मशहूर गीतकार और पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित कवि गोपालदास ‘नीरज’ ने गुरुवार एम्स में अंतिम साँस ली |

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मशहूर गीतकार और पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित कवि गोपालदास ‘नीरज’ ने गुरुवार एम्स में अंतिम साँस ली |

कवि गोपालदास ‘नीरज’ लंबे समय से बीमार चल रहे थे. उन्होंने गुरुवार को एम्स में ७:३५ दुनिया को अलविदा कह गए | इससे पहले उनकी बीमारी के चलते उन्हें पहले आगरा के अस्पताल में भर्ती किया गया जहा उन्हें साँस लेने में दिक्कत हो रही थी तकलीफ ज्यादा होने पर उन्हें एम्स रिफर किया गया |
उनकी बेहद लोकप्रिय रचनाओं में ‘‘कारवां गुजर गया …….’’ रही.. स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से, लुट गए सिंगार सभी बाग के बबूल से, और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे. कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे! नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई, पांव जब तलक उठें कि ज़िन्दगी फिसल गई,

शिक्षा और साहित्य दोनों ही क्षेत्रो में अपना लोहा मनवा चुके गोपाल दास नीरज को भारत सरकार ने दो बार सम्मानित किया | इनका जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के पुरवाली गांव में 4 जनवरी 1925 को हुआ था |. 1991 में पद्मश्री और 2007 में पद्मभूषण पुरस्कार प्रदान किया गया. 1994 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान ने ‘यश भारती पुरस्कार’ प्रदान किया. गोपाल दास नीरज को विश्व उर्दू पुरस्कार से भी नवाजा गया था.
नीरज जी के नाम से प्रसिद्ध हुए गोपाल दस सक्सेना ने अपने मंचो से कविता पाठ का ऐसा समां बंधा की उसकी आवाज़ माया नगरी तक पहुचने लगी और उनेह फिल्मो के गीत लिखने के ऑफर आने लगे और उन्होंने इसको चुनौती मान स्वीकार किया और वह भी अपनी एक अलग पहचान बनाई |
अपनी स्वक्षंद छवि ने उन्हें ज्यादा दिन मुंबई नगरी में टिकने नहीं दिया और वो वापस अपने ठिकाने अलीगड़ आ गए
उनके कुछ बेहतरीन नगमे :-
‘दर्द दिया है’ (1956), ‘आसावरी’ (1963), ‘मुक्तकी’ (1958), ‘कारवां गुजर गया’ 1964, ‘लिख-लिख भेजत पाती’ (पत्र संकलन), पंत-कला, काव्य और दर्शन (आलोचना) शामिल हैं.
1970 के दशक में लगातार तीन वर्षों तक उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
उनके गीत जिन्हें सम्मान मिला 😐


– काल का पहिया घूमे रे भइया! (वर्ष 1970, फिल्म चंदा और बिजली)

– बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं (वर्ष 1971, फ़िल्म पहचान)

– ए भाई! ज़रा देख के चलो (वर्ष 1972, फिल्म मेरा नाम जोकर)

– हरी ओम हरी ओम (1972, फिल्म- यार मेरा)

– पैसे की पहचान यहां (1970, फिल्म- पहचान)

– शोखियों में घोला जाए फूलों का शबाब (1970, फिल्म- प्रेम पुजारी)

– जलूं मैं जले मेरा दिल (1972, फिल्म- छुपा रुस्तम)

– दिल आज शायर है (1971, फिल्म- गैम्बलर )
कानपुर से भी था गहरा नाता |
कानपुर! आह!आज याद तेरी आई फिर
स्याह कुछ और मेरी रात हुई जाती है,
आँख पहले भी यह रोई थी बहुत तेरे लिए
अब तो लगता है कि बरसात हुई जाती है.

तू क्या रूठा मेरे चेहरे का रंग रूठ गया
तू क्या छूटा मेरे दिल ने ही मुझे छोड़ दिया,
इस तरह गम में है बदली हुई हर एक खुशी
जैसे मंडप में ही दुलहिन ने दम तोड़ दिया.

प्यार करके ही तू मुझे भूल गया लेकिन
मैं तेरे प्यार का अहसान चुकाऊँ कैसे
जिसके सीने से लिपट आँख है रोई सौ बार
ऐसी तस्वीर से आँसू यह छिपाऊँ कैसे.

आज भी तेरे बेनिशान किसी कोने में
मेरे गुमनाम उमीदों की बसी बस्ती है
आज ही तेरी किसी मिल के किसी फाटक पर
मेरी मज़बूर गरीबी खड़ी तरसती है.

फर्श पर तेरे ‘तिलक हाल’ के अब भी जाकर
ढीठ बचपन मेरे गीतों का खेल खेल आता है
आज ही तेरे ‘फूलबाग’ की हर पत्ती पर
ओस बनके मेरा दर्द बरस जाता है.

करती टाईप किसी ऑफिस की किसी टेबिल पर
आज भी बैठी कहीं होगी थकावट मेरी,
खोई-खोई-सी परेशान किसी उलझन में
किसी फाइल पै झुकी होगी लिखावट मेरी.

‘कुसरवां’ की वह अँधेरी-सी हयादार गली
मेरे’गुंजन’ने जहाँ पहली किरन देखी थी,
मेरी बदनाम जवानी के बुढ़ापे ने जहाँ
ज़िन्दगी भूख के शोलों में दफन देखी थी.

और ऋषियों के नाम वाला वह नामी कालिज
प्यार देकर भी न्याय जो न दे सका मुझको,
मेरी बगिया कि हवा जो तू उधर से गुज़रे
कुछ भी कहना न, बस सीने से लगाना उसको.

क्योंकि वह ज्ञान का एक तीर्थ है जिसके तट पर
खेलकर मेरी कलम आज सुहागिन है बनी,
क्योंकि वह शिवाला है जिसकी देहरी पर
होके नत शीश मेरी अर्चना हुई है धनी.
महाकवि नीरज के निधन पर विनम्र श्रद्धांजलि

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