पुण्यतिथिः भारतीय सिनेमा की नींव रखने वाला ये शख्स अपनी फिल्म के कलाकार की तलाश में पहुंचा यहां तक

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मुंबई : बॉलीवुड आज दुनिया की जानी मानी फिल्म इंडस्ट्री है। दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्में बॉलीवुड में ही बनती है। लेकिन यह फल-फूल से लदा पेड़ यूं ही नहीं खड़ा हो गया। 105 साल पहले एक शख्स ने भारतीय सिनेमा की नींव रखी थी जिस पर बॉलीवुड की इतनी बड़ी इमारत खड़ी है। हिंदी सिनेजगत में दादा साहब फाल्के का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। आज उनकी 74वीं पुण्यतिथि है।

उनकी लोकप्रियता इसी बात से भी साबित हो जाती है कि बॉलीवुड फिल्मों में विशेष योगदान देने वालों को दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाजा जाता है। आज बॉलीवुड में काम करने के लिए हर युवा बेताब रहता है लेकिन क्या आप जानते है एक समय था जब हिंदी सिनेमा के इस जनक को अपनी फिल्म के लिए कलाकार तलाशने रेड लाइट एरिया तक जाना पड़ा था

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ऐसा रहा फ़िल्मी सफ़र 

पहली भारतीय मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ के निर्माता, निर्देशक, कथाकार, सेट डिजाइनर, ड्रेस डिजाइनर, वितरक व संपादक, सब कुछ वही थे। कहा जा सकता है कि वह ‘वन मैन आर्मी’ थे। ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाकर फाल्के ने भारतीय सिनेमा की नींव डाली। यह फिल्म 21 अप्रैल, 1913 को रिलीज हुई। इस फिल्म ने भले ही हिंदी सिनेमा की नींव डाली हो, लेकिन इस नींव को पुख्ता करने का काम अभी बाकी था। ‘भस्मासुर मोहिनी’, ‘सत्यवान सावित्री’, ‘लंका दहन’ जैसी फाल्के फिल्म्स कंपनी की बाद की फिल्मों ने यह काम किया। फाल्के 1914 में जब अपनी फिल्में लेकर लंदन गए तो वहां के फिल्मकारों ने न सिर्फ उनके काम को सराहा, बल्कि उन्हें अच्छे पैसे पर अपने लिए फिल्में बनाने का न्यौता भी दिया, जिसे देशप्रेमी फाल्के ने ठुकरा दिया।

दादा साहब फाल्के पुरस्कार है फिल्मोद्योग का सर्वोच्च सम्मान

16 फरवरी, 1944 को नासिक में उन्होंने गुमनामी के अंधेरे में आखिरी सांस ली। 1969 में भारत सरकार ने उनके योगदान को देखते हुए उनके नाम से हर साल भारतीय सिनेमा से जुड़ी किसी एक हस्ती को दादा साहब फाल्के पुरस्कार देना शुरू किया। यह पुरस्कार भारतीय फिल्मोद्योग का सर्वोच्च सम्मान माना जाता है।

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पत्नी ने इस फिल्म का बजट जुटाने के लिए बेच दिए जेवर     

में आई फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ भारत की पहली फुल लेंथ फीचर फिल्म थी। हालांकि यह एक म्यूट फिल्म थी लेकिन सिर्फ मराठी कलाकारों को कास्ट करने वाली इस फिल्म ने इतिहास रच दिया। फिल्म का निर्देशन और प्रोडक्शन करने वाले दादा साहेब फाल्के की पत्नी ने इस फिल्म का बजट जुटाने में मदद करने के लिए अपने जेवर तक बेच दिए थे। 1913 के उस दौर में इस फिल्म को बनाने में कुल 15 हजार रुपए की रकम खर्च हुई थी।

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फिल्म के किरदार की तलाश में पहुंचे रेड लाइट एरिया

दादा साहेब फाल्के को जब अपनी फिल्म के लिए एक्ट्रेस नहीं मिल रही थी तो वह इसकी खोज में वेश्यालय तक पहुंच गए। तारामती का किरदार निभाने के लिए उन्हें एक्ट्रेस की जरूरत थी और उन्होंने इसके लिए रेड लाइट एरिया की कई वेश्याओं से बात की। दादासाहेब फाल्के के नाती चंद्रशेखर के मुताबिक फाल्के से सेक्स वर्करों ने पूछा कि इस काम के उन्हें कितने पैसे दिए जाएंगे? दादा साहेब ने जब उन्हें इस काम की फीस बताई तो सेक्स वर्कर्स ने कहा कि इतना तो हम एक रात में कमा लेती हैं।

रेड लाइट एरिया में नहीं मिली फिल्म के लिए कोई लड़की 

हालांकि रेड लाइट एरिया में उन्हें एक भी लड़की उनकी फिल्म के लिए नहीं मिली लेकिन एक दिन जब वह होटल में चाय पी रहे थे तब उनकी नजर एक गोरे दुबले पतले लड़के पर पड़ी जो उन्हें इस किरदार के लिए ठीक लगा। बाद में इसी लड़के ने उनकी फिल्म में तारामती का किरदार निभाया था। दादा साहेब फाल्के की यह फिल्म राजा हरिश्चंद्र और उनकी कहानी पर आधारित थी जिसकी सिर्फ एक ही प्रति बनाई गई थी जिसे खूब पसंद किया गया। इसी प्रति को कोरोनेशन सिनेमेटोग्राफ में दिखाया गया था।

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