कानपुर :प्राइवेट स्कूलों में मनमानी फीस बढ़ोत्तरी पर अंकुश लगाए प्रदेश सरकार : एबीवीपी

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कानपुर, 02 अप्रैल। प्राइवेट स्कूलों में मनमानी फीस बढ़ोतरी के विरोध में सोमवार को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने डीआईओएस कार्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। कार्यकर्ताओं ने मांग किया कि प्रदेश सरकार प्राइवेट स्कूलों पर अंकुश लगाने के लिए सख्त कदम उठाये।

जिससे अभिभावकों का शोषण बंद हो सके। विरोध प्रदर्शन के दौरान कार्यकर्ताओं ने सड़क जाम कर दिया। जिसके बाद पहुंची पुलिस और डीआईओएस ने कार्रवाई का आश्वासन देकर शांत कराया।
प्राइवेट स्कूलों में अवैध वसूली को लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) कानपुर प्रांत के कार्यकर्ताओं ने सोमवार को जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय का घेराव कर जमकर विरोध प्रदर्शन किया। जिला विद्यालय निरीक्षक सतीश तिवारी के बाहर न आने पर नाराज कार्यकर्ताओं ने सड़क को जाम कर दिया और प्रदेश सरकार के खिलाफ नारेबाजी करने लगे। जिससे लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा।

सूचना पर पहुंची पुलिस ने कार्यकर्ताओं को शांत कराने का प्रयास किया लेकिन कार्यकर्ता जिला विद्यालय निरीक्षक के आने पर अड़ गये। जिसके बाद पुलिस को देख जिला विद्यालय निरीक्षक बाहर आए और कार्यकर्ताओं प्राइवेट स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए दस सूत्रीय ज्ञापन सौंपा। महानगर मंत्री रजत कटियार ने कहा कि प्राइवेट स्कूलों में महंगी शिक्षा व्यवस्था के अलावा एक साथ तीन महीने की शुल्क, निश्चित दुकानों पर बिक रहीं कापी किताबों और वाहन आदि के मनमाने शुल्क को लेकर विद्यार्थी परिषद ने कई बार विरोध प्रदर्शन किया है लेकिन शिक्षा विभाग इस मुद्दे पर आंख मूंदे हैं।

कहा कि उत्तर प्रदेश के अभिभावकों को उम्मीद है कि फीस बढ़ोतरी के मुद्दे पर योगी सरकार उनका साथ देगी। लेकिन सरकार द्वारा इस विषय पर कोई कड़ा फैसला नहीं लिया गया। जिसके चलते इस सत्र में भी प्राइवेट स्कूल अभिभावकों की जेब खाली करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहें है। उन्होंने कहा कि प्राइवेट स्कूलों में शुल्क को लेकर एक मानक प्रशासन तय करें ताकि लूट खसोट न हो सकें। तरूण अग्निहोत्री ने कहा कि कहा कि हर साल प्राइवेट स्कूल संचालक 20 से 35 प्रतिशत तक फीस बढ़ा रहे हैं, फिर भी शासन-प्रशासन कुछ नहीं कर रहा।

कहा कि बेहतर पढ़ाई कराने के बजाय स्कूल संचालक खुलेआम कापी-किताबें तक बेच रहे हैं। इस पर रोक लगाई जाए। कहा, स्कूलों में अभिभावकों का शोषण हो रहा है। सरकार के अधिकारी मौन साधे बैठे हैं। जानबूझ कर सरकारी स्कूलों को खस्ताहाल रखा जाता है, ताकि बच्चे निजी स्कूलों का रुख करें। इस दौरान ऋषभ बाजपेई, रजत श्रीवास्तव, विराज चौहान, निष्ठा कटियार, अमन प्रधान, विकास, मोदित, आकाश दीक्षित, यशकीर्ति भदौरिया, राहुल आदि मौजूद रहें।

गुजरात की तरह बनाया जाय कानून
महानगर संगठन मंत्री सुमित प्रताप सिंह ने कहा कि बहुत सारे स्कूल बगैर मान्यता के चल रहे हैं, जहां अधिकारियों की मिलीभगत सामने आयी हैं। इसकी जांच कराकर कार्रवाई की जानी चाहिए। कहा कि प्राइवेट स्कूलों की फीस को नियंत्रण रखने के लिए राजस्थान, तमिलनाडु, दिल्ली, महाराष्ट्र और गुजरात सरकार ने कानून बना फीस की सीमा तय कर दी है। ऐसा ही कानून उत्तर प्रदेश सरकार बनाए जिससे अभिभावकों के साथ लूट खसोट न हो सके। बताया कि गुजरात सरकार के कानून के मुताबिक प्राइमरी स्कूल 15 हजार रुपये, सेकेंडरी स्कूल 25 हजार और हायर सेकेंड्री स्कूल 27 हजार से ज्यादा सालाना फीस नहीं वसूल सकते।

इन राज्यों में यह है प्रावधान
महानगर मंत्री रजत कटियार ने कहा कि राजस्थान में 2013 में राजस्थान विद्यालय (फीस के संग्रह का विनियमन) अधिनियम पास किया गया। इसके तहत राज्य सरकार उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समिति का गठन करती है। यही समिति प्राइवेट स्कूलों के लिए फीस संरचना तय करती है। यह स्कूल के स्वरूप को देखते हुए निर्धारित किया जाता है।

तमिलनाडु सरकार भी उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में निजी विद्यालयों के लिए फीस निर्धारण समिति का गठन करती है। इसी समिति की ओर से तय फीस निजी विद्यालयों को लेनी होती है। महाराष्ट्र में 2014 में पारित किए गए कानून के तहत हर स्कूल के पैरेंट्स-टीचर एसोसिएशन को फीस निर्धारण का कनूनी हक हासिल है। प्रबंधन के अकादमिक वर्ष से छह महीने पहले एसोसिएशन की कार्यसमिति में फीस बढ़ाने का प्रस्ताव रखना होता है। अगर यह समिति किसी कारण से फैसला नहीं ले पाती है तो मामला डिविजनल फी रेगुलेटरी कमेटी के पास जाता है।

वहां के फैसले के खिलाफ स्टेट रिविजन कमेटी में अपील की जा सकती है। रिविजन कमेटी का चेयरमैन उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश होते हैं। इस प्रक्रिया का उल्ंलघन होने पर प्राइवेट स्कूलों को भारी जुर्माना चुकाना होता है। इसी तरह दिल्ली और गुजरात सरकार ने भी कानून बनाकर प्राइवेट स्कूलों पर नियंत्रण बनाए रखा हुआ है। कहा कि गुजरात में फीस के मुद्दे पर कानून तोड़ने वाले स्कूल को पहली बार पांच लाख रुपए जुर्माना, दूसरी बार दस लाख रुपये जुर्माना देना होगा। तीसरी बार में स्कूल की मान्यता ही रद्द हो जाएगी। देश में ऐसे सिर्फ पांच ही राज्य हैं जहां पर अभिभावकों के हित में कानून है।

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