बारिश ने छीनी शारदा की छत, मलबे में दबी गृहस्थी और टूटे हाथ के साथ छप्पर के नीचे जिंदगी
न आवास योजना में नाम, न मदद को पहुंचे जिम्मेदार… दो दिन की बारिश ने वृद्धा को कर दिया बेघर

रिपोर्ट:- सत्यम शुक्ला
कानपुर। बारिश की बूंदें किसी के लिए मौसम की खूबसूरती हो सकती हैं, लेकिन बिधनू ब्लॉक के कठेरूवा गांव निवासी वृद्ध शारदा के लिए यही बारिश मुसीबत बनकर आई। दो दिनों से लगातार हो रही बारिश ने न सिर्फ उसका जर्जर आशियाना छीन लिया, बल्कि उसकी पूरी गृहस्थी को मलबे में दफन कर दिया। मकान गिरने के दौरान बल्ली की चपेट में आने से शारदा का हाथ भी टूट गया। अब वह दर्द से कराहते हुए अपने बेटे के साथ घर के बाहर बने छप्पर के नीचे जिंदगी काटने को मजबूर है।
जिस घर में शारदा ने अपने जीवन के कई साल गुजारे, वही घर बारिश के पानी के आगे टिक नहीं सका। जर्जर मकान का हिस्सा अचानक भरभराकर गिर पड़ा। देखते ही देखते घर का सामान मलबे के नीचे दब गया। चारपाई, कपड़े और जरूरत का अन्य घरेलू सामान सबकुछ मलबे में दबा है। लेकिन बेबसी ऐसी है कि शारदा के पास इतना पैसा भी नहीं कि मजदूर बुलाकर मलबा हटवा सके और अपनी बची-खुची गृहस्थी बाहर निकाल सके।
हादसे में शारदा का हाथ टूट गया। दर्द से परेशान वृद्धा के पास न इलाज की पर्याप्त व्यवस्था है और न सिर छिपाने के लिए सुरक्षित छत। बारिश से बचने के लिए अब वह घर के बाहर छप्पर के नीचे बैठी है। हर बारिश के साथ उसे डर सताता है कि कहीं बचा हुआ हिस्सा भी न गिर जाए।

शारदा के बेटे अमन ने बताया कि उसके पिता मुन्ना उनके साथ नहीं रहते हैं। परिवार पहले से ही आर्थिक तंगी से जूझ रहा था। किसी तरह घर में जिंदगी चल रही थी, लेकिन बारिश ने वह सहारा भी छीन लिया। अमन के सामने एक साथ कई परेशानियां खड़ी हो गई हैं—मां का टूटा हाथ, रहने के लिए छत नहीं और मलबे में दबा गृहस्थी का सामान।
अमन के मुताबिक, उसने अपनी मां की हालत और मकान गिरने की जानकारी क्षेत्रीय लेखपाल सपना को दी थी। लेखपाल ने मौके पर आकर स्थिति देखने की बात कही थी। परिवार को उम्मीद थी कि शायद सरकारी मदद का कोई रास्ता निकलेगा, लेकिन इंतजार के बाद भी मदद नहीं पहुंची। लेखपाल से फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनका फोन नहीं उठ सका।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि शारदा का नाम आवास योजना में भी नहीं है। जिस उम्र में उसे परिवार और प्रशासन से सहारे की जरूरत है, उस उम्र में वह टूटी छत, मलबे और बारिश के बीच जिंदगी गुजारने को मजबूर है।
शारदा की आंखों के सामने उसका आशियाना मलबे में तब्दील हो गया। घर के बाहर छप्पर के नीचे बैठी वह बारिश रुकने का इंतजार कर रही है। एक तरफ हाथ का दर्द है, दूसरी तरफ सिर पर छत नहीं और तीसरी तरफ मलबे में दबे सामान को निकालने की चिंता। उसकी बेबसी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस घर को उसने कभी अपना सुरक्षित ठिकाना समझा था, आज उसी घर के मलबे के पास बैठकर वह मदद की राह देख रही है।
परिवार ने प्रशासन से मांग की है कि शारदा की स्थिति का तत्काल सर्वे कराया जाए, उसे आपदा राहत के तहत आर्थिक सहायता दी जाए और आवास योजना में उसका नाम शामिल कर सुरक्षित छत उपलब्ध कराई जाए। साथ ही घायल शारदा के इलाज की भी व्यवस्था कराने की मांग की गई है।
अब सवाल सिर्फ एक परिवार की मदद का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जो बारिश में गरीबों के टूटते आशियानों को देखकर भी उनकी सुध कब लेगी। शारदा के लिए बारिश थमने का इंतजार महज मौसम के बदलने का इंतजार नहीं है, बल्कि इस उम्मीद का इंतजार है कि कोई आएगा और कहेगा—अब आपको खुले आसमान के नीचे नहीं रहना पड़ेगा।
बारिश में गिरे दो दर्जन से ज्यादा कच्चे मकान

कानपुर। दो दिन से लगातार हो रही बारिश ने बिधनू ब्लॉक के कई गांवों में गरीब परिवारों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। मझावन, इटारा, जामू, पलरा, सपई, रौतारा समेत अन्य गांवों में बारिश के चलते दो दर्जन से ज्यादा कच्चे मकान धराशायी हो गए। कई परिवारों के सामने सिर छिपाने तक का संकट खड़ा हो गया है।
इटारा गांव निवासी मजदूर श्याम बहादुर का कच्चा मकान भी बारिश की मार नहीं सह सका और भरभराकर गिर गया। मकान गिरने के बाद परिवार की गृहस्थी मलबे में दब गई। श्याम बहादुर अब अपने बच्चों के साथ तिरपाल के नीचे रात गुजारने को मजबूर हैं। बारिश के बीच बच्चों को तिरपाल के नीचे सिमटा देखकर परिवार की बेबसी साफ नजर आती है।
ग्रामीणों का कहना है कि लगातार बारिश के कारण कई और जर्जर मकानों पर भी खतरा मंडरा रहा है। ग्रामीणों ने प्रशासन से प्रभावित परिवारों का तत्काल सर्वे कराकर राहत सामग्री, आर्थिक सहायता और सुरक्षित आवास की व्यवस्था कराने की मांग की है।

