सड़क से आश्रम तक—असहायों को घर, सम्मान और अपनापन दे रहीं उमा शुक्ला द्विवेदी

सड़क से आश्रम तक—असहायों को घर, सम्मान और अपनापन दे रहीं उमा शुक्ला द्विवेदी

नवरात्रि में देवी उपासना के बीच कानपुर की एक ऐसी नारी शक्ति की कहानी, जिन्होंने बेसहारा लोगों में देखा ईश्वर का स्वरूप

ब्लड कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझने के बाद भी नहीं डिगा सेवा का संकल्प, 2018 से जनसहयोग के सहारे संचालित कर रहीं अपना घर आश्रम

कानपुर। नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना हो रही है। मंदिरों में घंटे-घड़ियाल गूंज रहे हैं, घरों में पूजा-अर्चना हो रही है और कन्या पूजन के जरिए नारी शक्ति के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जा रही है। लेकिन इसी आस्था के बीच कानपुर की एक महिला ऐसी भी हैं, जिन्होंने अपनी जिंदगी असहायों की सेवा को समर्पित कर दिया है। सड़क किनारे बेसहारा पड़े लोगों को सहारा देना, उनके घावों पर मरहम लगाना और उन्हें सम्मान के साथ जीवन जीने का अवसर देना ही उनके जीवन का उद्देश्य बन गया है। यह कहानी है अपना घर आश्रम, नौबस्ता, गल्ला मंडी, कानपुर नगर की अध्यक्ष उमा शुक्ला द्विवेदी की, जो जरूरतमंदों और निराश्रितों की सेवा में जुटी हैं।

नवरात्रि में नारी शक्ति की जीवंत मिसाल

भारतीय सनातन परंपरा में शक्ति की उपासना का विशेष महत्व है। मां दुर्गा को करुणा, साहस और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि के दौरान हम देवी के विभिन्न स्वरूपों की आराधना करते हैं, लेकिन इस पर्व का संदेश केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। जरूरतमंदों की सहायता करना, पीड़ितों के प्रति संवेदना रखना और असहाय लोगों को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर देना भी इसी मानवीय भावना का हिस्सा है।

उमा शुक्ला द्विवेदी का जीवन इसी सेवा भाव की मिसाल है। वे उन लोगों के लिए सहारा बनी हैं, जिन्हें अक्सर समाज की उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। उनके लिए सेवा किसी पर उपकार नहीं, बल्कि मानवता के प्रति अपना दायित्व निभाने का माध्यम है।

शिक्षा को बनाया समाज सेवा का आधार

उमा शुक्ला द्विवेदी ने वर्ष 2005 में समाजशास्त्र विषय से एमए की उपाधि प्राप्त की। इसके साथ ही उन्होंने ग्रामीण विकास में डिप्लोमा भी हासिल किया। उनकी शिक्षा ने उन्हें समाज की समस्याओं, सामाजिक असमानताओं और जरूरतमंद लोगों की परिस्थितियों को समझने का दृष्टिकोण दिया।

वर्ष 2005 से ही उन्होंने नौबस्ता और आसपास के क्षेत्रों में असहाय, भूखे और बीमार लोगों की मदद करना शुरू कर दिया था। शुरुआत छोटे-छोटे प्रयासों से हुई, लेकिन धीरे-धीरे यही सेवा उनके जीवन का प्रमुख उद्देश्य बन गई। उन्होंने जरूरतमंद लोगों की सहायता को केवल व्यक्तिगत संवेदना तक सीमित न रखकर इसे व्यवस्थित रूप देने का संकल्प लिया।

ब्लड कैंसर भी नहीं तोड़ सका सेवा का संकल्प

सेवा की इस राह में उमा शुक्ला द्विवेदी को वर्ष 2013 में कठिन दौर से गुजरना पड़ा, जब उन्हें ब्लड कैंसर होने की जानकारी मिली। बीमारी के उपचार के लिए उन्हें मुंबई जाना पड़ा। इलाज की कठिनाइयों और शारीरिक पीड़ा के बीच भी असहाय लोगों के प्रति उनकी संवेदना बनी रही। यह दौर उनके जीवन की बड़ी परीक्षा था। लेकिन बीमारी से संघर्ष करते हुए भी उन्होंने सेवा के अपने उद्देश्य को नहीं छोड़ा। उपचार के बाद वापस लौटकर उन्होंने फिर से जरूरतमंदों की मदद का काम जारी रखा। उनकी जीवन यात्रा यह संदेश देती है कि सेवा का संकल्प परिस्थितियों से बड़ा हो सकता है और दूसरों के दर्द को समझने वाला हृदय कठिन समय में भी मानवता का साथ नहीं छोड़ता।

लावारिस नहीं, ‘प्रभुजन’ हैं उनके लिए असहाय लोग

उमा शुक्ला द्विवेदी की सेवा की सबसे खास बात उनका दृष्टिकोण है। वे निराश्रित, बीमार और बेसहारा लोगों को ‘प्रभुजन’ कहकर संबोधित करती हैं। उनके लिए ये लोग केवल सहायता के पात्र नहीं, बल्कि ईश्वर के ऐसे स्वरूप हैं, जिनकी सेवा करना सौभाग्य की बात है। उनका कहना है, “मैं भाग्यशाली हूं कि ईश्वर ने मुझे अपने इन रूपों की सेवा का अवसर दिया।” यही भाव उन्हें जरूरतमंदों की सेवा के लिए प्रेरित करता है। जहां कई लोग असहायों की परेशानियों को देखकर आगे बढ़ जाते हैं, वहीं वे उनकी देखभाल, उपचार और सम्मानजनक जीवन की व्यवस्था करने का प्रयास करती हैं।

2018 में स्थापित हुआ ‘अपना घर आश्रम’

  • वर्षों से चल रही व्यक्तिगत सेवा को स्थायी रूप देने के उद्देश्य से वर्ष 2018 में कानपुर के नौबस्ता, गल्ला मंडी में अपना घर आश्रम की स्थापना की गई। यह आश्रम उन लोगों के लिए सहारा बना, जिनके पास रहने के लिए सुरक्षित स्थान नहीं था या जिन्हें बीमारी और असहायता के कारण दूसरों की मदद की जरूरत थी।
  • आश्रम में रहने वाले लोगों को भोजन, वस्त्र और देखभाल उपलब्ध कराने के साथ उनकी स्वच्छता और स्वास्थ्य का भी ध्यान रखा जाता है। जरूरत के अनुसार उनके उपचार की व्यवस्था की जाती है। मानसिक रूप से अस्वस्थ लोगों की देखभाल और उन्हें बेहतर स्थिति में लाने का प्रयास भी सेवा कार्य का हिस्सा है।
  • आश्रम का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य उन लोगों को उनके परिवारों तक वापस पहुंचाना भी है, जो परिस्थितियों के कारण अपनों से बिछड़ गए हैं। जब कोई व्यक्ति स्वस्थ होने के बाद अपने घर-पते या परिजनों के बारे में जानकारी देने की स्थिति में आता है, तो उसके परिवार से संपर्क कर पुनर्मिलन का प्रयास किया जाता है।

सरकारी आर्थिक अनुदान नहीं, जनसहयोग से चल रही सेवा

अपना घर आश्रम की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इसका संचालन सरकारी आर्थिक अनुदान के बजाय जनसहयोग और दानदाताओं की मदद से किया जाता है। समाज के संवेदनशील लोग राशन, दवाइयां, कपड़े और आर्थिक सहयोग देकर इस सेवा कार्य में भागीदारी निभाते हैं। कोई अपने जन्मदिन पर भोजन की व्यवस्था करता है, तो कोई अपने परिजनों की स्मृति में जरूरतमंदों की मदद करता है। इस तरह समाज के अलग-अलग लोगों का सहयोग आश्रम की गतिविधियों को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाता है। उमा शुक्ला द्विवेदी का प्रयास यह भी दर्शाता है कि सामाजिक सेवा केवल किसी एक व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामूहिक संवेदनशीलता और सहयोग से आगे बढ़ने वाला कार्य है।

नवरात्रि का संदेश—पूजा के साथ सेवा भी

नवरात्रि हमें शक्ति, करुणा और सकारात्मकता का संदेश देती है। मां दुर्गा की आराधना के इस पर्व पर उमा शुक्ला द्विवेदी की कहानी समाज को यह सोचने का अवसर देती है कि आस्था का वास्तविक अर्थ दूसरों के प्रति संवेदनशील होने में भी निहित है। सड़क किनारे कोई भूखा, बीमार या बेसहारा व्यक्ति दिखाई दे तो उसकी उपेक्षा करने के बजाय उसकी मदद के लिए आगे आना, उचित सहायता उपलब्ध कराना या संबंधित सेवा संस्था तक सूचना पहुंचाना किसी जरूरतमंद के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकता है। उमा शुक्ला द्विवेदी का जीवन इसी भावना को सामने लाता है। उन्होंने अपनी शिक्षा, व्यक्तिगत संघर्ष और सेवा के अनुभवों को जरूरतमंद लोगों की सहायता से जोड़ने का प्रयास किया है। इस नवरात्रि, जब देशभर में मां शक्ति की आराधना हो रही है, तब कानपुर की उमा शुक्ला द्विवेदी की सेवा यात्रा याद दिलाती है कि करुणा, ममता और परोपकार भी शक्ति के महत्वपूर्ण स्वरूप हैं। अपना घर आश्रम के माध्यम से उनका प्रयास मानवता और सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश देता है—क्योंकि किसी असहाय को सहारा देना केवल मदद नहीं, बल्कि उसके सम्मान और जीवन के अधिकार को स्वीकार करना भी है।

नर सेवा ही नारायण सेवा—यही है नवरात्रि की आस्था को जीवन में उतारने का एक सार्थक मार्ग।

Pankaj

worldkhabarexpress.com

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