सपा कुनबे की टूट का फायदा उठायेगी भाजपा

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वर्ल्ड खबर एक्सप्रेस न्यूज़….

लखनऊ,29अगस्त।कहते है कि भाग्यशाली के लिए भूत कामाता है। यह बाॅत भाजपा के लिए सौ फीसदी सच साबित है। निश्चित तौर से यूपी में भाजपा के सामने जाति वर्ग के हिसाब से सबसे बड़ी और प्रतिद्वंदी पार्टी कोई है तो वह समाजवादी पार्टी है। क्योकि एससीएसटी एक्ट में संशोधन के बहाने भाजपा पहले ही बसपा के सामने बड़ी चुनौती तैयार कर चुकी है। जबकि सपा की चुनौती स्वंय उनके परिवार की टूट खत्म कर दी हैं। यह तय है कि सपा के पूर्व मंत्री और महासचिव शिवपाल सिंह यादव के साथ पार्टी का बहुत बड़ा तबका है। शिवपाल सिंह यादव और उनके सम्पर्क भी कम नही है। ऐसे में सपा की इस बड़ी टूट का अब भाजपा यूपी में पूरा फायदा उठायेगी।

पारिवारिक कलह में कई बार अपमानित और उपेक्षित होने के बावजूद शिवपाल सिंह यादव ने राजनीतिक खामोशी बनाये रखी थी तो इससे यह साफ था कि वह वक्त के इंतजार में हैं और एन वक्त पर अपने पत्तों का राजफाश करेंगे। अब लोकसभा चुनाव से पहले अपने पत्ते खोल यह भी साबित कर दिया है कि राजनीति के दंगल में वह हार मानने वाले योद्धाओं में नहीं और यदि सपा ने उन्हें खेल में नहीं शामिल किया है तो वह खेल बिगाडने का आनंद जरूर लेंगे।

दरअसल, समाजवादी पार्टी संस्थापक मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक नर्सरी में तैयार इनमें से दोनो सियासी महारथियों यानी मुलायम सिंह के भाई शिवपाल यादव और सपा प्रमुख अखिलेश यादव दोनों में सियासी वर्चस्व की जंग अब तक लंबी खिंचती दिख रही थी लेकिन अब दो धाराओं में बंटती नजर आने लगी है। शिवपाल अपनों के जरिए एक तरफ अपने समाजवादी समर्थकों को एकजुट कर रहे हैं तो दूसरी ओर छोटे-छोटे सियासी दलों का सेक्युलर मोर्चा तैयार करने में लगे हैं। वह नए मोर्चे की घोषणा से पहले सेक्युलर मोर्चा और शिवपाल फैंस एसोसिएशन दोनों को मजबूत कर चुके हैं। आज समाजवादी सेक्युलर मोर्च के गठन की घोषणा से काफी कुछ स्थितियां साफ हो गई हैं।
भले ही शिवपाल ने मोर्चा के गठन के लिए लगभग दो साल का इंतजार जरूर किया है लेकिन, इसकी बुनियाद पहले ही रखी जा चुकी थी।

हर बार मुलायम ही इसमें दीवार बनते रहे हैं। उपेक्षा से त्रस्त शिवपाल ने पांच मई 2017 को समाजवादी सेक्युलर मोर्चा बनाने का एलान किया था लेकिन, बाद में यह ठंडे बस्ते में चला गया। लगभग साल भर पहले भी मोर्चा के गठन की पूरी तैयारी कर ली गई थी लेकिन, मुलायम ने एलान नहीं होने दिया था। इसका पूरा खाका तैयार करने के बाद गत 25 दिसंबर को लोहिया ट्रस्ट में बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस तक बुला ली गई थी। शिवपाल बड़े भाई मुलायम के मुंह से ही इसकी घोषणा कराना चाहते थे लेकिन, उन्होंने पलटी मार ली थी। शिवपाल इससे नाराज भी हुए थे लेकिन, सार्वजनिक इजहार नहीं किया था। इसके बाद इसी वर्ष 10 जून को समर्थकों ने शिवपाल यादव सेक्युलर मोर्चा का गठन कर शिवपाल को संरक्षक बनाया था।लोकसभा चुनाव नजदीक आते देख समाजवादी कुनबे की कलह अब बगावत में तब्दील होने लगी है। सपा नेता शिवपाल सिंह यादव द्वारा समाजवादी सेक्युलर मोर्चा के गठन से कुनबे की कलह एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गई है। सेक्युलर मोर्चा बनाने के बाद साफ हो गया है कि अब शिवपाल ने सपा से अलग अपनी सियासी राह पकड़ ली है। हालांकि बीते डेढ़ साल से वह पार्टी में किसी पद पर नहीं हैं। उल्लेखनीय है कि अखिलेश यादव और शिवपाल के बीच रिश्ते में खटास 2017 में यूपी विधानसभा चुनाव के पहले आई थी। इसके बाद अखिलेश ने अपने चाचा शिवपाल को मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया था।

फिलहाल 2017 के यूपी विधासनसभा चुनाव से अब तक मुलायम सिंह के समाजवादी कुनबे की लड़ाई यदाकदा सड़क दिखती रही है। मुलायम सिंह ने कई बार कुनबे को एका कराने की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हो सके। इसी के चलते बीते दिनों शिवपाल के भाजपा का दामन थामने की चर्चाएं चलीं। शिवपाल के करीबी माने जाने वाले अमर सिंह ने भी कहा था कि उन्होंने भाजपा के बड़े नेता के साथ उनकी मीटिंग फिक्स कराई थी लेकिन वह ऐन वक्त पर नहीं पहुंचे। फिलहाल समाजवादी कुनबे में लंबे समय से चली आ रही कलह अब बगावत के रूप लेने लगी है। इस सबके बीच मुलायम सिंह ने खुद को यह कहकर दरकिनार कर रखा है कि उनकी अब कोई नहीं सुनता, फिर भी वह किसी हद तक अपने भाई के साथ खड़े नजर आते हैं।

शिवपाल समाजवादी पार्टी के धुरंधर और माहिर नेताओं में रहे हैं और उन्होंने अपने सेक्युलर मोर्चा का बम ऐसे वक्त पर फोड़ा है जबकि महागठबंधन की जाजिम अभी बिछ तक नहीं पाई है। सपा और बसपा के गठजोड़ की संभावनाएं भले ही प्रबल हैं लेकिन, उसमें भी किंतु, परंतु और असमंजस जैसे शब्द शामिल हैं। शिवपाल ने सेक्युलर मोर्चा के जरिये समाजवादी पार्टी में हाशिये पर चल रहे कई नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए एक विकल्प तैयार कर दिया है। इससे सपा को प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों ही रूप में नुकसान पहुंचना तय है। उन्होंने अन्य छोटे दलों के लिए दरवाजे खोलकर उन्हें भी राजनीतिक सौदेबाजी के लिए ताकत दे दी है जो प्रस्तावित महाठबंधन को किसी न किसी रूप में प्रभावित करेगा और समाजवादी पार्टी को नश्तर जैसा चुभेगा।

मुलायम सिंह यादव के समय से ही शिवपाल सिंह यादव की संगठन पर मजबूत पकड़ मानी जाती है। उस समय तो वह कई बड़े फैसले बदलवाने में भी सक्षम माने जाते थे और टिकट बंटवारे से लेकर मंत्रिमंडल के गठन तक में उनकी सुनी जाती थी। बड़े विभागों का मंत्री रहने के दौरान भी उन्होंने अपने लोगों का पूरा ध्यान रखा था। ऐसे में शिवपाल से लाभान्वित होने वाले लोगों की बड़ी संख्या सपा में है और वह कुनबे की कलह शुरू होने के बाद से अलग पार्टी के गठन का दबाव बनाए हुए थे।

सपा के प्रभाववाले क्षेत्रों इटावा, मैनपुरी, कन्नौज, एटा, फर्रुखाबाद जैसे जिलों में तो शिवपाल की गहरी पैठ है ही अन्य जिलों में भी उनके समर्थकों की बड़ी संख्या है। शिवपाल फैंस एसोसिएशन के जरिये उन्होंने युवाओं की बड़ी संख्या भी खुद से जोड़ रखी है। मोर्चा ने अपने पदाधिकारी खड़े किए तो सपा को नुकसान उठाना पड़ सकता है।

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