कानपुर:-राहत शिविरों में नहीं है राहत

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कानपुर,5सितंबर। हर काम में नाकाम साबित हो रहे शहर के आला अधिकारी एक बार फिर बेनकाब हैं। आपदा प्रबंधन की ‘जुगाली’ करते इनका मुंह नहीं थकता और हकीकत क्या है, ये गंगा किनारे के बाढ़ प्रभावित गांवों में जाकर देखा जा सकता है। अन्य इंतजामों की बात बाद में करेंगे। इससे ज्यादा शर्मसार करने वाला क्या हो सकता है कि पांच दिन से बाढ़ में घिरे परिवारों के छोटे-छोटे बच्चे भी भूख से तड़प रहे थे। जनप्रतिनिधियों और समाजसेवियों ने खाना बांटना शुरू किया तो बच्चे खाने पर टूट पड़े।

गंगा में आए उफान से किनारे के दर्जनों गांव बाढ़ की चपेट में हैं। रास्ते जलमग्न हैं और ग्रामीण घर छोड़-छोड़ कर महिला-बच्चों समेत गंगा बैराज हाईवे पर आ गए हैं। पांच दिन से वह तंबू-तिरपाल लगाकर गुजर कर रहे हैं। इन अधिकांश बाढ़ प्रभावितों में गरीब ही हैं। मजदूरी कर पेट पालते हैं। काम पर नहीं जा रहे तो खाने का इंतजाम भी ढंग से नहीं कर पा रहे। अब तक जितने भी नेता दौरा करने गए, वह फोटो खिंचाने के लिए कुछ लोगों को दो-दो रुपये का बिस्किट का पैकेट बांट आए रूखी-सूखी ब्रेड। जिला प्रशासन की ओर से खाने का कोई इंतजाम नहीं किया गया। बच्चे भूख से किस तरह तड़प रहे थे, यह तब अहसास हुआ, जब बिठूर विधायक अभिजीत सांगा, ख्योरा कटरी प्रधान अशोक निषाद, पूर्व प्रधान सुरेश निषाद और समाजसेवी सुशील दुबे ने खाना बनवाकर बंटवाया। खाना बन रहा था, तब तक बच्चे इर्दगिर्द मंडराते रहे। फिर जैसे ही बंटना शुरू हुआ तो वह उस पर टूट पड़े। पांच-पांच कतारें लगाकर उन्हें खाना दिया गया।

बीमार हैं महिला-बच्चे, एक भी डॉक्टर नहीं

बहुत बड़ा बैनर लगाकर प्रशासन ने बाढ़ पीड़ित राहत शिविर तो लगा रखा है, लेकिन वहां इंतजाम कोई नहीं। बनियापुरवा, दुर्गापुरवा, गोपालपुरवा सहित कई गांवों के करीब पांच हजार परिवार गंगा बैराज हाईवे पर पड़े हैं। गंदे-बदबूदार पानी के इर्दगिर्द रहने से वह बीमार भी हो रहे हैं, लेकिन स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर स्वास्थ्य विभाग की सिर्फ एक एएनएम नाहिद बेगम वहां तैनात की गई हैं। कोई डॉक्टर शिविर में नहीं बैठता। एलियन मंडल 180 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर एसएस दास द्वारा चिकित्सकों की टीम भेजी गई। डॉ. एएस कटियार, डॉ. पीएन मिश्रा और डॉ. सरिता सिंह ने जांच कर दवा वितरित की। उन्होंने बताया कि बुखार फैल रहा है। करीब 125 महिला-बच्चों को एक दिन में दवा दी गई है।

ग्रामीणों को दिखाने के लिए रख दिया है जेनरेटर

हाईवे पर जहां सैकड़ों परिवार पड़े हैं, वहां सांप-बिच्छू आदि निकलने का भी खतरा है। रात में बहुत परेशानी होती है, लेकिन अभी तक वहां केस्को द्वारा बिजली का इंतजाम नहीं किया गया है। ग्रामीणों ने मांग की तो जेनरेटर तो रखवा दिया गया, लेकिन पूरे दिन कोई भी लाइन डालने तक नहीं पहुंचा।

हाईवे किनारे खुले में शौच, अफसर बेफिक्र

गांवों को खुले में शौचमुक्त करने के लिए सरकार कितना जोर दे रही है, लेकिन इन दिनों बाढ़ प्रभावित गांवों के ग्रामीण हाईवे किनारे में खुले में शौच को जा रहे हैं। इतनी बड़ी संख्या में बाढ़ पीड़ित हाईवे पर डेरा जमाए हुए हैं, लेकिन वहां एक भी मोबाइल टॉयलेट का इंतजाम नगर निगम ने नहीं किया है।

तिरपाल को भी नहीं पैसे, खुले में परिवार

घर बाढ़ में घिरे हैं तो ग्रामीण सड़क पर रहे हैं। कई परिवार तो ऐसे हैं, जिनके पास तिरपाल खरीदने को भी पैसे नहीं हैं, उन्हें तो खुले आसमान के नीचे बरसात में भी भीगना पड़ रहा है। बनियापुरवा की पुष्पा, रमेश, दुर्गापुरवा के रमेश हों या लक्ष्मनपुर के रामअवतार, सभी एक दर्द था। उनका कहना था कि हमारे पास तिरपाल खरीदने को भी पैसे नहीं हैं। प्रशासन तिरपाल और खाने का ही इंतजाम करा देता तो कुछ राहत तो मिल जाती।

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