राजकीय मेडिकल कॉलेज उरई: विवादों के पीछे स्थानीय बनाम बाहरी की गोलबंदी और प्राचार्य के खिलाफ षड़यंत्र?
पीयूष त्रिपाठी
लखनऊ। राजकीय मेडिकल कॉलेज उरई पिछले कुछ समय से लगातार चर्चाओं में है। कभी तीमारदारों से मारपीट, कभी एमबीबीएस छात्रों में रैगिंग का मामला, तो कभी डॉक्टरों की कमी को लेकर गंभीर सवाल। देखने पर लगता है कि कुछ तो गड़बड़ है, लेकिन इन गड़बड़ियों के पीछे की असली कहानी कहीं और ही इशारा करती है। कॉलेज सूत्रों के अनुसार, कॉलेज में चल रहे विवादों के पीछे स्थानीय बनाम बाहरी की गोलबंदी एक बड़ा कारण है। प्राचार्य व जिम्मेदारों के खिलाफ षड्यंत्रः आरोप है कि कुछ लोग संगठित होकर प्राचार्य और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ माहौल बना रहे हैं। उद्देश्य है – दबाव बनाना, अपनी हनक दिखाना और नियमों को दरकिनार कर मुफ्त सुविधाएं या अनुचित लाभ लेना। कॉलेज को बदनाम करने की साजिशः कॉलेज की छवि को किसी भी तरह बदनाम कर उसे लगातार विवादों में बनाए रखने की कोशिश की जा रही है। रैगिंग जैसी घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना या वीडियो वायरल करना भी इसी कड़ी का हिस्सा हो सकता है, ताकि प्रशासन पर दबाव बने। मेडिकल माफिया और जातीय लॉबी की मिलीभगतः सबसे गंभीर आरोप यह है कि इन साजिशों में सत्तापक्ष से जुड़े कुछ लोग, मेडिकल माफिया और जातीय टोलियों की मिलीभगत चल रही है। ये गठजोड़ चाहते हैं कि कॉलेज में उनका वर्चस्व बना रहे और ट्रांसफर-पोस्टिंग, ठेके, दवाओं की सप्लाई और अन्य सुविधाओं पर उनका नियंत्रण रहे। जालौन में 7 एमबीबीएस छात्रों के निलंबन का मामला भी इसी नजरिये से देखा जा रहा है। एक पक्ष का कहना है कि रैगिंग हुई ही नहीं, बल्कि जूनियर-सिनियर के बीच के सामान्य विवाद को जानबूझकर रैगिंग का रंग देकर तूल दिया गया, ताकि कॉलेज प्रशासन को कटघरे में खड़ा किया जा सके। वहीं दूसरा पक्ष इसे गंभीर अनुशासनहीनता बता रहा है। फिलहाल सच्चाई जांच के बाद ही सामने आएगी, लेकिन यह तय है कि राजकीय मेडिकल कॉलेज उरई अब सिर्फ एक मेडिकल संस्थान नहीं, बल्कि स्थानीय राजनीति, वर्चस्व की लड़ाई और माफिया के दखल का अखाड़ा बनता जा रहा है। इस पूरे मामले में डीजीएमई स्तर से निष्पक्ष जांच जरूरी है, ताकि पता चल सके कि वास्तव में गड़बड़ी है या गड़बड़ी दिखाकर कुछ लोग अपना हित साध रहे हैं। नियम हैं, एंटी-रैगिंग कमेटी है, हेल्पलाइन नंबर है, सुप्रीम कोर्ट के आदेश हैं, एनएमसी की गाइडलाइन है… फिर भी उत्तर प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों के हॉस्टल के बंद कमरों में जूनियर्स की चीखें बंद नहीं हो रही हैं। ताजा मामला जालौन के राजकीय मेडिकल कॉलेज, उरई का है, जिसने पूरे प्रदेश के मेडिकल एजुकेशन सिस्टम पर सवाल खड़ा कर दिया है। अक्टूबर 2026 में सोशल मीडिया पर दो वीडियो वायरल हुए। वीडियो में सीनियर एमबीबीएस छात्र (बैच 2023-24) कथित तौर पर जूनियर छात्रों (2025 बैच) को एक कमरे में बंद करके गाली-गलौज करते, मुर्गा बनाते और अश्लील टास्क करने को मजबूर करते दिखे। पीड़ित छात्रों का आरोप थारूरात 11 बजे के बाद हॉस्टल में बुलाया जाता था- ‘‘इंट्रो’’ के नाम पर घंटों तक प्रताड़ित किया जाता था। विरोध करने पर कहा जाता – ‘‘शिकायत की तो प्रैक्टिकल में फेल करा देंगे, हॉस्टल से निकलवा देंगे।’’ वीडियो वायरल होने के बाद कॉलेज के प्राचार्य डॉ त्रिवेदी ने आनन-फानन में एंटी-रैगिंग कमेटी की बैठक बुलाई। जांच में प्रथम दृष्टया 7 छात्रों को दोषी मानते हुए तत्काल प्रभाव से हॉस्टल से निलंबन और 6 महीने के लिए शैक्षणिक गतिविधियों से निलंबन की कार्रवाई की गई है। कॉलेज प्रशासन ने मामले की रिपोर्ट एनएमसी और डीजीएमई को भेज दी है।यह अकेली घटना नहीं है। पिछले 12 महीनों में यूपी के मेडिकल कॉलेजों में रैगिंग के मामले बढ़े हैं। अगस्त 2026 – कानपुर जीएसवीएम मेडिकल कॉलेजः ’सीनियर्स ने जूनियर से हॉस्टल की टॉयलेट साफ करवाई, 5 छात्र सस्पेंड। जुलाई 2026 – मेरठ मेडिकल कॉलेजः जूनियर को रात भर जगाकर रखा, मानसिक प्रताड़ना की शिकायत पर एफआईआर दर्ज। 2025 – प्रयागराज एमएलएन मेडिकल कॉलेजः एक प्रथम वर्ष के छात्र ने रैगिंग से तंग आकर पढ़ाई छोड़ने की अर्जी दी थी। हर मेडिकल कॉलेज में एंटी-रैगिंग कमेटी, एंटी-रैगिंग स्क्वॉड और मेंटरिंग सेल होना अनिवार्य है। 24 घंटे हेल्पलाइन, दोषी पाए जाने पर – एफआईआर, 1 से 4 साल तक निलंबन, डिग्री रोकना, हॉस्टल से निष्कासन और आपराधिक मुकदमा। जालौन के पीड़ितों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, ‘‘हमने पहले वार्डन से कहा, उन्होंने ही सीनियर्स को बता दिया कि किसने शिकायत की।’’ अधिकांश कॉलेजों में शिकायत पेटी तो है, लेकिन शिकायत सीधे प्राचार्य तक नहीं पहुंचती। एमबीबीएस में प्रैक्टिकल, वाइवा और हॉस्टल एलॉटमेंट में सीनियर्स का दबदबा होता है। फेल करने की धमकी सबसे बड़ा हथियार है। जांच में लीपापोतीः कई कॉलेज कार्रवाई के नाम पर सिर्फ चेतावनी देकर छोड़ देते हैं ताकि कॉलेज की बदनामी न हो और एनएमसी की मान्यता पर आंच न आए। ‘‘रैगिंग सिर्फ मस्ती नहीं, यह सत्ता का प्रदर्शन है। जो छात्र खुद कभी प्रताड़ित हुआ है, वही अगले साल प्रताड़ित करता है। इसे रोकने के लिए हॉस्टल में सीसीटीवी, प्रथम वर्ष के लिए अलग हॉस्टल ब्लॉक और हर महीने गुमनाम फीडबैक अनिवार्य होना चाहिए। डीजीएमई, यूपी ने सभी 35 सरकारी और 31 निजी मेडिकल कॉलेजों को 7 दिन में अपनी एंटी-रैगिंग कमेटी की रिपोर्ट और सीसीटीवी फुटेज का स्टेटस भेजने का आदेश दिया है। लेकिन बड़ा सवाल वही है जो इस रिपोर्ट की शुरुआत में था – क्या यूपी के मेडिकल कॉलेजों में एंटी-रैगिंग नियम सिर्फ दीवार पर लगे पोस्टर बनकर रह जाएंगे, या जालौन की घटना के बाद सच में जूनियर को सुरक्षित माहौल मिलेगा?


