मां-बेटी की जोड़ी ने धागों से बुनी आत्मनिर्भरता की कहानी, ‘कला की डोर’ से 30 से अधिक महिलाओं को मिला रोजगार
कानपुर की अर्चना गुप्ता और रिधिमा गुप्ता की अनूठी पहल, क्रोशे और हस्तशिल्प के जरिए महिलाएं घर बैठे कमा रहीं 5 हजार से 15 हजार रुपये तक
नारी शक्ति की मिसाल: घरेलू जिम्मेदारियों के साथ रोजगार, हुनर को पहचान और मेहनत से आत्मसम्मान हासिल कर रहीं महिलाएं

कानपुर। नवरात्रि का पर्व शक्ति, साहस, सृजन और नारी सम्मान का प्रतीक है। मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना के बीच समाज में ऐसी महिलाओं की कहानियां भी प्रेरणा देती हैं, जो अपने हुनर और संकल्प से दूसरों के जीवन में बदलाव ला रही हैं। कानपुर की अर्चना गुप्ता और उनकी बेटी रिधिमा गुप्ता ऐसी ही एक मिसाल हैं। दोनों ने मिलकर ‘कला की डोर’ नाम से ऐसी पहल शुरू की है, जिसके माध्यम से 30 से अधिक महिलाओं को हस्तशिल्प के जरिए रोजगार से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। क्रोशे से फूल बनाने से लेकर आकर्षक गुलदस्ते, ग्रीटिंग कार्ड, कढ़ाई के सामान और कीचेन तैयार करने तक, इस पहल ने महिलाओं के हुनर को आमदनी का जरिया बनाया है।
इस पहल से जुड़ी महिलाएं अपनी भागीदारी और उत्पादन के आधार पर हर महीने करीब पांच हजार से 15 हजार रुपये तक कमा सकती हैं। खास बात यह है कि इसके लिए उन्हें घर-परिवार की जिम्मेदारियां छोड़कर बाहर जाने की जरूरत नहीं है। उन्हें उनकी सुविधा के अनुसार काम करने, नया हुनर सीखने और अपनी मेहनत से आर्थिक रूप से सक्षम बनने का अवसर मिलता है। ‘कला की डोर’ केवल हस्तनिर्मित वस्तुओं के निर्माण और बिक्री का माध्यम नहीं है, बल्कि उन महिलाओं के लिए उम्मीद का रास्ता भी है, जिन्हें परिस्थितियों के कारण अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर नहीं मिल पाया।
महामारी के संकट से जन्मा समाजसेवा का विचार
‘कला की डोर’ की शुरुआत के पीछे एक ऐसा अनुभव है, जिसने रिधिमा गुप्ता की सोच को नई दिशा दी। वर्ष 2020 में जब कोरोना महामारी ने पूरे देश की रफ्तार थाम दी थी, तब अनेक परिवार आर्थिक संकट से जूझ रहे थे। किसी के सामने भोजन की समस्या थी, तो किसी को इलाज और दूसरी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा था।
उस समय रिधिमा बैंक में काम करती थीं। महामारी के कारण जब बड़ी संख्या में लोग घरों में रहने को मजबूर थे, तब उन्हें काम के सिलसिले में बाहर निकलना पड़ता था। इस दौरान उन्होंने जरूरतमंद परिवारों की परेशानियों को करीब से देखा। लोगों की मदद करने की इच्छा से उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर यथासंभव सहायता जुटाने और जरूरतमंदों तक पहुंचाने का प्रयास किया। इस अनुभव ने उनके मन में समाज के लिए कुछ सार्थक करने की भावना को और मजबूत किया। उन्हें महसूस हुआ कि जरूरतमंद लोगों की मदद केवल तत्काल सहायता तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि ऐसे अवसर भी तैयार किए जाने चाहिए, जिनसे वे भविष्य में अपने पैरों पर खड़े हो सकें। महामारी का संकट कम होने के बाद भी रिधिमा की यह सोच बनी रही। उन्होंने बच्चों को मुफ्त पढ़ाना शुरू किया और अपने आसपास रहने वाली महिलाओं से बातचीत कर उनकी परेशानियों को समझने का प्रयास किया। कई महिलाओं ने आर्थिक तंगी के कारण बच्चों की पढ़ाई और घरेलू खर्चों को लेकर अपनी चिंताएं साझा कीं। यहीं से रिधिमा के मन में एक सवाल उठा कि क्यों न महिलाओं को ऐसा काम दिया जाए, जिसे वे अपनी सुविधानुसार घर से कर सकें और उससे नियमित आमदनी भी प्राप्त कर सकें। इसी विचार ने आगे चलकर ‘कला की डोर’ का रूप लिया।
मां के हुनर और बेटी की सोच ने तैयार किया रोजगार का रास्ता
रिधिमा की मां अर्चना गुप्ता को बचपन से ही रचनात्मक कार्यों और हस्तकला में रुचि रही है। 49 वर्षीय अर्चना क्रोशे से फूल बनाने सहित कई तरह के हस्तनिर्मित काम जानती थीं। हालांकि, पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते उनका यह हुनर लंबे समय तक व्यक्तिगत रुचि तक सीमित रहा। जब रिधिमा ने अपनी मां से महिलाओं को हस्तकला के माध्यम से रोजगार देने का विचार साझा किया, तो अर्चना ने भी इसे आगे बढ़ाने का निर्णय लिया। दोनों ने विचार किया कि ऐसे उत्पाद बनाए जाएं, जिनकी बाजार में मांग हो और जिन्हें तैयार करने के लिए महिलाएं अपने घरों में उपलब्ध समय का इस्तेमाल कर सकें। इस तरह मां का अनुभव और बेटी की सामाजिक सोच एक साथ आए। दोनों ने क्रोशे से फूल और गुलदस्ते बनाने के साथ हस्तनिर्मित कार्ड, कढ़ाई के सामान और अन्य सजावटी वस्तुओं पर काम शुरू किया। वर्ष 2024 में ‘कला की डोर’ की औपचारिक शुरुआत हुई। इसके बाद धीरे-धीरे अन्य महिलाओं को भी इस पहल से जोड़ा गया। आज अर्चना उत्पादों के डिजाइन और प्रशिक्षण पर ध्यान देती हैं, जबकि रिधिमा महिलाओं को जोड़ने, संचालन और दूसरे जरूरी कामों की जिम्मेदारी संभालती हैं। यह साझेदारी इस बात का उदाहरण है कि परिवार के भीतर मौजूद हुनर और अनुभव को यदि सही दिशा दी जाए, तो वह समाज के दूसरे लोगों के लिए भी अवसर पैदा कर सकता है।
30 से अधिक महिलाओं को मिला हुनर से कमाने का अवसर
‘कला की डोर’ से जुड़ी महिलाओं की उम्र लगभग 20 से 60 वर्ष के बीच है। इनमें गृहिणियां, विधवाएं और आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रही महिलाएं शामिल हैं। कई महिलाएं ऐसी हैं, जो परिवार और बच्चों की देखभाल के कारण नियमित रूप से बाहर जाकर नौकरी नहीं कर सकतीं। इन महिलाओं को उनकी रुचि और क्षमता के अनुसार हस्तकला का प्रशिक्षण दिया जाता है। जो महिलाएं पहले से क्रोशे या कढ़ाई का काम जानती हैं, वे अपने पुराने हुनर को बेहतर बनाती हैं, जबकि दूसरी महिलाएं प्रशिक्षण लेकर नया काम सीखती हैं। इस व्यवस्था में महिलाओं को आवश्यक सामग्री उनके घर तक पहुंचाने और तैयार उत्पादों को एकत्र करने की सुविधा दी जाती है। वे अपने घरेलू कामकाज के बीच समय निकालकर उत्पाद तैयार कर सकती हैं। जरूरत के अनुसार कुछ समय कार्यालय में आकर काम करने का विकल्प भी उपलब्ध है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि महिलाओं पर प्रतिदिन निश्चित संख्या में उत्पाद तैयार करने का दबाव नहीं बनाया जाता। वे अपनी क्षमता और उपलब्ध समय के अनुसार काम कर सकती हैं। इससे उन महिलाओं के लिए भी रोजगार का रास्ता खुलता है, जो पहले घरेलू जिम्मेदारियों के कारण नियमित काम नहीं कर पाती थीं।
पांच हजार से 15 हजार रुपये तक की आमदनी
इस पहल के माध्यम से महिलाओं को उनकी भागीदारी और उत्पादन के आधार पर भुगतान किया जाता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, महिलाएं हर महीने करीब पांच हजार से 15 हजार रुपये तक कमा सकती हैं। कुछ महिलाओं की आमदनी उनके काम की मात्रा के अनुसार इससे अधिक भी हो सकती है। यह राशि उन परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है, जहां आमदनी के सीमित साधन हैं। किसी महिला के लिए यह बच्चों की स्कूल फीस में योगदान देने का माध्यम है, तो किसी के लिए घरेलू जरूरतें पूरी करने और अपने छोटे-मोटे खर्चों के लिए दूसरों पर निर्भरता कम करने का अवसर। उत्पादों की कीमत निर्धारित करते समय कच्चे माल, कारीगर की मेहनत और जरूरी परिवहन खर्च को ध्यान में रखा जाता है। शुरुआती कीमत लगभग 50 रुपये से रखी गई है, जिससे अलग-अलग बजट वाले ग्राहक भी हस्तनिर्मित उत्पाद खरीद सकें। रिधिमा का उद्देश्य इस काम को केवल बिक्री तक सीमित रखना नहीं है। वह चाहती हैं कि उत्पाद तैयार करने वाली महिलाओं को उनकी मेहनत का उचित भुगतान मिले और इस काम से उन्हें सम्मानजनक आजीविका हासिल करने में मदद मिले।
आरती बाजपेयी ने पुराने हुनर को बनाया कमाई का साधन
‘कला की डोर’ से जुड़ी महिलाओं की कहानियां इस पहल के प्रभाव को समझने का अवसर देती हैं। 42 वर्षीय आरती बाजपेयी ने अपने जीवन का अधिकांश समय गृहिणी के रूप में बिताया। उन्हें पहले से क्रोशे का काम आता था और फूल बनाना विशेष रूप से पसंद था, लेकिन इस हुनर से नियमित आमदनी नहीं हो पाती थी। रिधिमा से मुलाकात के बाद आरती को इस पहल के बारे में जानकारी मिली। उन्होंने इसे अपने हुनर को आगे बढ़ाने और कमाई का माध्यम बनाने के अवसर के रूप में देखा। परिवार ने भी उनके निर्णय का समर्थन किया। आरती ने क्रोशे के फूल बनाने से शुरुआत की और धीरे-धीरे इस काम में अपनी भागीदारी बढ़ाई। अब उनकी कमाई बच्चों की शिक्षा और घर की जरूरतों को पूरा करने में योगदान देती है। आरती की कहानी उन अनेक महिलाओं का प्रतिनिधित्व करती है, जिनके पास हुनर तो होता है, लेकिन उसे रोजगार में बदलने के अवसर नहीं मिल पाते। सही मंच मिलने पर वही हुनर उनकी आर्थिक मजबूती का आधार बन सकता है।
कॉलेज की छात्रा अंशिका के लिए भी बना अवसर
इस पहल से जुड़ी 21 वर्षीय अंशिका कानपुर में बीकॉम की छात्रा हैं। उन्हें सोशल मीडिया के माध्यम से ‘कला की डोर’ के बारे में जानकारी मिली। शुरुआत में उनका उद्देश्य अपने निजी खर्चों के लिए अतिरिक्त आमदनी का साधन तलाशना था। अंशिका ने इस काम के बारे में जानकारी ली और प्रशिक्षण के जरिए क्रोशे बनाना सीखना शुरू किया। पहले उन्हें इस क्षेत्र में विशेष अनुभव नहीं था, लेकिन लगातार अभ्यास से उन्होंने धीरे-धीरे काम में दक्षता हासिल की। समय के साथ यह काम उनके लिए केवल अतिरिक्त कमाई का माध्यम नहीं रहा। अपनी मेहनत से पैसे कमाने, निजी जरूरतों को पूरा करने और परिवार के खर्चों में योगदान देने से उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा। अंशिका का उदाहरण यह भी बताता है कि ऐसी पहलें केवल गृहिणियों या आर्थिक संकट से जूझ रही महिलाओं तक सीमित नहीं हैं। छात्राओं और युवतियों के लिए भी यह अपने समय और कौशल का उपयोग कर आय अर्जित करने का एक विकल्प बन सकती हैं।
विधवा महिलाओं के लिए भी सहारा बनी पहल
आर्थिक संकट का सामना करने वाली विधवा महिलाओं के सामने परिवार की जिम्मेदारियां निभाने के साथ आजीविका का साधन जुटाने की चुनौती भी होती है। ‘कला की डोर’ से जुड़ी एक विधवा महिला की कहानी इसी वास्तविकता को सामने लाती है। रिधिमा के अनुसार, कठिन परिस्थितियों में इस पहल से जुड़ने के बाद महिला को काम के साथ आमदनी का अवसर मिला। इससे उन्हें घर के बुनियादी खर्चों को पूरा करने और अपनी बेटी की देखभाल करने में मदद मिली। ऐसे मामलों में आमदनी की राशि भले ही बहुत बड़ी न हो, लेकिन उसका महत्व परिवार की परिस्थितियों के हिसाब से काफी अधिक हो सकता है। अपनी मेहनत से कमाए गए पैसे महिलाओं को अपनी जरूरतों के लिए निर्णय लेने और परिवार की आर्थक जिम्मेदारियों में भागीदारी निभाने का अवसर देते हैं।
रोजगार के साथ आत्मविश्वास और जागरूकता पर भी जोर
‘कला की डोर’ की सोच केवल उत्पाद बनाने और बेचने तक सीमित नहीं है। इस पहल के माध्यम से महिलाओं को एक-दूसरे से जुड़ने, अनुभव साझा करने और नई चीजें सीखने का अवसर भी मिलता है। महिलाओं के बीच छोटी-छोटी बैठकें आयोजित करने और बुनियादी जागरूकता बढ़ाने पर भी ध्यान दिया जाता है। अपने नाम से हस्ताक्षर करना सीखने जैसी गतिविधियां महिलाओं को आत्मविश्वास बढ़ाने और दैनिक जीवन में अधिक सहज होने में मदद कर सकती हैं। अर्चना महिलाओं को उनकी सुविधा के अनुसार प्रशिक्षण देती हैं। उनका मानना है कि सही मार्गदर्शन और अभ्यास से महिलाएं हस्तकला सीख सकती हैं। जिन महिलाओं को पहले से क्रोशे या कढ़ाई का अनुभव है, वे अपने हुनर को बेहतर बना सकती हैं, जबकि नए लोग शुरुआत से सीख सकते हैं। इस प्रकार यह पहल रोजगार के साथ सीखने और आगे बढ़ने का अवसर भी उपलब्ध कराने का प्रयास करती है।
पर्यावरण के अनुकूल हस्तनिर्मित उत्पादों को बढ़ावा
हस्तकला के माध्यम से आजीविका उपलब्ध कराने के साथ ‘कला की डोर’ पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी को भी महत्व देती है। उत्पादों की पैकेजिंग में प्लास्टिक के इस्तेमाल से बचने और पुनः उपयोग किए जा सकने वाले उत्पादों को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाता है। क्रोशे से बनी वस्तुओं की खासियत यह है कि उनकी देखभाल और स्थिति के अनुसार धागों का दोबारा उपयोग करने या उन्हें नए डिजाइन में ढालने की संभावना रहती है। इसके साथ ही क्रोशे, कढ़ाई, शनील और स्ट्रिंग आर्ट जैसी हस्तकलाओं को आगे बढ़ाने पर ध्यान दिया जा रहा है। आज जब मशीन से बड़े पैमाने पर सामान तैयार किया जा सकता है, ऐसे में हाथ से बनी वस्तुओं की अलग पहचान कायम रखना एक चुनौती भी है। हस्तनिर्मित उत्पादों को तैयार करने में समय, धैर्य और कौशल लगता है। उनकी कीमत केवल कच्चे माल से नहीं, बल्कि कारीगर की मेहनत और रचनात्मकता से भी तय होती है।
हस्तनिर्मित वस्तुओं के पीछे छिपी मेहनत को समझने की जरूरत
अर्चना और रिधिमा के सामने एक बड़ी चुनौती ग्राहकों को हस्तनिर्मित उत्पादों की वास्तविक कीमत और महत्व समझाना भी है। कई बार ग्राहक कहते हैं कि ऐसा सामान वे स्वयं भी बना सकते हैं। लेकिन किसी वस्तु को तैयार करने के लिए आवश्यक समय, अभ्यास और मेहनत का मूल्य अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। क्रोशे से बना एक फूल देखने में छोटा हो सकता है, लेकिन उसे तैयार करने में कई टांकों और बारीकियों पर ध्यान देना पड़ता है। इसी तरह हाथ से बनाया गया ग्रीटिंग कार्ड केवल कागज और रंगों का मेल नहीं, बल्कि कारीगर की कल्पना और मेहनत का परिणाम होता है। ‘कला की डोर’ का प्रयास है कि ग्राहक हस्तनिर्मित वस्तुओं को खरीदते समय उनके पीछे काम करने वाली महिलाओं की मेहनत को भी महत्व दें। इससे कारीगरों को उचित मूल्य मिलने और उनकी आजीविका को मजबूत बनाने में मदद मिल सकती है।
नवरात्रि विशेष: नारी शक्ति को अवसर देना ही सच्चा सम्मान
नवरात्रि में मां दुर्गा की आराधना शक्ति और साहस का संदेश देती है। इस अवसर पर अर्चना गुप्ता और रिधिमा गुप्ता की पहल नारी शक्ति के एक ऐसे स्वरूप को सामने लाती है, जिसमें हुनर, मेहनत, संवेदनशीलता और आत्मनिर्भरता एक साथ दिखाई देते हैं। महिलाओं को सशक्त बनाने का अर्थ केवल उन्हें प्रोत्साहित करना नहीं, बल्कि उन्हें ऐसे अवसर उपलब्ध कराना भी है, जिनसे वे अपनी क्षमता का उपयोग कर सकें। जब किसी महिला को अपनी मेहनत से कमाने का अवसर मिलता है, तो उसका लाभ केवल उसे ही नहीं, बल्कि उसके परिवार और आसपास के समाज को भी मिलता है। कानपुर की इस मां-बेटी की जोड़ी ने हस्तकला को रोजगार से जोड़कर इसी दिशा में कदम बढ़ाया है। एक ओर अर्चना अपने वर्षों के अनुभव और हुनर को दूसरी महिलाओं तक पहुंचा रही हैं, तो दूसरी ओर रिधिमा उस हुनर के लिए बाजार और रोजगार की संभावनाएं तैयार करने में जुटी हैं। ‘कला की डोर’ की कहानी बताती है कि आत्मनिर्भरता की शुरुआत हमेशा बड़े संसाधनों से नहीं होती। कभी-कभी एक क्रोशे हुक, कुछ रंगीन धागे और समाज के लिए कुछ करने का संकल्प भी बदलाव की मजबूत नींव बन सकते हैं। नवरात्रि के इस विशेष अवसर पर यह पहल संदेश देती है कि जब महिलाओं को हुनर दिखाने, सीखने और कमाने का अवसर मिलता है, तो वे अपने साथ दूसरे परिवारों के जीवन में भी नई उम्मीद बुन सकती हैं।

