प्रधानमंत्रीजी, गंगा मैया की गोद में एक और बेटा सर रख कर सो गया..अब तो जगो

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Editorial : जी.डी अग्रवाल कोई साधारण नहीं थे। वे आइ.आइ.टी. के जानेमाने प्रोफेसर थे। गंगा नदी के शुध्धिकरण को लेकर तथा गंगा नदी के आसपास के क्षेत्र में होती अवैध खनन और बांधो के निर्माण को लेकर वे सभी सरकार से लड रहे थे। अगली सरकारने तो उनकी कुछ मांगे मानी थी लेकिन 2014 में गंगा मैया को चुटकी बजाते ही साफ करने का वादा कर सत्ता में आई मोदी सरकार को भी प्रोफेसरने खत लिखे।

स्थानिय स्तर पर मुलाकाते की प्रशासन से। लेकिन कु छ नहीं हुवा तो उन्हों ने गांधीजी को आदर्श मानते हुये अनशन शुरू किया। गंगा के लिये अलग कानून बनाने की मांग के साथ उन्हों ने अनशन शुरू किया तब अन्य पर्यावरणीयविदो को लगा की सरकार में सुनवाई होंगी।

दिन बीतते गये और आखिर उनहों ने सरकार पर दबाव डालने जल भी त्याग दिया। मगर सरकार की और से ना चीठ्ठी ना संदेश। सरकार के जवाब की बाट जोहते जोहते 111 दिनों के बाद वे गंगामैया के गोद में सर ऱख कर हंमेशा के लिये सो गये… उन के देहांत के बाद मोदीजीने ट्वीट कर दुःख जताया। लेकिन अब क्या। जीते जी सुनवाई नहीं हुई और जाने के बाद उन्हे याद करना ये कोइ तरीका है सरकार का..?

गंगामैया के बुलाने से बनारसी बाबु बने प्रधानमंत्रीजी ने गंगा की साफ सफाई के लिये क्या कुछ किया इसका जवाब सरकार देंगी और देना भी चाहिये। लेकिन 86 वर्षिय एक संत के समान प्रोफेसर अपने लिये नहीं लेकिन भारत की धरोहर समान पवित्र गंगाजी को बचाने के लिये जी जान से लडे और लडते लडते फना हो गये उस के लिये यदि कोइ जिम्मेवार हो सक्ता है तो वह मोदी सरकार ही हो शक्ती है। उनके खतो का कई जवाब ही पीएमओ से ना दिया जाय तो आम आदमी के खतों का क्या होता होंगा। गंगामैया की सदैव चिंता करनेवाले से यदि मोदीजीने एक बार भी बात की होती या उनसे मिलने गये होते तो सरकार को नुकशान नहीं फायदा था।

अभी हाल ही में प्रधानमंत्रीजी, उत्तराखंड के देहरादून में थे। वहां उन्होने इनवेस्टमेनट समिट का उदघाटन भी किया था। अनशन कर रहे प्रोफेसर वहां नजदीक में ऋश्रिकेश में ही थे। उन से मुलाकात करते या उन्हें मिलने बुला लेते तो शायद वें अपना अनशन समाप्त करते तो उनकी जान बच जाती। लेकिन लगता है की स्थानिय प्रशासनने ही उनसे मुलाकात नहीं होने दी होंगी। और तो क्या कहे..गंगा की सफाइ के लिये अबजो और खरबों को खर्च हो रहा है लेकिन गंगा वैसी ही मैली है। कहीं कहीं गंगा का जल निर्मल अवश्य हुया। मगर पूरी गंगा नदी अभी भी प्रदूषित ही है।

गंगाजी के लिये अपनी जान दे कर शहीद हुये प्रोफेसर के पास गंगा की धरोहर को बचाने के उपाय थे, योजनाये थी।सरकार ने उन पर गौर शायद नहीं किया और आखिर गंगा का एक बेटा गंगा की वेदी पर शहीद हो गये। सरकार और निष्ठुर प्रशासन और कितने की बलि मांगेगी। और कितने अग्रवाल समान बेटो की भेट मांगेगी।मा गंगा अपने प्यारे बेटे प्रो. अग्रवालजी को मोक्ष दे। सरकार को दुख जताने की बजाय उनके अनुयायी से मिलकर उनके अधूरे सपनो को पूर्ण कर गंगाजी को सही मायने में शुध्ध करें

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