देश को दीर्घकालीन आपदा प्रबंधन नीति की जरूरत

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प्रकृति के साथ लगातार जो खिलवाड़ हम और आप अपनी सुख सुविधा के लिए कर रहे है वह वास्तव में हम अपनी अकाल मृत्यु की तैयारी कर रहे है। प्रकृति से खिलवाड़ का प्रतीक मौसम बन चुका है। केरल में कुदरत का जो कहर बरपा है वह बहुत डरावना है। तीन सौ पचास से अधिक मौते और बीस हजार करोड़ की आर्थिक हानि ने केरल को बेहाल कर रखा है।

इसके पहले हम कुदरत का कहर ‘‘ काल बैशाखी ’’ की शक्ल में देख चुके है। दो मई 2018 बुधवार को हम इसकी मार का शिकार हो चुके है धन सम्पत्ति को छोड ही दे तो 120 से अधिक जन हानि और इसके दो गुने पशु हानि का सामना हम कर चुके है। प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करने का कुपरिणाम तो मानव को ही भुगतना पड़ेगा।

मौसम विभाग की ही मानें तो 72 वषों में इस तरह अचानक काल बैशाखी का भयावह रूप नहीं देखा गया था। 72 वषों में कितना बदलाव हुआ और प्रकृति के साथ छेड़छाड़ में किस हद तक सीमा का अतिक्रमण किया गया है इसका अंदाजा हम खुद लगा सकते हैं। केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने पीएम मोदी के साथ हुई बैठक में ये कहा कि केरल राज्य को बाढ़ की वजह से 19,512 करोड़ रुपये के जान-माल के नुकसान की आशंका है।

भारत के दक्षिणी राज्य केरल में बाढ़ की वजह से हुए हादसों में मरने वालों की संख्या बढ़कर 350 हो गई है।सूबे के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के शब्दों में कहें तो ‘‘ बीते 100 वर्षों में केरल ने ऐसी तबाही नहीं देखी। ‘‘ बाढ़ का पानी कम हो रहा है, लेकिन मरने वालों की संख्या और बढ़ सकती है।केरल में बाढ़ से हुई व्यापक तबाही की तस्वीर सामने आने के बाद से हर कोई हैरान है। केरल के 14 में से 13 जिले जलमग्न होने के बाद यहां पर जो नुकसान का जायजा लिया गया है .

उसके मुताबिक यहां 20 हजार करोड़ का नुकसान हुआ है। केरल के नौ जिले समुद्री तट से मिलते हैं। इस बाढ़ में सबसे ज्यादा तबाही इडुकी जिले में हुई है। यहां खेत खलिहान से लेकर घर तक पानी में डूब चुके हैं। इसके अलावा मल्घ्लापुरम, कोट्टयम और एर्नाकुलम में भी काफी तबाही हुई है।

हालांकि अब समय के साथ स्थिति में कुछ सुधार होना शुरू हो गया है। केरल में करीब 75 ताल्लुका, 152 कम्यूनिटी डेवलेपमेंट ब्लॉक और 941 ग्राम पंचायतें हैं। इनमें से कई बाढ़ की त्रासदी झेलने को मजबूर हैं। हालाॅकि केंद्र सरकार ने इसे गंभीर प्राकृतिक आपदा घोषित किया है। इसके बावजूद जिस तरह से देश में जब-तब आपदाएं आ रही तो क्या केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों को अपने स्तर पर दीर्घकालीन आपदा प्रबंधन नीति का जरूरत के हिसाब से मसौदा तैयार कर उस पर तत्काल अमल नही करना चाहिए।

आग लगने पर कुआॅ खोदने वाली स्थिति कब तक बनी रहेगीं। केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने समीक्षा बैठक कर केंद्र से राज्य को दोबारा पटरी पर लाने के लिए 2600 करोड़ रुपये के पैकेज की मांग की है। हालांकि केंद्र ने कल ही केरल के लिए 600 करोड़ रुपये जारी किए हैं। इसको मिलाकर अब तक केंद्र की तरफ से 680 करोड़ रुपये की अंतरिम सहायता की घोषणा की जा चुकी है। केरल की बाढ़ का अंदाज इस बात से भी लगाया जा सकता है कि यहां पर अब तक 1223 लोगों की जान जा चुकी है।

पिछले एक पखवाड़े में ही करीब 223 लोगों की जान गई है। इसके अलावा बाढ़ से 10 लाख लोग बेघर हुए हैं। करीब 2.12 लाख महिलाओं, एक लाख बच्चों समेत 10.78 लाख लोगों ने 3,200 राहत शिविरों में शरण ले रखी है। इस बाढ़ से करीब दस हजार किमी की सड़कें बर्बाद हो गई हैं ओर एक लाख घर तबाह हुए हैं। केरल को मदद करने वालों की संख्या कम नही है.

जामिया मिलिया इस्लामिया के अध्यापकों ने केरल में बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए अपना एक दिन का वेतन देने का फैसला किया है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आइएमए) का कहना है कि बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए एसोसिएशन ने राष्ट्रीय स्तर पर समन्वय समिति का गठन किया है। टीम राहत कार्य में जुटी हुई है और बाढ़ पीड़ितों को अब तक 40 लाख रुपये की दवाएं उपलब्ध कराई गई हैं। केरल में बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (डीएसजीपीसी) लंगर लगाएगी।

ये लंगर तीन स्थानों पर लगाए जाएंगे, जिसमें रोजाना 25 से 30 हजार लोगों को खिलाने की व्यवस्था रहेगी। केरल के मछुआरों ने अपनी करीब 600 नावें मदद के लिए दी।मालदीव ने 50,000 डॉलर (34 लाख 90 हजार 122 रुपये) की मदद दी है।यूपी सरकार ने 15 करोड़ और राहत सामग्री भेजी है।

असम सरकार ने तीन करोड़ रुपये,जम्मू-कश्मीर बैंक ने 11 करोड़,उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने एक माह का वेतन, चीन में प्रवासी भारतीय समुदाय ने 14 लाख , बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने केरल के लिए 10 करोड, झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवार दास पांच करोड़,महाराष्ट्र सरकार 20 करोड, गुजरात की सरकार दस करोड़, उत्तराखंड के सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने 5 करोड़, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने केरल के बाढ़ प्रभावित बच्चों के लिए तैयार 100 मीट्रिक टन तैयार भोजन के पैकेट रवाना किए हैं। राहत का यह सिलसिला जारी है।

बाढ़ का पानी अब कम होने लगा है। अब प्रश्न उठता है कि अभी तक हम आपदा के भूगोल को ही नाप रहे थे, लेकिन जैसे-जैसे जल-स्तर नीचे उतर रहा है, विभिन्न स्तरों पर हुए विनाश के दृश्य भी स्पष्ट हो रहे हैं। राज्य सरकार ने तो अभी अपना प्राथमिक आकलन ही पेश किया है। उसका अनुमान है कि बाढ़ और अतिवृष्टि की वजह से सार्वजनिक संपत्ति को 20 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान पहुंचा है। लेकिन सार्वजनिक संपत्ति को पहुंचा यह नुकसान पूरे विनाश का एक छोटा सा हिस्सा भर है। जिस बड़े पैमाने पर लोगों के घर-बार उजड़ गए, उससे लगता है कि यह नुकसान सरकारी अनुमान का कई गुना बड़ा हो सकता है। अभी तो जल, थल और वायु, तीनों सेनाएं सक्रिय हैं। आपदा प्रबंधन की टीमें भी दिन-रात जुटी हुई हैं।

केरल अभी ओखी चक्रवात और निपाह वायरस के संक्रमण जैसे झटकों से अभी पूरी तरह उबर नहीं सका है। आपदा की वजह से दुनिया भर में जो सहानुभूति उमड़ी है, वह कुछ समय में मुरझाने लगेगी। इस लिहाज से केरल की आपदा ने केन्द्र एवं राज्य सरकार को यह मौका दिया है, जब सरकारें दीर्घकालिक आपदा प्रबंधन नीति पर सोचें। ऐसी नीति, जिसका नजरिया तत्काल राहत तक सीमित न हो, बल्कि वह दीर्घकालिक पुनर्निर्माण तक की बात सोचकर चले।

इसमें सिर्फ सार्वजनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर को फिर से खड़ा करने की ही बात न हो, बल्कि ऐसा सपोर्ट सिस्टम भी बनाया जाए, जिससे आपदा से उजड़ चुके लोग फिर अपने पांवों पर खड़े हो सकें। ऐसा नहीं हो सकता कि हम इन्फ्रास्ट्रक्चर तो फिर से खड़ा कर दें, और लोगों को उनके भाग्य के भरोसे छोड़ दें। .ऐसी स्थिति से निपटने के लिए बकायदा केन्द्र और राज्य सरकार को एक विभाग बनाना चाहिए।

यही नही आपदा प्रबंधन से निपटने के लिए आपदा न होने पर भी नियमित रूप से बजट में आपदा प्रबंधन के नाम पर बड़ी धनराशि केन्द्र और राज्यों में रखी जानी चाहिए जो ऐसे वक्त में प्राकृति का कहर झेलने वाले राज्य और क्षेत्रों के लिए राहत का काम कर सकें।

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