कानपुर में अनोखी परंपरा: रावण दहन से पहले होती है पूजा, साल में सिर्फ दशहरे पर खुलता है 200 साल पुराना मंदिर

कानपुर में अनोखी परंपरा: रावण दहन से पहले होती है पूजा, साल में सिर्फ दशहरे पर खुलता है 200 साल पुराना मंदिर

कानपुर। देशभर में विजयादशमी यानी दशहरे पर रावण का पुतला जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाया जाता है, लेकिन कानपुर में एक ऐसी अनोखी परंपरा निभाई जाती है, जो लोगों को हैरान करती है। यहां रावण का पुतला दहन करने से पहले उसकी पूजा-अर्चना की जाती है। शहर के शिवाला इलाके में स्थित करीब 200 साल पुराने रावण मंदिर के कपाट साल में केवल एक बार, दशहरे के दिन ही खोले जाते हैं।

मंगलवार सुबह करीब 6:30 बजे मंदिर के कपाट खुलते ही दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। मंदिर परिसर और रावण की प्रतिमा की साफ-सफाई के बाद विधि-विधान से अभिषेक किया गया। प्रतिमा को घी, दूध, दही और जल से स्नान कराया गया। इसके बाद पूजा-अर्चना और आरती का क्रम शुरू हुआ। श्रद्धालुओं ने मंदिर पहुंचकर दर्शन किए और अपनी आस्था प्रकट की।

विद्वान रावण की होती है पूजा

मंदिर के पुजारी पंडित राम बाजपेयी के मुताबिक, दशहरे के दिन मंदिर के कपाट खोलकर रावण की पूजा, अर्चना, अभिषेक और आरती की जाती है। शाम को रावण के पुतले का दहन होने के बाद मंदिर के कपाट फिर बंद कर दिए जाते हैं, जो अगले साल दशहरे पर ही खुलते हैं।

स्थानीय मान्यता के अनुसार, रावण केवल लंका का राजा ही नहीं, बल्कि महान विद्वान, शास्त्रों का ज्ञाता और भगवान शिव का परम भक्त भी था। उसके पास अपार बल, बुद्धि और विद्या थी। मान्यता है कि जिसने नौ ग्रहों को अपने वश में कर लिया हो, उसकी विद्वता असाधारण रही होगी। इसी मान्यता के आधार पर मंदिर में रावण के विद्वान स्वरूप की पूजा की जाती है।

पुतले का नहीं, अहंकार का होता है दहन

इस मंदिर की परंपरा के पीछे एक खास संदेश भी छिपा है। यहां रावण की पूजा को उसके बुरे कर्मों का समर्थन नहीं, बल्कि उसकी विद्वता और ज्ञान के सम्मान के रूप में देखा जाता है। स्थानीय मान्यता है कि शाम को रावण के पुतले का दहन उसके अहंकार और बुराइयों के अंत का प्रतीक है।

मंदिर में दर्शन करने पहुंचे श्रद्धालु जय सिंह ने बताया कि सामने बाबा भोलेनाथ का मंदिर है और बाहर दस महाविद्याओं के रक्षक के रूप में रावण का मंदिर स्थापित होने की मान्यता है। उनके मुताबिक, यहां वर्षों से श्रद्धालु दर्शन करने आते रहे हैं और दशहरे के दिन मंदिर में विशेष पूजा होती है।

उन्नाव से भी पहुंचे श्रद्धालु

पहली बार उन्नाव जिले से दर्शन करने पहुंचे मोहित मिश्रा ने कहा कि सत्य और असत्य का चक्र हमेशा चलता रहता है। दशहरा हमें अहंकार और बुराइयों को समाप्त करने का संदेश देता है। उनके अनुसार, रावण के पुतले का दहन इसी संदेश का प्रतीक है।

शाम को पूजा-अर्चना और आरती के बाद मंदिर के सामने मैदान में रावण के पुतले का दहन किया जाता है। इसके तुरंत बाद मंदिर के कपाट फिर बंद कर दिए जाते हैं और श्रद्धालुओं को अगले दशहरे तक इंतजार करना पड़ता है।

कानपुर का यह अनोखा मंदिर दशहरे की परंपरा को एक अलग दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है। जहां एक ओर रावण दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर यहां उसकी विद्वता का सम्मान करते हुए लोगों को यह संदेश दिया जाता है कि ज्ञान और शक्ति के बावजूद अहंकार व्यक्ति के पतन का कारण बन सकता है।

Pankaj

worldkhabarexpress.com

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