कानपुर :प्रभु के स्मरण से दूर होते हैं दुःख : देवकी नंदन ठाकुर 

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कानपुर, 25 अक्टूबर । श्रीमद् भागवत कथा के चौथे दिन पं0 देवनी नंदन ठाकुर महाराज ने सर्व प्रथम विश्व शांति के लिए प्रार्थना की। तत्पश्चात महाराज जी ने बताया कि हम शांति के लिए संसार में इधर-उधर भटकते है लेकिन शांति नहीं मिलती। क्योंकि हम अपने मन को शांत नहीं करते है। इसलिए सबसे पहले अपना चित शांत करना होगा तभी हमें संसार में हर जगह शांति का अनुभव होगा। कहा, जब संसार बिगड़ता है तो केवल राधा-रानी ही बिगड़ी बनाती है। 

महाराज जी ने बताया कि कार्तिक माह चल रहा है और कार्तिक माह में गज-ग्राह की कथा सुननी चाहिए। क्योंकि गज का अर्थ भक्त है और ग्रह का अर्थ है दुखी। बताया, इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति को कोई न दुःख अवश्य होता है तब हम भगवान को याद करते है। अगर सुख में प्रभु का स्मरण करें तो निश्चित है कि दुःख आएंगे ही नहीं। परन्तु व्यक्ति सुख के समय अहंकार करता है।

 आज-कल तो नौजवान माथे पर तिलक नहीं लगाए, कलावा नहीं बंधेगे, कंठी नहीं पहनेंगे क्यांकि वो समझते है यह सब करने से लोग उनका मजाक उड़ायेगें। परन्तु जिस प्रकार आज स्कूल में पहचान पत्र मिलता है कि यह छात्र किस विद्यालय या कक्षा का है उसी प्रकार तिलक, कलावा और कंठी पहनने से हम भगवान के भक्त है या नहीं यह भी पता चलता है। संसार में पड़े हुए हम संसारी व्यक्ति की तरह केवल उसी संसार बंधनों में ही जीना चाहते है। 

ठीक उसी प्रकार गजराज अपने परिवार के साथ जंगल में भृमण कर रहा था और जब उसकी पत्नी को प्यास लगी तो वे सभी सरोवर की ओर गए। वहां जाकर गजराज अपने परिवार के साथ जल विहार करने लगा। अहंकार में मस्त गजराज अपने परिवार को देख कर प्रसन्न हो रहा था। जैसे हम अपने परिवार को देख कर अहंकारी हो जाते है और वह देख कर अपने मन को तस्सल्ली देते है। उस सुखमय क्रीड़ा में सरोवर में एक ग्राह जिसे वह अच्छा नहीं लगा उसने कहा कौन है जो मेरे सरोवर में क्रीड़ा कर रहा है। ग्राह ने आकर गजराज का पैर पकड़ लिया और जल में खींचने लगा।  
गजराज ने पूरी ताकत के साथ अपने पैर को छुड़ाने का प्रयास करता रहा। अपने बच्चों और पत्नी से मदद नहीं मांगी। इसी तरह पुरुष भी विपत्ति आने पर जब तक हर तरफ से न टूट जाये अपने परिवार से मदद नहीं मांगता है। ये ही उसका अहंकार है। लेकिन जब गजराज को अपनी ताकत से बचने का मार्ग नहीं मिला तो उसने अपने परिवार से मदद ली पर उसकी सहायता करने में कोई सफल नहीं हुआ। 

तो गजराज के बच्चो ने पहले साथ छोड़ा फिर पत्नी ने भी। इसी तरह संसार में जब विपत्ति आती है तो सबसे पहले परिवार वाले सबसे पहले साथ छोड़ते है। इसी तरह गजराज को भी सभी ने छोड़ दिया और जब वह डूबने लगा तो उसने मेरे ठाकुर को पुकारा की हे गोपाल। बस मेरे ठाकुर इतना सुनते ही नंगे पांव गरुड़ को छोड़ कर दौड़े आये और ग्राह को अपने सुदर्शन द्वारा इस संसार से मुक्त कर दिया और गजराज के प्राणो की रक्षा की।  
तब भगवान से किसी ने पूछा की, हे प्रभु गजराज तो आपका भक्त था फिर आपने ग्राह को क्यों मुक्त कर अपने धाम भेज दिया। तब मेरे ठाकुर ने कहा जो मेरे पैर पकड़ता है मैं उसको बाद में और जो मेरे अपनों के पैर पकड़ता है उसको में सबसे पहले तारता हूँ। जिस तरह गजराज मेरा भक्त था पर ग्राह ने मेरे प्रिय के पांव पकड़कर प्रिय से भी प्रिय बन गया। इसके बाद महाराज श्री ने कहा कि साधू, भक्त और ब्राह्मण का कभी भी अपमान नहीं करना चाहिए। जो भी इनका अपमान करता है उसे स्वयं भगवान भी माफ नहीं करते है

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