नई नवेली:घर में खुशियां लाने वाली बहू को समझा डायन, रामायण काल के रावण से क्या है उसका कनेक्शन?
मुंबई। घर में कदम रखते ही खुशियां बिखेरने वाली बहू अगर अचानक डायन करार दे दी जाए, तो समझिए मामला सिर्फ सास-बहू की नोकझोंक का नहीं है! यामी गौतम धर की ‘नई नवेली’ में रिश्तों की खटपट है, शक के मजेदार किस्से हैं, डराने की कोशिश है और फिर खुलता है रामायण काल से जुड़ा एक ऐसा रहस्य, जो कहानी को सीधे रावण तक ले जाता है। आइडिया में दम है, लेकिन क्या फिल्म आखिरी तक अपना जादू कायम रख पाती है? इस फिल्म की लेंथ 2 घंटा 18 मिनट है। दैनिक भास्कर ने इस फिल्म को 5 में से 3 स्टार रेटिंग दी है।
कहानी: जब बहू की अच्छाई ही बन गई शक की वजह

मेरठ के एक ऐसे परिवार में मोहिनी (यामी गौतम धर) की एंट्री होती है, जहां रिश्तों में उलझनें हैं और घर का माहौल कुछ खास खुशगवार नहीं। मोहिनी अपनी समझदारी और अपनापन से सबका दिल जीतने लगती है। लेकिन देवर बंटू (अनुराग ठाकुर) को उसकी अच्छाई कुछ ज्यादा ही रहस्यमयी लगती है। उसे शक है कि भाभी के सीधे-सादे चेहरे के पीछे कोई खतरनाक राज छिपा है- कहीं वह डायन तो नहीं!
इधर, पति राजा (आदिनाथ एम. कोठारे) से जुड़ी परतें खुलती हैं और मामला घर की चारदीवारी से निकलकर पौराणिक रहस्यों तक पहुंच जाता है। रावण, मंदोदरी और भगवान राम के संदर्भों के साथ फिल्म त्रेता युग की कथा को आज के दौर से जोड़ने की कोशिश करती है। कहानी में काल शील पत्थर, राजा की जन्म नक्षत्र से जुड़ी मान्यताएं और रावण की वापसी चाहने वाली अंधेरी शक्तियां भी हैं। यानी शुरुआत घर की बहू पर शक से होती है, लेकिन आगे सवाल उठता है- इस परिवार का रामायण काल से आखिर रिश्ता क्या है?
एक्टिंग: यामी का रहस्य, अनुराग की कॉमेडी
यामी गौतम धर मोहिनी के किरदार में संयम और रहस्य का अच्छा मेल रखती हैं। उनके चेहरे की खामोशी भी कई बार सवाल खड़े करती है। वह किरदार को गंभीरता से निभाती हैं, लेकिन स्क्रिप्ट उन्हें वह पूरा मौका नहीं देती, जिससे उनका अभिनय और निखर सकता था। अनुराग ठाकुर फिल्म के कॉमेडी इंजन हैं। बंटू का शक, उसकी हरकतें और भाभी को लेकर उसकी थ्योरी कई जगह हंसाती हैं। लक्ष्मण रेखा वाला सीक्वेंस खास तौर पर मजेदार बन पड़ता है। आदिनाथ एम. कोठारे भावनात्मक दृश्यों में ठीक हैं, लेकिन कुछ जगह गुस्से और चीखने का अंदाज दोहराव वाला लगने लगता है। सुनीता राजवर, मीता वशिष्ठ, सुष्मिता मुखर्जी, सोनल झा, आदित्य कुलश्रेष्ठ और प्रतीक पचौरी समेत सहायक कलाकार परिवार की दुनिया को विश्वसनीय बनाने में मदद करते हैं।
डायरेक्शन और टेक्निकल पक्ष: शुरुआत में चटपटा तड़का, आगे पौराणिक उलझनें
निर्देशक बालाजी मोहन की फिल्म का पहला हिस्सा अच्छी रफ्तार पकड़ता है। पारिवारिक खींचतान, बंटू का शक और मोहिनी के रहस्यमयी व्यवहार के बीच कॉमेडी और सस्पेंस का बढ़िया मेल बनता है। फिल्म महिलाओं के आत्मविश्वास और घर में उनके सम्मान की बात भी कहानी के भीतर पिरोती है- यह इसका एक अच्छा पहलू है। दिक्कत तब शुरू होती है, जब दूसरा हाफ पौराणिक संदर्भों और अलौकिक शक्तियों की दुनिया में ज्यादा उलझने लगता है। रावण और रामायण से जुड़े विचार दिलचस्प हैं, लेकिन उन्हें मौजूदा कहानी में पिरोने के चक्कर में पटकथा अपनी पकड़ ढीली कर देती है। हॉरर-कॉमेडी का संतुलन बिगड़ता है और जहां डर महसूस होना चाहिए, वहां कई बार सिर्फ दृश्य का शोर सुनाई देता है। राजा का राक्षसी रूप, लाल आंखें, नुकीले दांत और हरी नसें डर पैदा करने के लिए हैं, लेकिन कुछ दृश्यों में उनका असर जरूरत से ज्यादा नाटकीय हो जाता है। फिल्म का कॉन्सेप्ट जितना अनोखा है, उतनी ही कसावट इसके स्क्रीनप्ले में होती तो मजा दोगुना हो सकता था।
म्यूजिक: ‘फटा पटाखा’ में है बात
जीवी प्रकाश कुमार ने इस फिल्म से हिंदी सिनेमा में बतौर संगीतकार शुरुआत की है। उनका संगीत फिल्म की रंगीन, अतरंगी दुनिया के साथ मेल खाता है। ‘फटा पटाखा’ सबसे ज्यादा ध्यान खींचता है, जबकि बाकी गाने कहानी से बाहर निकलने के बाद बहुत देर तक याद नहीं रहते। बैकग्राउंड स्कोर रहस्य का माहौल बनाने में मदद करता है, हालांकि सिर्फ संगीत के दम पर कमजोर पड़ते दृश्यों में जान नहीं आ पाती।
फाइनल वर्डिक्ट: बहू का रहस्य दिलचस्प, लेकिन जादू अधूरा
‘नई नवेली’ का आइडिया हटकर है और यामी-अनुराग की जोड़ी कई मजेदार पल देती है। लेकिन दूसरे हाफ में पौराणिक उलझनें और ढीली पटकथा कहानी की रफ्तार रोक देती हैं। अनोखे कॉन्सेप्ट और कुछ चटपटे दृश्यों के लिए फिल्म देखी जा सकती है, बस रामायण से जुड़े इस रहस्य से बहुत ज्यादा उम्मीदें न बांधें।


