भाभा के सहयोग से परमाणु खतरों से बचाएगा कानपुर आईआईटी

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कानपुर, 28 नवम्बर । जापान के नागासाकी और हिरोशिमा शहर की बर्बादी को लगभग पूरे विश्व के लोग जानते होंगे। लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी धमक जमाने के लिए विश्व के लगभग सभी देशों में परमाणु ऊर्जा पर काम करने होड़ मची हुई है। पर इसके खतरों से निपटने के लिए शायद कुछ ही देश गंभीर है। जिसके चलते अब कानपुर आईआईटी भाभा के सहयोग से परमाणु खतरों से निपटने के लिए काम शुरू कर दिया है। यहां पर देश का पहला परमाणु सुरक्षा शोध केन्द्र बनेगा। 

आईआईटी कानपुर वैश्विक स्तर पर परमाणु खतरों से बचाने के प्रयास तेज कर दिये हैं। रेडियोएक्टिव तरंगों की तबाही से बचाने के लिए आईआईटी कानपुर ने भाभा एटामिक रिसर्च सेंटर (बीएआरसी) के साथ मिलकर काम शुरू कर दिया है। यह देश का पहला ऐसा केंद्र होगा जहां-जहां परमाणु दुर्घटना को रोकने और उससे होने वाले खतरे को कम करने पर शोध होगा। आईआईटी में परमाणु खतरों से बचाने के उपाय के लिए शोध केंद्र का भवन तैयार हो गया है। प्रस्तावित केंद्र जून 2018 से काम करने लगेगा। आईआईटी, बीएआरसी के विशेषज्ञ और शोध छात्रों ने काम भी शुरू कर दिया है। 
परियोजना के मुख्य अनुसंधानकर्ता व आईआईटी के प्रो. एस.एन. त्रिपाठी ने बताया कि इस शोध का नाम नेशनल एरोसोल फैकल्टी रखा गया है। इसमें बोर्ड ऑफ न्यूक्लियर साइंस रिसर्च के विशेषज्ञ भी कार्य करेंगे। बीएआरसी के मुख्य कैलोबेटर डॉ. बीके सप्रा ने बताया कि केंद्र में शोध के लिए आवश्यक उपकरण लगा दिए गए हैं। डा. सप्रा के मुताबिक परमाणु ऊर्जा का दायरा बढ़ रहा है तो रिएक्टर की सुरक्षा और संभावित खतरों से निपटने की तैयारी जरूरी है। 
चीन जापान व कोरिया भी कर रहें काम
डा. सप्रा ने बताया कि परमाणु खतरों से निपटने के लिए दक्षिण कोरिया, जापान और चीन भी काम कर रहें है। लेकिन वहां पर इस तरह का काम सरकारों की देखरेख में हो रहा है। तो वहीं यहां पर जो काम होगा शैक्षिक संस्थान के रूप में होगा। बताया कि परमाणु रिएक्टर दुर्घटना में सबसे बड़ा खतरा निकलने वाली रेडियोएक्टिव किरणों से होता है। ये किरणें काफी दूर और लंबे समय तक वातावरण, मानव जीवन समेत सभी पशु-पक्षी को नुकसान पहुंचा सकती हैं। 

जिसका जीता जागता उदाहरण जापान के नागासाकी और हिरोशिमा शहर हैं। जहां पर आज भी विकलांग बच्चे पैदा हो रहें है। इस बात पर शोध किया जाएगा कि यदि कभी आपात स्थिति बनी तो रिएक्टर से ही रेडियोएक्टिव किरणें न निकलने दी जाएं। इसकी व्यवस्था डिजाइन के समय ही रिएक्टर में करनी होगी। 

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