बुलेट ट्रेन नही,ट्रेन हादसों पर सोचिए

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पिछले साल जुलाई से नवंबर तक तीन बड़े हादसे रायबरेली, भदेही और कानपुर में हुए। अब रायबरेली के हरचंदपुर में हुए रेल हादसे ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बुलेट ट्रेन पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। लापरवाही और वर्षो पुरानी पटरियों पर चलने वाली साधारण रेलवे व्यवस्था को अत्याधुनिक बनाने में केन्द्र की मोदी सरकार असफल साबित हो रही है।

मानवरहित रेलवे क्रांसिग की बाॅत करे या सिफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में हुई छोटी बड़ी लगभग सात सौ ट्रेन दुर्घनाओं का जिक्र करे यह कहने में कतई गुरेज नही होनी चाहिए कि रेलवे आज भी बाबा आदम के जमाने वाली परम्परा पर चल रही है। अब रायबरेली में ही बड़ी रेल दुर्घटना हो गयी। पिछले 4 साल में दस बड़े हादसों के बाद रेल सुरक्षा पर सवाल खड़े होने लगे हैं।
रायबरेली के रेल हादसे में भले ही सात जाने गई हो लेकिन दुघर्टना कई सवाल पैदा करती है। इसके पूर्व मोदी कार्यकाल में आंध्र प्रदेश के विजयनगरम जिले के कुनेरू स्टेशन के निकट हुआ, जहां जगदलपुर- भुवनेश्वर हीराखंड एक्सप्रेस (18448) दुर्घटनाग्रस्त हो गयी। देर रात हुए इस बड़े रेल हादसा हुआ और 38 लोगों की जान चली गयी। 50 से ज्यादा लोग घायल हो गये हैं। यह बुलेट ट्रेन लाने की तैयारी कर रही नरेंद्र मोदी सरकार के शासनकाल में यह आठवीं बड़ी रेल दुर्घटना कही गई थी।

आठ रेल हादसों में 340 लोगों की जान जा चुकी है और करीब डेढ़ हजार लोग घायल हो चुके है. सबसे ज्यादा छह रेल हादसे उत्तरप्रदेश में हुए हैं। आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में भी एक-एक रेल दुर्घटना हुई है। 21 जनवरी 2017 की देर रात आंध्र प्रदेश के विजयनगरम जिले के कुनेरू स्टेशन के निकट जगदलपुर- भुवनेश्वर हीराखंड एक्सप्रेस (18448) के कई बोगियां पटरी सु उतर गयी। इस हादसे में 38 लोगों की मौत हो गयी।

जबकि 50 से ज्यादा लोग घायल हो गये। आशंका है कि पटरी से छेड़छाड़ की गयी। 20 नवंबर 2016 को उत्तरप्रदेश के कानपुर के पास पुखरायां में बड़ी रेल दुर्घटना हुई। इसमें हसदो में 150 से ज्यादा लोगों की जान गयी और करीब 200 से ज्यादा लोग घायल हो गये। जांच में पता चला कि इस हादसे में आइएसआइ का हाथ था।

25 जुलाई 2016 को उत्तरप्रदेश के भदोही इलाके में मडुआडीह-इलाहाबाद पैसेंजर ट्रेन एक मिनी स्कूल वैन से टकरा गयी। वैन में 19 बच्चे सवार थे, जिनमें से 7 बच्चों की मौत हो गयी। 20 मार्च 2015 को उत्तराखंड के देहरादून से वाराणसी जा रही जनता एक्सप्रेस पटरी से उतर गयी। यह हादसा रायबरेली के बछरावां रेलवे स्टेशन के पास हुआ।

इनमें 34 लोग मारे गये। कौशांबी-सिराथू रेलवे हादसा रू 25 मई 2015 को कौशांबी के सिराथू रेलवे स्टेशन के पास मूरी एक्सप्रेस हादसे का शिकार हुई। ट्रेन पटरी से उतर गयी. इस हादसे में 25 यात्री मारे गये और बरी 300 घायल हो गये। 5 अगस्त 2015 में मध्यप्रदेश के हरदा के करीब एक ही जगह पर 10 मिनट के अंदर दो ट्रेन हादसे हुए. इटारसी-मुंबई रेलवे ट्रैक पर दो ट्रेनें मुंबई-वाराणसी कामायनी एक्सप्रेस और पटना-मुंबई जनता एक्सप्रेस पटरी से उतर गयीं। माचक नदी पर रेल पटरी धंसने की वजह से हरदा में यह हादसा हुआ था।

इस दुर्घटना में 31 यात्री मारे गये। मई 2014 में महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में कोंकण रेलवे रूट पर एक यात्री सवारी गाड़ी का इंजन और उसके छह डिब्बे पटरी से उतर गये। इस हादसे में 20 यात्रियों की मौत हो गयी, जबकि 124 लोग घायल हुए। 26 मई, 2014 को उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जिले में चुरेन रेलवे स्टेशन के पास गोरखधाम एक्सप्रेस और मालगाड़ी में टक्कर हुई। यात्री ट्रेन को उसी ट्रैक पर ले जाया गया था। जहां पहले से मालगाड़ी खड़ी थी। इस हादसे में 22 से ज्यादा यात्रियों की जान चली गयी। अब प्रश्न यह उठता है कि हर हादसा बुरा होता है।

उन लोगों के लिए तो बहुत बुरा, जो अपने किसी नजदीकी को हादसे में खो देते हैं, और उन लोगों के लिए भी, जो दुर्घटना की चपेट में आकर घायल हो जाते हैं। बुधवार की सुबह रायबरेली में हुए रेल हादसे की कहानी भी यही है। हर दुर्घटना अपने पीछे बहुत सारे रोते-बिलखते व डरे हुए लोग और कई सवाल छोड़ जाती है। लोगों के घाव तो समय के साथ भर जाते हैं, लेकिन दुर्भाग्य है कि ये सवाल हमेशा ही अनुत्तरित रह जाते हैं।

बावजूद इसके कि हर दुर्घटना के बाद जांच के लिए बाकायदा एक समिति बनती है। फिर उसकी रिपोर्ट किस ठंडे बस्ते में चली जाती है, यह अक्सर हमें पता भी नहीं चलता। इन हादसों और रिपोर्टों की याद भी हमें तभी आती है, जब कोई अगली दुर्घटना हमारी तंद्रा को झटके से तोड़ती है।

कहा जाता है कि कोई भी दुर्घटना अक्सर सिर्फ एक दुर्घटना भर नहीं होती। उसके पीछे होती है कोई चूक, कोई भूल, कोई लापरवाही या फिर कोई व्यवस्थागत खामी। हर दुर्घटना के बाद उम्मीद यही बांधी जाती है कि लापरवाहों को सजा मिलेगी, भूल-चूक से तौबा होगी और व्यवस्थागत खामियों को दूर कर दिया जाएगा। और फिर जब अगली दुर्घटना होती है, तो पता लगता है कि इनमें से कुछ भी नहीं हुआ। हुआ भी, तो इतना असरदार नहीं था कि उसी तरह की अगली दुर्घटना न होने का सबब बन पाता।

पहले जब रेल बजट अलग से पेश किया जाता था, तो हर रेल बजट के एक हिस्से में इस बात का औपचारिक पाठ जरूर किया जाता था कि रेल दुर्घटनाओं को रोकने के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। पता नहीं, वह आधुनिक तकनीक कभी रेल पटरियों पर उतरी या नहीं, लेकिन दुर्घटनाएं होती रहीं और उसकी चपेट में आने वाले यात्री अपनी जान गंवाते रहे।

अब उन पुराने संकल्पों को हकीकत बनाने की जरूरत है।. ऐसे मंें जनता को बुलेट का सपना दिखा रही मोदी सरकार से यह उम्मीद करना कठिन है कि वह अंग्रेजों के शासनकाल से चली आ रही पटरियाॅ और व्यवस्था को बदलकर वह इन बढ़ती ट्रेन दुघर्टनाओं को रोकेगी।

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