हिंदी सप्ताह में याद करें वह आवाज, जिसे ‘सरस्वती’ ने 1914 में जगह दी
राजेंद्र कुमार विशेष संवाददाता
वर्ल्ड खबर एक्सप्रेस/कानपुर-
14 सितंबर से शुरू होने वाला हिंदी सप्ताह केवल हिंदी के गौरव को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य की उस उदार परंपरा को समझने का भी समय है, जिसने अलग-अलग क्षेत्रों और भाषाई संस्कारों से आई आवाजों को अपने भीतर जगह दी। इसी परंपरा का एक महत्वपूर्ण प्रसंग 1914 में सामने आया, जब महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन में निकलने वाली सरस्वती पत्रिका में हीरा डोम की भोजपुरी कविता ‘अछूत की शिकायत’ प्रकाशित हुई। यह कविता आज भी हिंदी साहित्य के इतिहास में इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसमें एक ऐसे व्यक्ति की पीड़ा, मेहनत, आत्मसम्मान और मन की बात सीधे उसकी अपनी भाषा में सामने आती है, जिसकी आवाज उस समय साहित्य के मुख्य प्रवाह में बहुत कम सुनाई देती थी।
महावीर प्रसाद द्विवेदी हिंदी साहित्य के ऐसे संपादक थे जिन्होंने साहित्य को केवल कवियों और लेखकों की रचनाओं तक सीमित नहीं माना। उनके लिए साहित्य समाज और जीवन से जुड़ा विषय था। सरस्वती के माध्यम से उन्होंने भाषा, साहित्य, शिक्षा, समाज और संस्कृति से जुड़े अनेक विषयों को स्थान दिया। उनकी सबसे बड़ी विशेषताओं में एक उनकी संपादकीय सूझबूझ थी। वे यह समझते थे कि साहित्य की असली ताकत केवल बड़े नामों में नहीं, बल्कि जीवन के उन अनुभवों में भी होती है जिन्हें सामान्यतः अनदेखा कर दिया जाता है।
महावीर प्रसाद द्विवेदी ऐसे समय में सक्रिय थे जब समाज में जाति और छुआछूत की जड़ें बहुत गहरी थीं। ऐसे वातावरण में हीरा डोम की भोजपुरी कविता को सरस्वती जैसे प्रतिष्ठित साहित्यिक मंच पर स्थान मिलना एक महत्वपूर्ण साहित्यिक निर्णय था। द्विवेदी स्वयं छुआछूत के विरोधी विचार रखते थे। उनका संपादकीय दृष्टिकोण यह बताता है कि वे रचना को केवल रचनाकार की सामाजिक पहचान से नहीं, बल्कि उसकी साहित्यिक और मानवीय संवेदना से भी देखते थे। यही एक अच्छे संपादक की पहचान है कि वह समाज के भीतर से उठ रही ऐसी आवाज को पहचान सके, जिसमें समय की सच्चाई बोल रही हो।
हीरा डोम के जीवन के बारे में प्रमाणिक जानकारी बहुत कम उपलब्ध है। लेकिन उनकी कविता ने उन्हें साहित्य के इतिहास में एक स्थायी स्थान दिया। ‘अछूत की शिकायत’ भोजपुरी में लिखी गई कविता है। इसे हिंदी की आरंभिक दलित चेतना की महत्वपूर्ण कविताओं में गिना जाता है। इसे ‘पहली दलित कविता’ कहने को लेकर साहित्य में मतभेद भी रहे हैं, इसलिए इसे आरंभिक और महत्वपूर्ण रचना कहना अधिक उचित है।
कविता की शुरुआत ही अपने समय की पीड़ा को सीधे सामने रखती है—
“हमनी के रात-दिन दुखवा भोगत बानी,
हमनी के सहेबे से मिनती सुनाइब।
हमनी के दुख भगवनओं न देखताजे,
हमनी के कबले कलेसवा उठाइब।”
सरल अर्थ है—हम लोग दिन-रात दुख सह रहे हैं। बहुत सह लेने के बाद अपनी विनती कह रहे हैं। क्या भगवान को भी हमारा दुख दिखाई नहीं देता? हम आखिर कब तक यह कष्ट सहते रहें?
इन पंक्तियों में कोई कठिन भाषा नहीं है। एक आम आदमी अपने दुख को अपनी ही बोली में कह रहा है। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। कविता किसी दूर की कल्पना से नहीं, बल्कि जीवन के सीधे अनुभव से निकलती है। दुख इतना गहरा है कि वह शिकायत बनकर भगवान तक पहुंचता है।
कविता में हीरा डोम उन धार्मिक कथाओं को भी याद करते हैं जिनमें भगवान संकट में पड़े भक्तों की रक्षा करते हैं। वे प्रह्लाद, गजराज और द्रौपदी जैसे प्रसंगों का उल्लेख करते हुए पूछते हैं कि जब भगवान ने संकट में पड़े लोगों की सहायता की, तो उनकी पुकार क्यों नहीं सुनी जा रही—
“खम्भवा के फारि पहलाद के बंचवले जां,
ग्राह के मुंह से गजराज के बचवले।
धोती जुरजोधना कै भैया छोरत रहै,
परगट होकै तहां कपड़ा बढ़वले।”
इसका अर्थ है—भगवान ने प्रह्लाद को खंभा फाड़कर बचाया, गजराज को मगरमच्छ के मुंह से बचाया और द्रौपदी की लाज रखी। फिर हमारी पुकार क्यों नहीं सुनी जाती?
यहां कविता केवल शिकायत नहीं रह जाती। वह मनुष्य के भीतर चल रहे उस सवाल को सामने लाती है जिसमें आस्था भी है और अपने दुख का उत्तर पाने की बेचैनी भी। लगभग एक सदी पहले लिखी गई इन पंक्तियों में मनुष्य के मन की यह उलझन बहुत सहज रूप में दिखाई देती है।
कविता की एक बड़ी विशेषता यह है कि इसमें केवल पीड़ा नहीं है। इसमें मेहनत और श्रम के प्रति विश्वास भी दिखाई देता है। हीरा डोम अपने जीवन को मेहनत से जोड़ते हैं। उनके लिए श्रम मजबूरी भर नहीं, जीवन का आधार है। वह अपने परिवार को अपने परिश्रम से संभालने की बात करते हैं।
यही कारण है कि ‘अछूत की शिकायत’ केवल करुणा की कविता नहीं बनती। इसमें श्रम, आत्मसम्मान और अपने जीवन की सच्चाई को सामने रखने का साहस भी है। कवि किसी कल्पित दुनिया की बात नहीं करता। वह वही कहता है जो उसने अपने आसपास देखा और अपने जीवन में महसूस किया।
हीरा डोम की भाषा सीधे जीवन से निकलती है। उसमें बनावटीपन नहीं है। भोजपुरी की सहजता कविता को और अधिक प्रभावी बनाती है। उस समय हिंदी साहित्य में खड़ी बोली का प्रभाव बढ़ रहा था, लेकिन महावीर प्रसाद द्विवेदी ने भोजपुरी में लिखी इस रचना को सरस्वती में स्थान देकर यह दिखाया कि साहित्य की संवेदना किसी एक भाषा की सीमा में बंद नहीं होती। भाषा अलग हो सकती है, लेकिन मनुष्य का दुख, मेहनत, आशा और आत्मसम्मान सबको समझ में आ सकता है।
यहीं महावीर प्रसाद द्विवेदी की साहित्यिक दृष्टि विशेष रूप से दिखाई देती है। वे केवल भाषा को व्यवस्थित करने वाले संपादक नहीं थे। वे यह भी जानते थे कि समाज की अलग-अलग परतों में जीवन किस तरह घटित होता है। हीरा डोम की कविता को स्थान देना इसी दृष्टि का उदाहरण था। उन्होंने यह नहीं देखा कि कविता लिखने वाला व्यक्ति साहित्य की स्थापित दुनिया में कितना बड़ा नाम है। उन्होंने रचना के भीतर छिपे जीवन को देखा।
यह बात आज के साहित्य के लिए भी महत्वपूर्ण है। किसी रचना की शक्ति केवल उसके लेखक के परिचय से तय नहीं होती। कई बार किसी अनजान व्यक्ति की कुछ पंक्तियां पूरे समय का आईना बन जाती हैं। ‘अछूत की शिकायत’ के साथ भी यही हुआ। हीरा डोम का जीवन साहित्य के इतिहास में बहुत विस्तार से दर्ज नहीं है, लेकिन उनकी कविता ने उस समय के समाज के एक हिस्से की ऐसी तस्वीर सामने रख दी जिसे भुलाना आसान नहीं है।
हिंदी साहित्य का इतिहास लिखते समय अक्सर बड़े कवियों, बड़े आंदोलनों और प्रसिद्ध पुस्तकों की चर्चा होती है। लेकिन साहित्य की वास्तविक यात्रा में छोटी-छोटी आवाजों का भी बड़ा महत्व होता है। हीरा डोम की आवाज ऐसी ही आवाज है। यह आवाज भोजपुरी में उठी, लेकिन हिंदी साहित्य के इतिहास में दर्ज हुई। इसका कारण केवल कविता का विषय नहीं, बल्कि उसकी सच्चाई है।
यहां महावीर प्रसाद द्विवेदी की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। एक संपादक के सामने हर दिन अनेक रचनाएं आती हैं। उनमें से किसे प्रकाशित करना है, किसे पाठकों तक पहुंचाना है और किस रचना को समय की गवाही बनने देना है—यह संपादकीय निर्णय होता है। 1914 में सरस्वती में हीरा डोम की कविता का प्रकाशित होना इसी निर्णय का परिणाम था। यह उस समय की उनकी मानवीय संवेदना और साहित्यिक उदारता को सामने लाता है।
आज जब हिंदी सप्ताह मनाया जाता है, तब हिंदी की शक्ति को केवल उसके शब्दों, व्याकरण और साहित्यिक गौरव से नहीं, बल्कि उसकी व्यापकता से भी समझना चाहिए। हिंदी की शक्ति यह है कि वह अपने आसपास की बोलियों और भाषाओं से संवाद करती है। भोजपुरी, अवधी, ब्रज, बुंदेली, मैथिली और दूसरी भारतीय भाषाई परंपराओं ने हिंदी के संसार को लगातार समृद्ध किया है।
हीरा डोम की कविता इसका सुंदर उदाहरण है। कविता भोजपुरी में लिखी गई, लेकिन उसकी संवेदना किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रही। एक मेहनतकश व्यक्ति का दुख, सामाजिक उपेक्षा, मेहनत की कम कीमत और सम्मान की इच्छा—ये ऐसे अनुभव हैं जिन्हें समझने के लिए किसी विशेष भाषा की जरूरत नहीं पड़ती।
‘अछूत की शिकायत’ को आज पढ़ते हुए हमें केवल उस समय के दुख को नहीं देखना चाहिए। हमें यह भी देखना चाहिए कि साहित्य किस तरह समाज के भीतर से उठी आवाज को बचाकर रखता है। 1914 में लिखी गई कविता आज भी इसलिए पढ़ी जाती है क्योंकि उसमें मनुष्य अपने अस्तित्व और सम्मान की बात करता है।
इस कविता का महत्व इस बात में भी है कि इसमें कवि अपने लिए केवल दया नहीं मांगता। वह अपने श्रम का उल्लेख करता है, अपने दुख को सामने रखता है और सवाल पूछता है। वह चाहता है कि उसकी बात सुनी जाए। साहित्य की दृष्टि से यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है।
हिंदी सप्ताह के अवसर पर हीरा डोम को याद करना इसलिए भी जरूरी है कि हिंदी का इतिहास केवल मानक हिंदी का इतिहास नहीं है। यह उन तमाम बोलियों और आवाजों का इतिहास भी है जिन्होंने हिंदी की संवेदना को व्यापक बनाया। यदि 1914 में सरस्वती के पन्नों पर भोजपुरी की यह आवाज दर्ज नहीं होती, तो साहित्य का एक महत्वपूर्ण अनुभव शायद मुख्य धारा तक इतनी दूर नहीं पहुंच पाता।
महावीर प्रसाद द्विवेदी का योगदान इस संदर्भ में केवल एक कविता प्रकाशित करने तक सीमित नहीं देखा जाना चाहिए। यह उस संपादकीय सोच का उदाहरण है जिसमें साहित्य को समाज के बड़े हिस्से से जोड़कर देखा गया। वे समझते थे कि साहित्य का संसार जितना खुला होगा, उसकी संवेदना उतनी ही गहरी होगी।
भाषाएं एक-दूसरे को छोटा करके बड़ी नहीं होतीं। वे एक-दूसरे से जुड़कर बड़ी होती हैं। भोजपुरी में लिखी हीरा डोम की कविता का सरस्वती में स्थान पाना इसी साहित्यिक संवाद का उदाहरण है। यह हिंदी की उदार परंपरा की याद दिलाता है।
आज जब हम हिंदी सप्ताह में हिंदी की बात करते हैं तो हमें उन आवाजों को भी याद करना चाहिए जिन्होंने हिंदी साहित्य को अपने जीवन के अनुभवों से समृद्ध किया। हीरा डोम की आवाज उनमें एक महत्वपूर्ण आवाज है और महावीर प्रसाद द्विवेदी की संपादकीय दृष्टि उस आवाज को पाठकों तक पहुंचाने वाला वह माध्यम, जिसने समय की दूरी के बावजूद उसे आज तक जीवित रखा।
1914 में सरस्वती के पन्नों पर दर्ज हुई वह भोजपुरी आवाज आज भी हमें सुनाई देती है—
“हमनी के दुख भगवनओं न देखताजे,
हमनी के कबले कलेसवा उठाइब।”
इन दो पंक्तियों में एक पूरे समय का सवाल छिपा है। यही साहित्य की शक्ति है। वह बीते हुए समय को केवल इतिहास नहीं बनने देता, बल्कि उसकी धड़कन को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाता है।
हिंदी की असली ताकत उसकी दीवारों में नहीं, उसके खुले हुए दरवाजों में है। हीरा डोम की भोजपुरी कविता को सरस्वती में स्थान देकर महावीर प्रसाद द्विवेदी ने एक ऐसे दरवाजे को खुला रखा, जिससे होकर समाज के एक उपेक्षित हिस्से की आवाज साहित्य तक पहुंची। हिंदी सप्ताह में इस प्रसंग को याद करना हिंदी की उदार, मानवीय और व्यापक साहित्यिक परंपरा को याद करना भी है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)

