तूफान अर्नव की तबाही ने फिर दिखाया कुदरत का रौद्र रूप, विकास के दावों के बीच बेबस नजर आया इंसान

तूफान अर्नव की तबाही ने फिर दिखाया कुदरत का रौद्र रूप, विकास के दावों के बीच बेबस नजर आया इंसान

संपादकीय

प्रकृति के सामने इंसान की ताकत और उसके विकास के तमाम दावे उस समय बौने साबित हो जाते हैं, जब कुदरत अपना रौद्र रूप दिखाती है। विज्ञान ने भले ही इतनी तरक्की कर ली हो कि इंसान समुद्र की गहराइयों से लेकर अंतरिक्ष तक पहुंच गया हो, लेकिन आंधी, तूफान, बाढ़ और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं के सामने आज भी उसकी बेबसी साफ दिखाई देती है। तूफान अर्नव ने देश के विभिन्न हिस्सों में जिस तरह जनजीवन को प्रभावित किया और भारी नुकसान की आशंका पैदा की, उसने एक बार फिर प्राकृतिक आपदाओं से निपटने की हमारी तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

तेज हवाओं, मूसलाधार बारिश, जलभराव और बिगड़े मौसम ने आम आदमी की जिंदगी को मुश्किल बना दिया। कहीं मकानों को नुकसान पहुंचा तो कहीं पेड़ और बिजली के खंभे धराशायी हो गए। सड़कों पर पानी भरने से आवागमन प्रभावित हुआ और बिजली आपूर्ति बाधित होने से लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ा। ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों की मेहनत पर संकट मंडराने लगा। खेतों में खड़ी फसलें बारिश और तेज हवाओं की मार झेलती रहीं। शहरों में जलभराव ने विकास और बुनियादी सुविधाओं के दावों की पोल खोल दी। इस पूरी स्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि प्राकृतिक आपदा का असर केवल मौसम तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका प्रभाव समाज के हर वर्ग और अर्थव्यवस्था के प्रत्येक हिस्से पर पड़ता है।

तूफान की सबसे बड़ी मार उन लोगों पर पड़ती है, जिनकी आर्थिक स्थिति पहले से कमजोर होती है। एक गरीब परिवार के लिए कच्चे मकान की छत उड़ जाना केवल भवन का नुकसान नहीं, बल्कि उसके पूरे जीवन की जमा-पूंजी का बिखर जाना है। किसान के लिए खेत में खड़ी फसल केवल अनाज नहीं होती, बल्कि पूरे परिवार की उम्मीद और सालभर की मेहनत होती है। मजदूर के लिए बारिश और तूफान के कारण काम बंद होना रोजी-रोटी का संकट बन जाता है। छोटे दुकानदारों और कारोबारियों के लिए बाजार बंद होना तथा सामान खराब होना आर्थिक परेशानी को और बढ़ा देता है। ऐसे में प्राकृतिक आपदा का वास्तविक दर्द उन परिवारों को सबसे अधिक महसूस होता है, जिनके पास संकट से उबरने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होते।

प्राकृतिक आपदा से ज्यादा गंभीर है हमारी तैयारी में कमी

प्राकृतिक आपदाओं को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन उनसे होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि मौसम विभाग की चेतावनियों को केवल सरकारी सूचना मानकर न छोड़ा जाए, बल्कि उन्हें आम जनता तक प्रभावी ढंग से पहुंचाया जाए। समय रहते लोगों को सतर्क करना, संवेदनशील इलाकों की पहचान करना और जरूरत पड़ने पर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।

हर साल बारिश के मौसम में शहरों में जलभराव की समस्या सामने आती है। नालों की सफाई, जलनिकासी और बरसाती पानी के प्रबंधन को लेकर दावे तो बहुत किए जाते हैं, लेकिन तेज बारिश होते ही सड़कों पर पानी भर जाता है। सवाल यह है कि जब हर साल बारिश और तूफान की आशंका रहती है, तब भी शहरों की व्यवस्थाएं पहले से दुरुस्त क्यों नहीं की जातीं? क्या आपदा आने के बाद राहत कार्य शुरू करना ही पर्याप्त है? क्या प्रशासन की जिम्मेदारी केवल नुकसान का आंकड़ा तैयार करने और प्रभावित लोगों को सहायता देने तक सीमित रहनी चाहिए?

वास्तव में आपदा प्रबंधन का अर्थ केवल राहत सामग्री बांटना नहीं, बल्कि आपदा आने से पहले ऐसी व्यवस्था तैयार करना है, जिससे जान-माल का नुकसान न्यूनतम हो। शहरों में जलनिकासी की बेहतर व्यवस्था, बिजली के तारों और खंभों की नियमित जांच, कमजोर भवनों की पहचान और ग्रामीण इलाकों में सुरक्षित आश्रय स्थलों की उपलब्धता जैसे कदम बेहद जरूरी हैं।

किसानों की बर्बादी पर कौन देगा जवाब?

तूफान और बेमौसम बारिश का सबसे गंभीर असर कृषि क्षेत्र पर पड़ता है। किसान पहले ही मौसम की अनिश्चितता, महंगी खाद, बीज, डीजल और सिंचाई की लागत से जूझ रहा है। ऐसे में जब तैयार फसल पर बारिश और तेज हवाओं का कहर टूटता है तो उसकी आर्थिक स्थिति डगमगा जाती है। धान, सब्जियों और अन्य फसलों को नुकसान होने पर किसान के सामने परिवार के भरण-पोषण से लेकर कर्ज चुकाने तक का संकट खड़ा हो जाता है।

सरकारों को चाहिए कि फसल नुकसान का आकलन करने की प्रक्रिया सरल और पारदर्शी बनाई जाए। प्रभावित किसानों के खेतों का समय से सर्वे कराया जाए और मुआवजा देने में अनावश्यक देरी न हो। केवल घोषणाओं से किसान की परेशानी दूर नहीं होगी। उसे समय पर आर्थिक सहायता, फसल बीमा का लाभ और भविष्य की खेती के लिए जरूरी संसाधन उपलब्ध कराने होंगे। प्राकृतिक आपदा से प्रभावित किसान को राहत देना केवल सरकारी योजना का हिस्सा नहीं, बल्कि उसकी मेहनत और आजीविका के प्रति जिम्मेदारी है।

बदलते मौसम से त्योहारों की खुशियां भी हुईं प्रभावित

तूफान और बारिश का असर केवल खेती और कारोबार तक सीमित नहीं रहा। आम लोगों के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन पर भी इसका प्रभाव पड़ा। उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में करवा चौथ के अवसर पर बादलों और बारिश के कारण चंद्रमा के दर्शन नहीं हो सके। जिन महिलाओं ने पूरे दिन अपने पति की लंबी उम्र के लिए निर्जला व्रत रखा था, उन्हें रात में चांद देखने के लिए परेशान होना पड़ा। कई जगह महिलाओं ने मोबाइल फोन के माध्यम से चंद्रमा की तस्वीर देखकर व्रत पूरा किया।

यह घटना बताती है कि मौसम में आने वाला बदलाव हमारी रोजमर्रा की जिंदगी और परंपराओं तक को प्रभावित करने लगा है। ऐसे में बदलते मौसम के पैटर्न को गंभीरता से समझने और उसके अनुसार तैयारी करने की जरूरत है।

आपदा के समय प्रशासन की असली परीक्षा

  • किसी भी सरकार और प्रशासन की कार्यक्षमता का वास्तविक परीक्षण सामान्य दिनों में नहीं, बल्कि संकट के समय होता है। तूफान के दौरान राहत और बचाव दलों की सक्रियता, अस्पतालों की तैयारी, बिजली और संचार व्यवस्था की बहाली तथा जरूरतमंदों तक भोजन और पानी पहुंचाने की क्षमता ही प्रशासन की असली परीक्षा होती है।
  • आपदा के दौरान बुजुर्गों, बच्चों, दिव्यांगों और गर्भवती महिलाओं की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। राहत शिविरों में साफ पानी, भोजन, दवाइयां और स्वच्छता की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए। इसके अलावा जिन परिवारों के मकान क्षतिग्रस्त हो गए हैं, उनके पुनर्वास की ठोस योजना तैयार की जानी चाहिए। आपदा के बाद प्रभावित लोगों को अकेला छोड़ देना किसी भी व्यवस्था की संवेदनहीनता को दर्शाता है।
  • यह भी जरूरी है कि स्थानीय निकायों, पुलिस, स्वास्थ्य विभाग, बिजली विभाग और आपदा प्रबंधन की टीमें आपसी समन्वय के साथ काम करें। गांवों और कस्बों में स्थानीय स्तर पर स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित किया जाए, ताकि आपात स्थिति में शुरुआती सहायता तत्काल उपलब्ध हो सके।

प्रकृति से खिलवाड़ की कीमत भी चुका रहा समाज

आज विकास की दौड़ में पर्यावरण को जिस तरह नुकसान पहुंचाया जा रहा है, उस पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। जंगलों की कटाई, नदियों और प्राकृतिक जलमार्गों पर अतिक्रमण, तालाबों का अस्तित्व समाप्त होना और अनियोजित शहरीकरण जैसी समस्याएं प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को बढ़ा सकती हैं। जब बारिश का पानी निकलने के प्राकृतिक रास्ते बंद कर दिए जाते हैं तो सामान्य बारिश भी जलभराव और बाढ़ का रूप ले लेती है।

विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास नहीं जो प्रकृति के संतुलन को ही बिगाड़ दे। शहरों का विस्तार करते समय जल निकासी के पुराने रास्तों, तालाबों, नदियों और हरित क्षेत्रों का संरक्षण अनिवार्य होना चाहिए। नदियों के किनारे और संवेदनशील इलाकों में निर्माण को लेकर सख्त नियम लागू किए जाने चाहिए। पर्यावरण संरक्षण को केवल भाषणों और अभियानों तक सीमित रखने के बजाय विकास की हर योजना का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा।

अब सबक लेने का समय

तूफान अर्नव की तबाही और उससे पैदा हुई परेशानियों को केवल एक प्राकृतिक घटना मानकर भुला देना उचित नहीं होगा। हर आपदा अपने पीछे कई सवाल और भविष्य के लिए सबक छोड़ जाती है। जरूरत इस बात की है कि इन सवालों पर गंभीरता से विचार किया जाए और व्यवस्थाओं में स्थायी सुधार किए जाएं।

प्राकृतिक आपदाएं किसी जाति, धर्म, वर्ग या क्षेत्र को देखकर नहीं आतीं। उनका असर हर किसी पर पड़ सकता है। इसलिए उनसे निपटने की जिम्मेदारी भी सामूहिक है। सरकार को मजबूत आपदा प्रबंधन तंत्र तैयार करना होगा, प्रशासन को जवाबदेह बनना होगा और नागरिकों को भी मौसम संबंधी चेतावनियों का पालन करते हुए सतर्क रहना होगा।

आज जरूरत केवल नुकसान की भरपाई करने की नहीं, बल्कि भविष्य में होने वाले नुकसान को रोकने की है। राहत और पुनर्वास के साथ-साथ ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिसमें प्राकृतिक आपदा के समय किसी परिवार को अपनी जान और आजीविका के बीच चुनाव न करना पड़े।

अंततः प्रकृति से मुकाबला करने के बजाय उसके साथ संतुलन बनाकर चलना ही समझदारी है। तूफान अर्नव ने एक बार फिर याद दिलाया है कि इंसान चाहे कितनी भी तरक्की कर ले, प्रकृति से बड़ा नहीं हो सकता। लेकिन दूरदर्शी योजना, मजबूत व्यवस्था और सामूहिक जिम्मेदारी के बल पर प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली तबाही को जरूर कम किया जा सकता है। अब सवाल यह नहीं कि अगला तूफान कब आएगा, बल्कि सवाल यह है कि अगली आपदा से पहले हम कितने तैयार होंगे।

Pankaj

worldkhabarexpress.com

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