बलि के साथ खुलते हैं छिन्न मष्तिका मंदिर के पट 

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कानपुर, 27 सितम्बर । कभी किसी जानवर की बलि देने के बाद उसके मस्तक पर कपूर जलाकर आरती करते शायद आपने नहीं देखा होगा। कानपुर के शिवाला इलाके में मौजूद मां दुर्गा के मंदिर में कुछ ऐसा ही नजारा दिखा। नवरात्रि के सप्तमी के दिन मां की आरती करने का ये रिवाज सैकड़ों साल पुराना है। 

बलि के साथ खुलता है मंदिर का पट
ये दुर्गा माता का मंदिर शिवाला इलाके में मौजूद है। ट्रस्टी अनिरुद्ध बाजपेयी ने कहा, ’इस प्रांगण में माता दुर्गा, कैलाश मंदिर और झूलेलाल का मंदिर हमारे पूर्वजों ने स्थापित किया था।’ ’मंदिर में माता दुर्गा के साथ एक तरफ माता छिन्न मष्तिका विराजमान हैं, जो हमारे खानदान की कुलदेवी हैं। नवरात्रि के सप्तमी के दिन सुबह माता छिन्न मष्तिका का पूजन केवल मेरे ही घर के सदस्य करते हैं। इस दौरान माता का दर्शन आम लोगों को नहीं होता।’ पूजा करने के बाद इनकी आरती बकरे के कटे सिर पर कपूर जलाकर किया जाता है। माता के प्रसाद के लिए पहले बकरे की बलि दी जाती है। उसके बाद उसके सिर को थाली में रखकर उसपर कपूर जलाया जाता है। जिसके बाद माता की आरती होती है।


आम भक्तों को नहीं मिलता माता दर्शन
अनिरुद्ध ने बताया, माता छिन्न मष्तिका के मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा के समय पंडितों ने कहा था, आम जनता इनका दर्शन-पूजन न करने पाए। तब से ये परम्परा चली आ रही थी। 2005 में मैंने परंपरा को तोड़ते हुए स्थानीय भक्तों को माता के दर्शन की अनुमति दी। इसके बाद, लगातार 3 साल तक घर में कोई ना कोई अनिष्ट होता चला गया। पहले साल बड़े बेटे की अकाल मृत्यु हो गई। फिर एक के बाद एक दो और हादसे हुए। पंडितों और बुजुर्गों के कहने पर एक बार फिर आम भक्तों के पूजन पाठ पर रोक लगा दिया।


मंदिर के पीछे दी जाती है बलि
माता छिन्न मष्तिका के मंदिर के पीछे बकरे की बलि दी जाती है। जहां घनी आबादी का इलाका है। मगर मां के प्रकोप से बचने के लिए कोई भी इसका विरोध नहीं करता। जिस तलवार से बलि दी जाती है। उसका भी पूरे विधि-विधान से पूजन होता है। बलि देने के बाद उसके सिर को एक थाली में सजा कर माता को चढ़ाया जाता है।

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