आदिवासियों की प्राचीन परंपरा जहां 12 साल में एक बार पूरी होती है ‘पुरुष’ बनने की तमन्ना

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सिमडेगा : आदिवासी समाज की परंपराएं और मान्यताएं आधुनिक समाज से मेल भले न खाती हों, लेकिन आधुनिक समाज की तमाम अच्छी बातों का छोर कहीं न कहीं आदिवासी समाज में मिल जाता है। जाहिर है, आदिवासी समाज ही तो आधुनिक समाज की बुनियाद रहा है।

जेंडर इक्वेलिटी यानी लैंगिग समानता आज आधुनिक समाज का अहम सरोकार बन चुका है। महिलाओं को पुरुषों की बराबरी पर लाने के तमाम प्रयास किए जा रहे हैं। नाम दिया गया है- वूमेन एम्पावरमेंट यानी नारी सशक्तीकरण। संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्य-2030 के 17 लक्ष्यों में से एक अहम लक्ष्य।

आइये अब झारखंड के सिमडेगा का रुख करें, जहां आदिवासी समाज इस लक्ष्य की पूर्ति में सदियों से जुटा हुआ है। जींस पैंट, सिर पर टोपी, स्पो‌र्ट्स शू और गॉगल्स लगाए तीर-धनुष, गुलेल, कुल्हाड़ी, भाला, डंडे और परंपरागत हथियारों से लैस शिकारी टोली को देख आप संशय में पड़ सकते हैं।

सहसा मुंह से निकलेगा, कहीं हमला करने जा रहे हैं क्या? आप बाहर से आए हैं तो यह जानकर आपकी हैरत और बढ़ जाएगी कि शिकारियों की ये टोली पुरुषों की नहीं बल्कि युवतियों की है। पुरुषों की वेशभूषा में शिकार पर निकली महिलाओं की इन टोलियों को देखते ही लोग अपनी बकरियां, मुर्गियां और पशुओं आदि को घर के भीतर समेट लेते हैं। दरअसल, यह आदिवासियों की प्राचीन परंपरा ‘जनी शिकार’ का हिस्सा है। हर बारह साल पर जनी शिकार उत्सव मनाया जाता है।

आदिवासी महिलाएं पुरुषों की वेशभूषा धारण कर शिकार पर निकलती हैं। अब तो प्रौढ़ महिलाएं ही नहीं, युवतियां भी जनी शिकार में भाग लेती हैं। झारखंड के आदिवासी बहुल इलाके सिमडेगा में इसका परंपरा का रंग कुछ और भी गाढ़ा दिखता है। ग्रामीण इलाकों के अलावा शहरी आदिवासी युवतियां भी उत्सवी मूड में और पूरे रौ में दिखती हैं। मजाल है कि कोई इनका विरोध करे। जिले के बानो, कोलेबिरा, ठेठईटांगर के साथ ही शहर में भी ये आदिवासी महिलाएं शिकार ढूंढ़ने के लिए पहुंचती हैं।

कई बार तो पशु मालिकों के साथ टकराव भी हो जाता है। पहले तो जनी शिकार पर निकली ये महिलाएं जमकर जंगली जानवरों का शिकार करती थीं। सरकार द्वारा जंगली जानवरों की हत्या पर लगाए गए प्रतिबंध और समय के बदलाव साथ जनी शिकार का स्वरूप भी बदला है। अब मुर्गा, मुर्गी, बकरियां, पक्षी और छोटे-मोटे जानवरों का सीमित शिकार करती हैं।


शिकार के बाद ये महिलाएं किसी डंडे में पशुओं को लटका कर गांव तक लाती हैं। एक सफल शिकारी की भांति कंधे पर शिकार टांगे भी वापस लौटती हैं। फिर जमकर जश्न मनाती हैं। यह जनजातीय महिलाओं की समृद्ध विरासत है तो शौर्य एवं साहस का प्रतीक भी। जनजातीय महिला समूह के लिए काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता अगुस्टिना बताती हैं कि जनी शिकार खासकर उरांव जनजाति की महिलाओं के लिए शौर्य-साहस का पर्व है।

सैकड़ों वर्ष पहले आदिवासी महिलाओं ने वीरांगना सिनगी दई के नेतृत्व में तुर्की सेना से लोहा लिया था। सरहुल का पर्व था और अधिकांश पुरुष नशे में डूबे हुए थे। तब सिनगी दई के नेतृत्व में महिलाओं ने एकजुट होकर रोहतास गढ़ में तुर्की सेना को मुंहतोड़ जवाब दिया था। इसकी याद में जनी शिकार की परंपरा पड़ी। सिमडेगा में बसे आदिवासी समुदायों में आज भी यह जारी है ।

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