वायु सेना के प्रमुख की राजनितिक बयानबाजी खतरे की घंटी….?

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राफेल विमान को लेकर भाजपा-मोदी सरकार और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रति आरोप की जंग चल रही है। दोनों के बीच राजनितिक बयानबाजी इतनी तेज है की मोदी सरकार राफेल सौदे में फंसती नजर आ रही है। आम तौर पर भारत में सेना और उनके प्रमुख राजनीति और राजनितिक बयानबाजी से दूर रहते आये है और रहना भी चाहिए।

लेकिन वर्तमान सरकार में सेना के दो प्रमुख सरकार के पक्ष में जो ब्यान दे रहे है वह किसी खतरे की घंटी से कम नहीं। पूर्वोत्तर के एक राज्य में किसी राजनितिक दल को कम समय में ज्यादा सीटें मिलने पर सेना प्रमुख रावतजी ने भाजपा और संघ परिवार की भूरी प्रसंशा करते कहा ठा की इन दल और संगठन को इतनी सीटें जीतने में काफी बर्षो लगे लेकिन इस दल को कैसे इतनी सीटें मिली?

उनका इशारा घुसपैठियों के तरफ था। वायु सेना के प्रमुख बी.एस. धनोआजी ने रावतजी से दो कदम आगे चलकर रफाल विमान सौदे में सरकार का पक्ष लेते हुवे आधिकारिक ब्यान दिया की यह विमान बनानेवाली फ़्रांस की कम्पनी द्सोल्ट को अपना ऑफसेट कारोबारी पार्टनर चुनने में सरकार और वायुसेना की कोई भूमिका नहीं थी…..! उन्होंने रफाल विमान को बढ़िया और सौदे को बोल्ड बताया।

जो भाषा इस मामले में सरकार के मंत्रीगण इस्तेमाल कर रहे है उसी राजनितिक भाषा में वायुसेना के प्रमुख ने आरोप लगानेवाले दल कोंग्रेस को दिया। आरोप चूँकि प्रतिपक्ष कोंग्रेस ने लगाया तो जाहिर है की जवाब भी उसी को दिया गया। वायुसेना के प्रमुख राजनितिक बयानबाजी से अ रुकते हुए आगे बढ़कर वायुसेना के लिए बढ़िया से बढ़िया विमान बनानेवाली सरकारी कम्पनी हिन्दुस्तान एरोनेटिक लिमिटेड की भी टिपण्णी की। मोदी सरकार ने रफाल विमान बनाने का काम निजी कम्पनी को दिलवाया होनेका आरोप है।

यह निजी कम्पनी अनिल अंबानी की है और उसके खिलाफ स्वीडन की टेलीकोम कम्पनी ने अपने बकाया पैसो के लिए उन्हें इजाजत के बगैर भारत नहीं छोड़ने की मंजूरी की गुहार अदालत में लगाईं है।

वायुसेना के प्रमुख ने सरकारी कम्पनी के कार्य के बारेमे कहा की एचएएल के साथ अनुबंध के बाद सुखोई आदि विमानों की आपूर्ति में देरी हुई है। यानी उनका कहना था की यदि रफाल विमान बनाने का काम सरकारी कम्पनी को मिलता तो रफाल की आपूर्ति में भी देर होती। इसलिए निजी कंपनीको काम दिया गया। वायुसेना के प्रमुख भी जानते है की निजी कंपनी को विमान क्या डिफेन्स की कोई चीज बनाने का भी अनुभव नहीं है।

उन्होंने इसकी क्यों तरफदारी की ये तो वे ही जाने। देश तो सिर्फ यही जानना चाहता है की आखिर सेना प्रमुखों की ऐसी क्या मज़बूरी है की वे सरकार का पक्ष लेते हुए राजनितिक ब्यान दे रहे है? क्या यह किसी खतरे की घंटी नहीं लगती?

सेना और उनके प्रमुख राजनीति और राजनितिक बयानबाजी से दूर ही रहे तो ये सेना के लिए भी अच्छा रहेंगा।सरकार और प्रतिपक्ष को आपसमे लड़ने दीजिये। वे सब एक ही है। कल को साथ हो जायेंगे किसी मुद्दे पर। सेना प्रमुख ऐसे ब्यान दे कर अपनी आन बान शान वाली वर्दी पर कोई राजनितिक दल का चिन्ह न लगाये

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