मोदी की आक्रामकता और शाह की कुशल रणनीति से मिली दक्षिण कन्नड़ में शानदार सफलता

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मंगलुर,15 मई  | जैसे शिकस्त की कोई एक वजह नहीं होती है, वैसे ही फतह की भी एक निश्चित वजह नहीं होती है। कर्नाटक में बीजेपी ने शानदार फतह हासिल की है और खासकर दक्षिण कन्नड़ में उसने कांग्रेस को जबरदस्त शिकस्त दी है। दक्षिण कन्नड़ को कांग्रेस के सुरक्षित गढ़ माना जा रहा था और बीजेपी को सबसे बड़ी सफलता इसी गढ़ में मिली है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि यह सब हुआ कैसे ? दक्षिण कन्नड़ समेत पूरे कर्नाटक में बीजेपी की शानदार जीत का श्रेय किसको जाता है, प्रधानमंत्री को जिन्होंने एक के बाद एक कई रैलियां करके वहां का चुनावी फिजा ही बदल दी या फिर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को जो जिन्होंने अचूक व्यूहरचना करके कांग्रेस को बुरी तरह से जकड़ कर उसके सारे चुनावी असहलहों को नाकाम करते हुये बीजेपी कार्यकर्ताओं को अंत तक आक्रामक बनाये रखा |

या फिर हिन्दुत्व से संबंधित उन मुद्दों को जिन्हें लेकर वहां के लोग अंदर ही अंदर वर्षों से असंतोष की आग में सुलगते हुये कांग्रेस को चुनाव में जमीनदोज करने के लिए घात लगाये बैठे हुये थे ? कर्नाटक के कॉस्टल इलाके की 21 सीटों में 18 सीटों पर बीजेपी जीत के करीब है। इसी तरह उडुपि और चिकमंगलूर की 10 सीटों पर पूरी तरह से बीजेपी लगभग काबिज हो चुकी है। उडुपि और चिकमंगलूर से तो कांग्रेस का पूरी तरह से सफाया हो गया है। यदि देखा जाये तो तटीय इलाके में कांग्रेस को जमीनदोज करने की तीव्र इच्छा वहां के बहुसंख्यक वोटरों में कई कारणों से बहुत पहले से ही मौजूद थी। बहुसंख्यक हिन्दू आबादी को साफ लग रहा था कि कांग्रेस वर्षों से अल्पसंख्यकों के प्रति तुष्टिकरण की नीति अपनाते हुये उनके साथ अन्याय कर रही है। बातचीत के दौरान वे बेबाक अंदाज में अपना गुस्सा जाहिर करते हुये कहते थे कि उनके गायों की लगातार चोरी हो रही है, पुलिस की निष्क्रियता की वजह से चोरों की हिम्मत इतनी बढ़ चुकी है कि वे रात में झुंड बनाकर आते हैं और घरों में घुसकर तलवार के बल पर लोगों से गायों को छीन कर ले जाते हैं। पुलिस इस मामले में कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है क्योंकि कांग्रेसी विधायक और कांग्रेसी हुकूमत उन्हें संरक्षण प्राप्त है। पूरे कॉस्टल क्षेत्र की यह एक अहम समस्या थी। बहुसंख्यकों का हर गांव इस समस्या से जूझ रहा था।

कांग्रेस की तथाकथित विकास की राग पर सहजता से थिरकने के बजाय वे गाय चोरी के मसले पर खुलकर तांडव करते हुये कांग्रेस का विनाश करने के मूड में ज्यादा थे। इसके साथ ही लव जेहाद का मसला भी बहुसंख्यकों को सीधे तौर पर प्रभावित कर रहा था। आधिकारिक तौर पर लव जेहाद के तहत पिछले पांच साल में तीन हजार से भी अधिक लड़कियों के गायब होने की बात की जा रही थी। लापता लड़कियों को लेकर कांग्रेस हुकूमत लचर नीति अपनाये हुये थी। अव्वल वह इसे सियासी मसला मान ही नहीं रही थी। थानों को भी इस तरह के मामलों को अतिरिक्त नरमी के साथ हैंडल करने की हिदायत दी गई थी। एक बार लापता हो जाने के बाद लड़की को खोज पाना काफी मुश्किल भरा काम था।

पुलिस वाले भी इस मामले में लापता लड़की के परिवार वालों को किसी भी तरह की मदद करने से परहेज करते थे, जिससे कांग्रेस के प्रति लोगों का गुस्सा और भी बढ़ता जा रहा था। इसके साथ ही तटीय इलाके में हिन्दू संगठनों के कार्यकर्ताओं की हत्या का मामला भी तूल पकड़े हुये था। दक्षिण कन्नड़ में ऐसे कुल 8 कार्यकर्ताओं की हत्या हुई थी, जबकि पूरे कर्नाटक में 22 कार्यकर्ता मारे गये थे। इन हत्याओं के खिलाफ एक साथ कई हिन्दू संगठन अपने-अपने तरीके से मुहिम छेड़े हुये थे। लेकिन पीएम नरेंद्र मोदी ने अपनी उडुपि के चुनावी सभा में इसे मजबूती से उठाकर पूरी तरह से इसे सियासी रंग में रंग दिया। इसके बाद मंगलूर और चिकमंगलूर की चुनावी सभा में भी अपने तरीके से इस मुद्दे पर धार चढ़ाते हुये यहां तक कहा कि यदि कर्नाटक में बीजेपी की सरकार बनती है तो हत्यारों को उनके अंजाम तक पहुंचा दिया जाएगा।

बहुसंख्यक वोटरों पर इसका अच्छा असर पड़ा। यह कहना ज्यादा बेहतर होगा कि लोहा पहले से गरम था, पीएम मोदी ने सही समय पर चोट किया और देखते ही देखते ही कर्नाटक बीजेपी की झोली में आ गई। कर्नाटक मुहिम को सफल बनाने के लिए अमित शाह ने बेहतरीन व्यूह रचना की। एक ओर उन्होंने कांग्रेस पर लगातार हमला करने की नीति अपनाई आई तो दूसरी ओर बीजेपी के बूथ लेवल के मैनेजमेंट में पेज इंचार्ज को 30 वोटरों की एक सूची सौंप कर उसे अहम टास्क दिया, वोटिंग के दिन हर हालत में 30 वोटरों को मतदान केंद्र तक पहुंचाने और बीजेपी उम्मीदवार के हक में वोट गिरवाने की जिम्मेदारी दी गयी थी |

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