दिवाली पूजा की कथा के बिना अधूरा माना जाता है लक्ष्मी पूजन, जानें साहूकार की बेटी और मां लक्ष्मी की पौराणिक कथा
नई दिल्ली। दीपावली का त्योहार हिंदू धर्म में सुख, समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। कार्तिक मास की अमावस्या को मनाए जाने वाले इस पर्व पर घरों और प्रतिष्ठानों को दीपों, रंगोली और रोशनी से सजाया जाता है। इस दिन मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दिवाली पर लक्ष्मी पूजन के साथ कथा का पाठ करना भी विशेष महत्व रखता है। मान्यता है कि कथा सुनने और पढ़ने से पूजा का पुण्य फल प्राप्त होता है तथा घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन मां लक्ष्मी समुद्र मंथन से प्रकट हुई थीं। इसके अलावा भगवान राम रावण का वध करने के बाद माता सीता और लक्ष्मण सहित अयोध्या लौटे थे। उनके स्वागत में अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर पूरे नगर को रोशन किया था। दिवाली से जुड़ी एक प्रचलित कथा साहूकार की बेटी और मां लक्ष्मी से संबंधित है। कथा के अनुसार, एक नगर में एक साहूकार रहता था। उसकी बेटी ने देखा कि एक पीपल के पेड़ से मां लक्ष्मी प्रकट होती हैं। एक दिन मां लक्ष्मी ने प्रसन्न होकर साहूकार की बेटी को अपनी सहेली बनने का प्रस्ताव दिया। लड़की ने पहले माता-पिता से अनुमति लेने की बात कही। उनकी आज्ञा मिलने के बाद वह मां लक्ष्मी की सहेली बन गई। एक दिन मां लक्ष्मी ने उसे अपने घर भोजन पर बुलाया। वहां सोने-चांदी के बर्तनों में भोजन कराया और बहुमूल्य वस्त्र भेंट किए। जाते समय उन्होंने अगले दिन साहूकार के घर भोजन करने आने की बात कही। यह सुनकर लड़की के माता-पिता खुश हुए, लेकिन बेटी चिंतित हो गई। उसे लगा कि वह मां लक्ष्मी के वैभव के अनुसार उनका स्वागत कैसे कर पाएगी। पिता ने उसे समझाया कि श्रद्धा और प्रेम से रूखा-सूखा भोजन भी परोस दिया जाए तो पर्याप्त है। इसी बीच एक चील रानी का नौलखा हार वहां गिरा गई। लड़की ने हार को संभालकर रख लिया। अगले दिन मां लक्ष्मी और भगवान गणेश उसके घर पहुंचे। लड़की ने उन्हें सोने की चौकी पर बैठने का आग्रह किया। काफी अनुरोध के बाद दोनों ने प्रेमपूर्वक भोजन स्वीकार किया। उनकी कृपा से साहूकार का घर सुख-संपत्ति से भर गया। इस कथा के अंत में मां लक्ष्मी से सभी के घरों में सुख, शांति और समृद्धि बनाए रखने की प्रार्थना की जाती है।
दिवाली पर मां लक्ष्मी और गणेश पूजन का महत्व
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दीपावली पर मां लक्ष्मी के साथ भगवान गणेश की पूजा करने की विशेष परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां लक्ष्मी धन, वैभव और समृद्धि प्रदान करती हैं, जबकि भगवान गणेश को बुद्धि, विवेक और विघ्नहर्ता के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि दोनों की एक साथ आराधना करने से जीवन में सुख-समृद्धि और शुभता आती है। यही कारण है कि दिवाली की शाम घरों और प्रतिष्ठानों में लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमा स्थापित कर विधि-विधान से पूजन किया जाता है।
श्रद्धा और प्रेम से प्रसन्न होती हैं मां लक्ष्मी
साहूकार की बेटी से जुड़ी इस कथा का मुख्य संदेश है कि ईश्वर की आराधना में धन-दौलत से अधिक श्रद्धा और सच्चे मन का महत्व होता है। लड़की के पास मां लक्ष्मी के स्वागत के लिए उनके वैभव के अनुरूप साधन नहीं थे, लेकिन उसके मन में प्रेम और सम्मान की भावना थी। पिता ने भी उसे अपनी सामर्थ्य के अनुसार अतिथियों का सत्कार करने की सलाह दी। कथा के अनुसार, मां लक्ष्मी और भगवान गणेश ने उसके प्रेमपूर्वक किए गए आतिथ्य को स्वीकार किया और परिवार को सुख-संपत्ति का आशीर्वाद दिया।
दीपावली से जुड़ी हैं कई पौराणिक मान्यताएं
दीपावली को लेकर कई धार्मिक और पौराणिक मान्यताएं प्रचलित हैं। मान्यता है कि कार्तिक अमावस्या के दिन मां लक्ष्मी समुद्र मंथन से प्रकट हुई थीं। इसी दिन भगवान राम 14 वर्ष का वनवास पूरा कर रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद अयोध्या लौटे थे। उनके स्वागत में नगरवासियों ने दीप जलाए थे। इसके अलावा भगवान विष्णु के वामन अवतार और राजा बलि से जुड़ी कथा भी दीपावली के धार्मिक महत्व को दर्शाती है।


