‘रणसिंघा’ को अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में श्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री का पुरस्कार
घुमारवीं। घुमारवीं के नसवाल गांव के फिल्म निर्माता संजीव सोनी की लघु डॉक्यूमेंट्री ‘रणसिंघा’ ने हिमाचली लोक संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाई है। 11वें देहरादून अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में उनकी फिल्म को लघु डॉक्यूमेंट्री श्रेणी में श्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री का पुरस्कार मिला। फिल्म का फेस्टिवल के दौरान बड़े पर्दे पर प्रदर्शन भी किया गया। पुरस्कार उत्तराखंड के फिल्म एवं टेलीविजन अभिनेता हेमंत पांडे ने फिल्म निर्माता संजीव सोनी और सह-निर्देशिका गौरी सोनी को प्रदान किया। समारोह में फिल्म और टेलीविजन जगत से जुड़ी कई प्रमुख हस्तियां मौजूद रहीं। ‘रणसिंघा’ हिमाचल प्रदेश के पारंपरिक लोकवाद्य और उससे जुड़ी लोक संस्कृति पर आधारित डॉक्यूमेंट्री है। फिल्म के माध्यम से इस पारंपरिक वाद्य की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को सामने लाने का प्रयास किया गया है। इसमें रणसिंघा के संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया गया है। फिल्म निर्माता संजीव सोनी का कहना है कि हिमाचल की पहचान केवल प्राकृतिक सुंदरता से नहीं, बल्कि यहां की समृद्ध लोक परंपराओं, लोकसंगीत, लोकवाद्यों और लोकगीतों से भी जुड़ी है। बदलते समय में इन परंपराओं को सुरक्षित रखना जरूरी है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित रह सकें। ‘रणसिंघा’ के माध्यम से इसी उद्देश्य को दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिश की गई है। फिल्म को देहरादून में मिला पुरस्कार इस प्रयास की महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। इससे पहले भी डॉक्यूमेंट्री ने अपनी गुणवत्ता और विषयवस्तु के कारण दर्शकों और फिल्म समारोहों का ध्यान आकर्षित किया है। धर्मशाला फिल्मोत्सव में ‘रणसिंघा’ को द्वितीय स्थान मिल चुका है। लगातार मिल रही सराहना से फिल्म की टीम का उत्साह बढ़ा है। अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में पुरस्कार मिलने से हिमाचली लोकवाद्य और लोक संस्कृति से जुड़े विषय को भी व्यापक मंच मिला है। यह उपलब्धि स्थानीय कलाकारों और संस्कृति से जुड़े लोगों के लिए प्रेरणा का कारण बन सकती है।
हिमाचल के पारंपरिक लोकवाद्यों में रणसिंघा का विशेष महत्व माना जाता है। अलग-अलग सांस्कृतिक और पारंपरिक आयोजनों में इसका इस्तेमाल लोक वातावरण को जीवंत बनाने के लिए किया जाता रहा है। समय के साथ आधुनिक मनोरंजन के साधनों के बढ़ते प्रभाव के कारण कई पारंपरिक वाद्य और उनसे जुड़ी विधाएं धीरे-धीरे सीमित होती जा रही हैं। ऐसे में इनके दस्तावेजीकरण और संरक्षण की जरूरत बढ़ गई है। ‘रणसिंघा’ इसी सांस्कृतिक विरासत को दर्ज करने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में किया गया प्रयास है।
फिल्म के माध्यम से रणसिंघा से जुड़े कलाकारों, परंपराओं और इसकी सांस्कृतिक भूमिका को समझने का अवसर मिलता है। संजीव सोनी का मानना है कि लोक संस्कृति किसी भी क्षेत्र की पहचान और इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। इसलिए लोकवाद्यों, लोकगीतों और पारंपरिक कलाओं को केवल मनोरंजन के माध्यम के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर के तौर पर संरक्षित किया जाना चाहिए। देहरादून फिल्म फेस्टिवल में मिली सफलता ने इस संदेश को व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचाने में मदद की है। इससे हिमाचली लोक संस्कृति पर आधारित फिल्मों और रचनात्मक प्रयासों को भी प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।

