कानपुर : परमात्मा के कानून से कोई नहीं बच सकता है, देवकी नन्दन 

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कानपुर, 24 अक्टूबर। परम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में मंगलवार को तीसरे दिन जिला कारागार में श्रीमद् भागवत कथा के अन्तर्गत प्रवचन दिया। कैदियों के लिए विशेष रूप से यह आयोजन जेलर आशीष तिवारी द्वारा कराया गया। महाराज का स्वागत जेलर ने किया। 

जेल में मौजूद सभी कैदियों को सन्देश देते हुए महाराज ने कहा, कि हम जो भी कर्म करते हैं उसका फल मिलना निश्चित है। कर्म अच्छा हो या बुरा फल उसी पर निर्भर करता है। मानव अपने जीवन में जिन परिस्थियों का सामना करता है वो उसके द्वारा किये गए कर्मों का ही फल होता है। 
यदि मनुष्य निश्चित कर ले की उसको अपना जीवन बदलना है तो वो कभी भी, किसी भी समय अपना जीवन बदल सकता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण स्वयं वाल्मीकि जी है। वाल्मीकि जी पहले डाकू थे और जंगल में आने-जाने वालों को लूटकर उन्हें मार देता था। एक बार नारद जी भेष बदलकर उनके पास गए और उनसे पुछा की आप जो पाप कर रहे हैं तो क्या उस पाप में क्या आपके परिवार के सदस्य भी शामिल है तो वाल्मीकि जी ने कहा हां वो भी शामिल है। नारद जी ने कहा जाओ और उनसे पूछो की वो तुम्हारे पाप में भागीदार है की नहीं? जब वाल्मीकि जी ने घर जाकर पूछा की क्या तुम मेरे पाप में भागीदार हो तो परिवार के सभी सदस्यों ने मना कर दिया। उसके बाद से वाल्मीकि जी ने सभी गलत काम त्याग कर भगवान की भक्ति में अपना जीवन समर्पित कर दिया। इसके बाद महाराज श्री ने कहा कि जो भी पाप तुमने किये है उसको स्वयं तुमने झेलना है। यहाँ मौजूद ज्यादातर ने जो भी अपराध किये होंगे वो अपने परिवार की खुशियों के लिए किये होंगे, लेकिन क्या आपके ऐसा करने से आपका परिवार खुश है नहीं है और कभी नहीं हो सकता है। इसीलिए आप सभी यहाँ से निकलने के बाद एक अच्छे नागरिक का जीवन जीना और अपने जीवन को प्रभु की भक्ति में लगाना।                       
उसके उपरांत महाराज श्री ने कहा कि इस संसार में प्रसन्न कौन है क्या धनवान प्रसन्न है? आज के इस संसार में न तो पदवान, न ही संतानवान, बलवान और न ही रूपवान इस संसार में प्रसन्न है। सभी दुखी है सुख कहाँ विद्यमान है? सुख वहॉ है जहॉ आप और हम अपनी इच्छाओं को दमन करते है हमारा सुख हमारे संतोष में है। 
जिस दिन आपकी सोच में यह विचार आ जायेगा कि मुझे जितना परमात्मा से मिला है, मैं उसमें खुश हूॅ। जब तक आप में संतोष नही है आप दुखी ही रहेंगे। हमारी इच्छायें कभी समाप्त नहीं हो सकती क्योकि हमारी इच्छाये अनंत है ये कभी पूरी नही हो सकती। भगवान ने तुम्हें जो दिया है उसे ही पाकर खुश रहना चाहिए। तुम दूसरो को दुख दोगे तो तुम्हें भी दुख की प्राप्ति होगी, तुम दूसरो से ईर्ष्या करोगे तो तुमको भी ईर्ष्या ही मिलेगी। तुम सुख दोगे तो तुम्हें भी सुख की प्राप्ति होगी। 

तुम्हारे भाग्य के दुख को तो तुम्हारे परिवार के सदस्य भी नहीं बॉटेंगे।
महाराज श्री ने कहा कि लोग कहते हैं की जेल में बस गरीब जाते हैं अमीर को सजा नहीं मिलती है। यहां मैं आप सभी को बता दूं की आप सभी बहुत भाग्यशाली हैं क्योंकि आप अपनी सजा यही पर काट कर जा रहें हैं और जो लोग ये सोच रहें हैं की हमें जेल नहीं हुई है वो खुश ना हो क्योंकि उनकी सजा परमात्मा की जेल में होनी निश्चित है। परमात्मा के कानून से कोई नहीं बच सकता है अगर आपने बुरा कर्म किया है तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको परमात्मा की सजा से नहीं बचा सकती है।
आज कथा के तृतीय दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने सर्वप्रथम भक्तिमय गीत से समां बांध दिया। भक्तिं में 
1- ’मेरे पाप है ज्यादा पुन्न है कम…’
’श्री राधे बसा लो वृंदावन…’
2- ’राधे कृष्ण राधे कृष्ण’
 ’कृष्णा कृष्णा राधे राधे’ का मंत्र उच्चारण कर आया
3- ’जहां ले चलोगे वहीं मैं चलूंगा जहां नाथ रख दो वहीं मैं रहूंगा’

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