कठघरे में सीबीआई और सरकार की साख

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सीबीआई की कार्यशैली के कारण केन्द्र की सरकारे हमेशा ही कठघरे में रहती है। लेकिन ताजा मामला सीधे सीधे मोदी सरकार की साख पर उस समय बट्टा लगा रहा है जबकि पाॅच राज्यों के चुनावो की उल्टी गिनती शुरू है ओर भाजपा मिशन 2019 के लिए एक पाॅव पर खड़ी है।

सरकार के सक्रिय ’होने से भले ही उम्मीद बंधी हो, लेकिन सीबीआई के ताजा विवाद से जो नुकसान हुआ है, वह काफी बड़ा और गंभीर है। रात ढाई बजे जिस तरह केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजा गया, वह बताता है कि इस संस्था के विवाद ने सरकार की भी नींद हराम कर दी है। इसका यह संदेश भी साफ अब उनकी संस्था से छुट्टी तय है।

आलोक वर्मा ने अपने सहयोगी और सीबीआई के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जो जांच बिठाई थी, उसे तो खत्म नहीं किया गया, लेकिन जांच करने वाली पूरी टीम बदल दी गई है। अभी तक सीबीआई मुख्यालय में सिर्फ विशेष निदेशक का दफ्तर ही सील किया गया था, मगर अब दोनों का दफ्तर सील कर दिया गया है।

सरकार की सक्रियता और सख्त कार्रवाई बताती है कि सीबीआई निदेशक ने अपने सहयोगी और विशेष निदेशक के खिलाफ आरोप लगाते या जांच बिठाते समय केंद्र सरकार को भरोसे में नहीं लिया था। सरकार की इस सक्रियता के बाद बहुत सी चीजें अभी भी स्पष्ट नहीं हैं। खासकर यह कि निदेशक और विशेष निदेशक ने एक-दूसरे पर जो आरोप लगाए थे, सरकार की उन पर क्या राय है? दूसरे यह कि सीबीआई का नया तदर्थ नेतृत्व इनके बारे में क्या राय रखता है? .

ताजा मामला को लेकर सरकार हरकत में आ गई है, लेकिन पिछले तीन दिनों में देश की इस सर्वोच्च जांच एजेंसी में जो कीचड़ उछाल हुआ है, उसकी छींटें आने वाले कुछ समय तक खुद सरकार को परेशान करती रहेंगी। सबसे बड़ी बात है कि इस पूरे मामले ने विपक्षी दलों को एक बड़ा मुद्दा दे दिया है। और तो और, कुछ लोगों ने पूरे विवाद को रॉफेल लड़ाकू विमान की खरीद पर हो रहे हंगामे से जोड़कर भी पेश करना शुरू कर दिया है। सीबीआई की बची-खुची साख भी अब बहुत गहराई में गोते लगा रही है।

एक के बाद एक उन ढेर सारे मामलों को गिनाया जाने लगा है, जिनमें सीबीआई नाकाम रही। यह बात भी लगातार सामने आ रही है कि पिछले तीन दिन में जो विवाद अचानक सतह पर आ गया, वह इस संस्था के भीतर तकरीबन एक साल से खदबदा रहा था। इसलिए यह सवाल तो पूछा ही जाएगा कि मामले को इस हद तक पहंुचने ही क्यों दिया गया? समय रहते इसे ठंडा क्यों नहीं किया गया? सीबीआइ का अंदरूनी विवाद अब जगजाहिर हो गया है और इस झगड़े में आरोपों के छींटे सरकार के दामन तक पहुंच गए हैं।

इसकी वजह आलोक वर्मा का खुद को छुट्टी पर भेजे जाने के फैसले का विरोध करना और सुप्रीम कोर्ट चले जाना तो है ही साथ ही सुप्रीम कोर्ट में आलोक वर्मा ने याचिका में सीधे मौजूदा सरकार पर जांच में दखल देने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं।वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि अंतरिम उपाय के तौर पर जांच के दौरान सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना को अवकाश पर रखा जाएगा। उन्होंने कहा कि वे निर्दोष साबित हुए तो फिर आएंगे। जेटली ने कहा कि यह सरकार, नागरिक बल्कि विपक्ष समेत सभी के लिए जरूरी है कि देश की प्रमुख जांच एजेंसियों की ईमानदारी कायम रहे।

उन्होंने कहा कि क्योंकि आरोपियों को उनके ही खिलाफ की जा रही जांच का प्रभारी नहीं होने दिया जा सकता है।हालाकि इस मामले में कैबिनेट ब्रीफिंग के दौरान पत्रकारों के सवाल के जवाब में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि यह कदम केवल यह सुनिश्चित करने के लिए नहीं है कि देश के भीतर के मामलों में सीबीआई की जांच ’निष्पक्ष रहे, बल्कि सरकार यह बर्दाश्त नहीं कर सकती कि देश में आरोपों ’का सामना कर रहे और विदेशों में ’रह रहे भगोड़े और धोखाधड़ी करने वाले एजेंसी के कामकाज पर सवाल ’भी उठाए।

उनका यह भी कहना था कि केंद्रीय सतर्कता आयोग को दोनों अधिकारियों द्वारा ’एक-दूसरे पर लगाए आरोपों की जानकारी मिली थी जिसके बाद उसने बीती शाम दोनों अधिकारियों को छुट्टी पर भेजने की सिफारिश की थी। इसके पीछे तर्क था कि आरोपियों या संभावित आरोपियों को उनके ही खिलाफ की जा रही जांच का प्रभारी नहीं होने दिया जा सकता है। .

जेटली ने सीबीआई निदेश आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के खिलाफ आरोपों के गुण-दोष के बारे में कुछ भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कांग्रेस समेत विपक्षी दलों के उन आरोपों को भी खारिज किया जिसमें कहा गया कि वर्मा को इसलिए हटाया गया क्योंकि वह राफेल लड़ाकू विमान ’सौदे की जांच करना चाहते थे।’जेटली ने कहा कि मैं इसे बकवास मानता हूं। विपक्षी दलों का यह कहना कि हमें पता है कि एजेंसी अब आगे क्या करने जा रही है, यह तथ्य अपने आप में प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है। उन्होंने विपक्षी दलों पर पलटवार करते हुए पूछा कि क्या वह चाहते हैं कि आरोपों का सामना कर रहे दोनों अधिकारी अपने खिलाफ जांच की निगरानी करें।

दुनिया में क्या इससे भी ज्यादा बेजा कुछ हो सकता है। .दरअसल, सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के बीच चल रहे घमासान और एक दूसरे पर लगाए गए आरोपों को देखते हुए सरकार ने सीवीसी की सिफारिश पर कल देर रात वर्मा से सीबीआइ निदेशक का कामकाज वापस ले लिया और उनकी जगह संयुक्त निदेशक एम नागेश्वर राव को सीबीआइ निदेशक का कामकाज सौंप दिया था। वर्मा ने इसे चुनौती दी है। याचिका मे कहा गया है कि उनका 35 साल सेवा का बेदाग रिकार्ड है।

और इसीलिए उन्हें दो वर्ष के लिए जनवरी 2017 में सीबीआइ निदेशक पद पर नियुक्त किया गया। उनका कहना है कि सीबीआई से उम्मीद की जाती है कि वह स्वतंत्र और स्वायत्त एजेंसी के तौर पर काम करेगी। ऐसे हालात भी आते हैं जबकि उच्च पदों पर बैठे लोगों से संबंधित जांच की दिशा सरकार की इच्छानुसार न हो। वर्मा कहते हैं कि हाल के दिनों में ऐसे मौके आये जबकि जांच अधिकारी और अधीक्षण अधिकारी से लेकर संयुक्त निदेशक और निदेशक तक सभी कार्रवाई के बारे में एक मत थे, सिर्फ विशेष निदेशक राकेश अस्थाना का मत भिन्न था।

आलोक वर्मा ने अस्थाना पर कई महत्वपूर्ण मामलों की जांचो में अड़ंगेबाजी लगाने का आरोप लगाया है और यह भी कहा है कि इसी क्रम में अस्थाना ने उनकी छवि खराब करने के लिए उन पर फर्जी आरोप लगाए जिस पर सीबीआई ने अस्थाना के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की। अस्थाना ने उस एफआईआर को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती भी दी है।सीबीआई निदेशक और विशेष निदेशक ने एक-दूसरे के खिलाफ जो आरोप लगाए हैं, वे काफी संगीन किस्म के हैं और उनमें कितना सच है या कितना झूठ, यह अभी नहीं कहा जा सकता।

लेकिन इससे यह बात तो साफ होती ही है कि देश की सबसे अहम और सर्वोच्च जांच संस्था में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।बहुत सी दूसरी व्यवस्थाओं के साथ ही लोकतंत्र स्वायत्त संस्थाओं का तंत्र होता है। लोकतंत्र में जनता यह मानकर चलती है कि किसी भी संकट या किसी भी खतरे के समय ये संस्थाएं ही उसे सुरक्षा भी देंगी और न्याय भी। ताजा विवाद ने जनता के इस भरोसे को चकनाचूर कर दिया है।

इस भरोसे को फिर से बहाल करना देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। वह भी तब, जब सीबीआई की यह साख पिछले कुछ साल से लगातार और काफी तेजी से गिर रही है। पांच साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस संस्था की कार्य-प्रणाली में सुधार का निर्देश दिया था, लेकिन सुधार की ओर कदम बढ़ाना तो दूर, उसकी उम्मीद बंधाने वाली कोई कोशिश तक नहीं हुई। अब अगर देरी हुई, तो हो सकता है कि आने वाले समय में सीबीआई अपना अर्थ ही खो बैठे।

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