मौत के ताबूत बन हाइवे पर दौड़ रहे बस और डंपर, सुरक्षा मानकों पर उठे सवाल
राजेंद्र कुमार विशेष संवाददाता।
वर्ल्ड खबर एक्सप्रेस-
24 सितंबर 2026 की रात यमुना एक्सप्रेसवे पर एक चलती स्लीपर बस आग का गोला बन गई। दिल्ली से महोबा जा रही बस में आग लगने के बाद देखते ही देखते लपटों ने पूरे वाहन को अपनी चपेट में ले लिया। नौ यात्रियों की मौत हो गई। कई यात्रियों ने किसी तरह खिड़कियों से निकलकर अपनी जान बचाई। हादसे के बाद बस के आपातकालीन निकास, सामान से रास्ता बाधित होने और यात्रियों के बाहर निकलने में आई कठिनाइयों जैसे पहलुओं की जांच की जा रही है। आग लगने का अंतिम कारण अभी जांच का विषय है। इस हादसे ने एक बार फिर वह सवाल सामने खड़ा कर दिया है, जिसे हम अक्सर दुर्घटना के बाद कुछ दिनों तक पूछते हैं और फिर भूल जाते हैं—क्या सड़क पर चलने वाले यात्री वाहनों की सुरक्षा की जांच वास्तव में उतनी ही गंभीरता से होती है, जितनी गंभीरता से नियम बनाए गए हैं..?
बस में सफर करने वाला यात्री यह भरोसा करके बैठता है कि वह सुरक्षित अपने गंतव्य तक पहुंचेगा। रात की स्लीपर बस में यह भरोसा और बड़ा होता है। यात्री सीट पर नहीं, बर्थ पर सो रहा होता है। उसे उम्मीद होती है कि जिस वाहन में वह अपनी आंखें बंद कर रहा है, वह तकनीकी रूप से सुरक्षित है और आपात स्थिति आने पर बाहर निकलने का रास्ता उपलब्ध रहेगा। यहीं से स्लीपर बसों के सुरक्षा मानकों को समझना जरूरी हो जाता है। भारत में बसों की बॉडी और निर्माण से जुड़े एआईएस-052 (AIS-052) जैसे मानक हैं। स्लीपर कोच के लिए एआईएस-119 (AIS-119) में अतिरिक्त सुरक्षा आवश्यकताएं निर्धारित हैं। सरल भाषा में समझें तो AIS-052 बस के मुख्य ढांचे और निर्माण से संबंधित मानक है, जबकि AIS-119 स्लीपर बस में बर्थ की व्यवस्था, उनकी मजबूती और सो रहे यात्रियों की सुरक्षा से जुड़ी विशेष आवश्यकताओं को निर्धारित करता है।
केंद्र सरकार ने फरवरी 2026 में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को बसों के पंजीकरण और फिटनेस जांच के समय AIS-052 और AIS-119 का पालन सुनिश्चित करने की सलाह दी थी। सरकार ने इससे पहले हुई एक स्लीपर बस आग की घटना की जांच में निर्धारित सीमा से अधिक बस की लंबाई, आपातकालीन दरवाजे के आकार में कमी, दरवाजे के रास्ते में सीटें, पर्याप्त आपातकालीन निकास की कमी और आग से बचाव की व्यवस्था न होने जैसी कमियां भी दर्ज की थीं। इससे स्पष्ट है कि मानक बनाए जाने के साथ-साथ उनका वास्तविक पालन और समय-समय पर निरीक्षण भी जरूरी है।
सुरक्षा मानक केवल तकनीकी शब्द नहीं हैं। इनका सीधा संबंध यात्री की जिंदगी से है। यदि बस में आग लग जाए तो यात्री कितनी जल्दी बाहर निकल सकता है, आपातकालीन दरवाजा खुल सकता है या नहीं, अंदर जाने-आने का रास्ता सामान से बंद तो नहीं है और आग तेजी से फैलने पर यात्रियों के पास बचने का रास्ता कितना है इन सवालों के जवाब पहले से सुनिश्चित होने चाहिए।
यमुना एक्सप्रेसवे की घटना ने इन्हीं सवालों को और गंभीर बना दिया है। रिपोर्टों के अनुसार पुलिस बस के आपातकालीन निकास और अंदर रखे सामान से रास्ता बाधित होने जैसे संभावित सुरक्षा दोषों की जांच कर रही है। इसलिए इस घटना की जांच केवल आग लगने के कारण तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह भी देखा जाना जरूरी है कि आग लगने के बाद यात्रियों के पास सुरक्षित बाहर निकलने की पर्याप्त व्यवस्था थी या नहीं।
रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि प्राथमिकी में यात्रियों द्वारा जलने की गंध महसूस होने और चालक-परिचालक को इसकी जानकारी देने का उल्लेख है। यह जांच का हिस्सा है और इसकी पुष्टि तकनीकी जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया से होनी है। लेकिन इससे एक बड़ा सवाल जरूर उठता है—चलती बस में आग या धुएं का संकेत मिलने पर चालक और परिचालक के लिए तत्काल बस रोकने और यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है?
स्लीपर बस में रात के समय सुरक्षा का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि अधिकांश यात्री सो रहे होते हैं। अचानक आग, धुआं या दुर्घटना होने पर कुछ सेकंड भी बहुत महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इसलिए आपातकालीन दरवाजा, बाहर निकलने के रास्ते, अंदर का खुला मार्ग, आग से बचाव की व्यवस्था और बर्थ की सही बनावट को केवल कागज पर पूरा कर देना पर्याप्त नहीं होना चाहिए। बस बनने के बाद उसमें किए गए बदलाव भी जांच का विषय होने चाहिए। अतिरिक्त बर्थ लगाना, यात्रियों की संख्या बढ़ाना, रास्ते को संकरा करना या किसी सुरक्षा व्यवस्था को हटाना वाहन की मूल सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। इसलिए फिटनेस प्रमाणपत्र का अर्थ केवल कागज की जांच नहीं होना चाहिए। वाहन की वास्तविक स्थिति भी देखी जानी चाहिए।
लेकिन सड़क का खतरा केवल स्लीपर बसों तक सीमित नहीं है। दूसरी ओर भारी डंपर भी कई गंभीर सवाल खड़े करते हैं। निर्माण सामग्री ढोने वाले डंपर देश के विकास के लिए जरूरी हैं। सड़क, पुल, मकान और दूसरी परियोजनाओं के लिए सामग्री इन्हीं वाहनों से पहुंचती है। समस्या तब पैदा होती है जब वाहन निर्धारित भार से अधिक माल लेकर चले, उसकी गति नियंत्रित न हो या उसके मूल तकनीकी ढांचे में ऐसा बदलाव कर दिया जाए जिसकी सुरक्षा पर सवाल उठते हों।
विशेष चिंता ऐसे डंपरों को लेकर है जिनमें मैन्युअल स्विच लगाकर चलते समय चार पहिए और संबंधित एक्सेल यानी धुरी को ऊपर उठाने की व्यवस्था की जाती है। चालक स्विच के माध्यम से पहियों और एक्सेल की स्थिति बदल सकता है। यदि ऐसी व्यवस्था वाहन के मूल डिजाइन का हिस्सा नहीं है या इसके लिए आवश्यक तकनीकी स्वीकृति नहीं है तो यह गंभीर जांच का विषय है।
सवाल यह है कि भारी वाहन में चार पहिए सड़क से ऊपर उठने पर भार का बंटवारा किस तरह बदलता है। उस स्थिति में सड़क पर वाहन की पकड़ कैसी रहती है? ब्रेक लगाने पर उसका व्यवहार क्या होता है? मोड़ पर उसका संतुलन कितना सुरक्षित रहता है? अचानक सामने कोई वाहन आ जाए और चालक को तेज ब्रेक लगाना पड़े तो वाहन का नियंत्रण किस हद तक बना रहता है?
इन सवालों का जवाब अनुमान से नहीं दिया जा सकता। इसके लिए तकनीकी परीक्षण जरूरी है। लेकिन सड़क पर ऐसा डंपर दिखाई देना अपने आप में इतना महत्वपूर्ण जरूर है कि परिवहन विभाग उसकी जांच करे। यह देखा जाए कि मैन्युअल स्विच किसने लगाया, वह अधिकृत है या नहीं, वाहन के मूल ढांचे में क्या बदलाव किया गया और चार पहिए तथा एक्सेल ऊपर होने की स्थिति में उसकी ब्रेकिंग और स्थिरता का परीक्षण हुआ है या नहीं।
भारी डंपरों की दूसरी बड़ी समस्या ओवरलोडिंग है। क्षमता से अधिक माल लेकर चलने वाला वाहन केवल सड़क को नुकसान नहीं पहुंचाता। अतिरिक्त भार का असर उसके टायर, ब्रेक, सस्पेंशन और संतुलन पर भी पड़ता है। भारी वाहन को रोकने में सामान्य वाहन की तुलना में अधिक दूरी लग सकती है। ऐसे में यदि वाहन ओवरलोड हो और गति भी तेज हो तो खतरा और बढ़ सकता है।
कई मार्गों पर रात के समय भारी डंपर तेज गति से चलते दिखाई देते हैं। अंधेरे में सामने या पीछे चल रहे वाहनों को पहचानना कठिन होता है। ऐसे में तेज गति से चल रहा भारी वाहन दूसरे वाहन के लिए अचानक सामने आने वाला खतरा बन सकता है। इसलिए ओवरलोडिंग और तेज गति को अलग-अलग समस्या मानने के बजाय वाहन की पूरी सुरक्षा के संदर्भ में देखना चाहिए।
यहां प्रशासन की जिम्मेदारी का भी महत्वपूर्ण सवाल है। यदि किसी डंपर में मैन्युअल स्विच से चार पहिए और एक्सेल उठाने की व्यवस्था है तो उसकी तकनीकी जांच कौन करेगा? यदि वाहन ओवरलोड है तो केवल चालक पर कार्रवाई होगी या वाहन मालिक और परिवहन व्यवस्था की भी जांच होगी? यदि वाहन में बाद में तकनीकी बदलाव किया गया है तो फिटनेस जांच के दौरान वह कैसे बच गया?
इसी तरह स्लीपर बसों के मामले में भी यह देखना जरूरी है कि प्रमाणन के बाद वाहन में कोई बदलाव तो नहीं हुआ। यदि बर्थ बढ़ाई गईं, आपातकालीन रास्ता बाधित हुआ या आग से बचाव की कोई व्यवस्था हटाई गई तो इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
दुर्घटना के बाद केवल चालक को दोषी ठहराकर जांच खत्म करना आसान है, लेकिन इससे पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। गंभीर दुर्घटना में यह भी देखा जाना चाहिए कि वाहन की फिटनेस कब हुई थी, उसका वास्तविक भार कितना था, ब्रेक और टायर की स्थिति कैसी थी, चालक कितने समय से लगातार वाहन चला रहा था, वाहन में कोई बाद का बदलाव किया गया था या नहीं और प्रमाणन के समय वाहन की वास्तविक स्थिति क्या थी। बसों के लिए बनाए गए AIS-052 और AIS-119 जैसे मानक इसी उद्देश्य से हैं कि वाहन की संरचना और यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित हो। लेकिन किसी भी मानक की असली परीक्षा सड़क पर होती है। प्रमाणपत्र तभी सार्थक है जब उसके बाद भी वाहन उसी सुरक्षा स्थिति में सड़क पर चले।
दुनिया के अनेक देशों में यात्री वाहनों की संरचना, आपातकालीन निकास और यात्रियों की सुरक्षा को लेकर तकनीकी परीक्षण, प्रमाणन और निगरानी की व्यवस्थाएं हैं। भारत में भी वाहन सुरक्षा के लिए तकनीकी मानक और प्रमाणन व्यवस्था मौजूद है। इसलिए सवाल यह नहीं कि हमारे यहां नियम हैं या नहीं। सवाल यह है कि क्या हर स्तर पर उनका पालन हो रहा है और क्या उल्लंघन समय रहते पकड़ा जा रहा है?
भारत में चुनौती केवल नियम बनाने की नहीं है। चुनौती यह है कि नियम सड़क पर दिखाई दें। यदि स्लीपर बस के लिए सुरक्षा मानक निर्धारित हैं तो उसकी जांच वास्तविक स्थिति में हो। यदि भारी वाहन के लिए भार सीमा तय है तो सड़क पर उसका पालन दिखाई दे। यदि वाहन के मूल ढांचे में कोई बदलाव किया गया है तो उसकी जांच हो। और यदि कोई वाहन लोगों के लिए खतरा बन सकता है तो दुर्घटना होने का इंतजार न किया जाए। सड़क सुरक्षा केवल परिवहन विभाग की जिम्मेदारी नहीं है। वाहन निर्माता को सुरक्षित वाहन बनाना है। बॉडी बनाने वाले को निर्धारित मानकों का पालन करना है। वाहन मालिक को उसे सुरक्षित स्थिति में रखना है। चालक को नियमों के अनुसार वाहन चलाना है और प्रशासन को वास्तविक तथा निष्पक्ष जांच करनी है।
आम नागरिक की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। यदि कोई ओवरलोड डंपर खतरनाक ढंग से तेज गति में चलता दिखाई देता है, यदि कोई भारी वाहन चार पहिए और एक्सेल ऊपर करके सड़क पर दौड़ता दिखाई देता है या यदि कोई यात्री वाहन सुरक्षा नियमों की अनदेखी करता दिखे तो इसकी सूचना संबंधित विभाग तक पहुंचनी चाहिए। दुर्घटना होने के बाद मदद करने से ज्यादा जरूरी है कि संभावित दुर्घटना को पहले ही रोक दिया जाए।
यमुना एक्सप्रेसवे की स्लीपर बस घटना ने नौ परिवारों को ऐसा दर्द दिया है जिसे कोई मुआवजा वापस नहीं कर सकता। इसलिए इस हादसे को केवल एक और दुर्घटना मानकर आगे बढ़ जाना उचित नहीं होगा। इसकी जांच से जो भी सुरक्षा कमियां सामने आएं, उन्हें पूरे देश की स्लीपर बस व्यवस्था के लिए सीख बनाया जाना चाहिए।
साथ ही सड़क पर दौड़ते भारी डंपरों की तकनीकी जांच भी उतनी ही गंभीरता से होनी चाहिए। मैन्युअल स्विच से चार पहिए और एक्सेल उठाकर चलना, क्षमता से अधिक भार लादना और तेज गति से भारी वाहन चलाना—इन सभी स्थितियों की वैधता और सुरक्षा की अलग-अलग तकनीकी जांच होनी चाहिए।
सड़क पर दौड़ता वाहन केवल मशीन नहीं है। उसके भीतर बैठे लोग किसी के पिता, मां, पति, पत्नी, भाई, बहन या बच्चे हैं। एक छोटी तकनीकी लापरवाही किसी परिवार की पूरी दुनिया बदल सकती है।
इसलिए सड़क सुरक्षा को केवल चालान, जुर्माने और दुर्घटना के बाद मुआवजे तक सीमित नहीं किया जा सकता। सुरक्षा का मतलब है—दुर्घटना होने से पहले खतरे को पहचानना, वाहन की वास्तविक स्थिति जांचना और नियमों का पालन कराना।
स्लीपर बस हो या भारी डंपर, दोनों के पीछे किसी न किसी परिवार की उम्मीद जुड़ी होती है। नियम कागज पर नहीं, सड़क पर दिखाई देने चाहिए। तभी सड़क वास्तव में यात्रा का रास्ता बनेगी, मौत का नहीं।
(राजेंद्र कुमार ऐतिहासिक और सामयिक विषयों पर लगातार लिखते रहते हैं।)

