा नहीं करती, बल्कि दुर्घटनाओं की आशंका भी बढ़ाती है।

जनप्रतिनिधि की नाराजगी के बाद ही क्यों जागता है विभाग?

  • हाईवे की बदहाली को लेकर विधायक की ओर से अधिकारियों से नाराजगी जताई गई है। यह अच्छी बात है कि जनप्रतिनिधि ने समस्या को गंभीरता से उठाया, लेकिन इससे एक बड़ा सवाल भी पैदा होता है—क्या किसी जनप्रतिनिधि के फोन या नाराजगी के बाद ही विभाग को सड़क की स्थिति दिखाई देती है?
  • एनएचएआई की पेट्रोलिंग टीम सड़क की निगरानी करती है। अधिकारियों के मुताबिक गड्ढों का चिन्हांकन भी कराया गया है। यदि ऐसा है तो फिर इतने बड़े पैमाने पर गड्ढे बढ़ने तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
  • व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि अधिकारी जनता की शिकायत का इंतजार न करें। सड़क की स्थिति खराब होने से पहले ही मरम्मत शुरू हो जाए। प्रशासन की सक्रियता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि शिकायत कितनी बड़ी हुई, बल्कि यह होना चाहिए कि समस्या को पैदा होने से पहले कितना रोका गया।

एक सप्ताह का दावा, अब परीक्षा का समय

  1. एनएचएआई के परियोजना निदेशक ने एक सप्ताह में हाईवे को गड्ढामुक्त कराने का दावा किया है। अब इस दावे की असली परीक्षा जमीन पर होगी। लोगों को बयान नहीं, सुरक्षित सड़क चाहिए।
  2. गड्ढों में अस्थायी रूप से सामग्री भर देना पर्याप्त नहीं होगा। यदि कुछ दिनों या अगली बारिश में वही गड्ढे दोबारा सामने आ जाते हैं तो ऐसी मरम्मत का कोई अर्थ नहीं रह जाता। जरूरत है स्थायी और गुणवत्तापूर्ण मरम्मत की।
  3. साथ ही यह भी तय होना चाहिए कि सड़क की गुणवत्ता खराब होने पर जिम्मेदारी किसकी होगी। निर्माण करने वाली एजेंसी, रखरखाव करने वाली संस्था और निगरानी करने वाले अधिकारियों—सभी की भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए।
  4. सड़क केवल डामर की परत नहीं, लोगों की जिंदगी की राह है
  5. कानपुर-सागर हाईवे पर चलने वाले लोगों से पूछा जाए तो उनके लिए यह केवल एक सड़क नहीं है। किसी के लिए यह नौकरी तक पहुंचने का रास्ता है, किसी के लिए कारोबार का, किसी के लिए अस्पताल पहुंचने का और किसी के लिए परिवार के पास लौटने का।
  6. इसलिए सड़क की खराब हालत को केवल यातायात की समस्या मानना भूल होगी। यह सीधे-सीधे जनसुरक्षा का सवाल है।
  7. सरकारें जब विकास की उपलब्धियां गिनाती हैं तो सड़कों की लंबाई, नए हाईवे और एक्सप्रेसवे का उल्लेख करती हैं। लेकिन विकास का असली पैमाना यह भी होना चाहिए कि बनी हुई सड़क कितने वर्षों तक सुरक्षित और उपयोगी रहती है।
  8. हाईवे बनाना उपलब्धि है, लेकिन उसे सुरक्षित बनाए रखना उससे बड़ी जिम्मेदारी है।
  9. कानपुर-सागर हाईवे के गड्ढे अब केवल सड़क पर नहीं हैं। उन्होंने व्यवस्था, निगरानी और जवाबदेही के बीच भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। इन सवालों का जवाब कागजों पर नहीं, सड़क पर दिखाई देना चाहिए।
  10. एक सप्ताह में गड्ढे भरने का दावा किया गया है। अब जनता को इंतजार रहेगा कि अगले सात दिन बाद इस हाईवे की तस्वीर बदलती है या फिर एक और सरकारी दावा गड्ढों के बीच दबकर रह जाता है।
  11. क्योंकि जनता को आश्वासन नहीं चाहिए—उसे ऐसी सड़क चाहिए जिस पर वह अपने घर से निकले तो सुरक्षित अपने गंतव्य तक पहुंच सके।

Pankaj

worldkhabarexpress.com

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